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भाजपा का नया दांव: दतिया में नरोत्तम को किया किनारे, स्पीकर नरेंद्र सिंह तोमर के करीबी को कमान
Wed, 23 Sep 2026 05:27 PM IST
Anand Pawar
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल
Published by: Anand Pawar
Updated Wed, 23 Sep 2026 05:27 PM IST
सार
दतिया उपचुनाव में हार के बाद भाजपा ने 49 दिन बाद जिला संगठन को नया नेतृत्व दिया है। मानवेंद्र सिंह परिहार को जिलाध्यक्ष बनाकर पार्टी ने संगठन में नए शक्ति-संतुलन के संकेत दिए हैं।
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नरोत्तम मिश्रा और मानवेंद्र सिंह परिहार
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
दतिया विधानसभा उपचुनाव में हार के बाद भाजपा ने करीब 49 दिन बाद जिला संगठन को नया नेतृत्व दे दिया है। पार्टी ने मानवेंद्र सिंह परिहार को दतिया का नया जिलाध्यक्ष बनाया है। परिहार लंबे समय से भाजपा संगठन में सक्रिय रहे हैं और जिला महामंत्री की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं। उन्हें विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर का करीबी बताया जाता है। ऐसे में उनकी नियुक्ति को दतिया भाजपा में नए सिरे से संगठनात्मक संतुलन बनाने की कवायद के तौर पर देखा जा रहा है।
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नरोत्तम का टिकट कटने पर संगठन में हुआ था विरोध
दतिया उपचुनाव से पहले पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा क्षेत्र में लगातार सक्रिय थे और चुनाव की तैयारी कर रहे थे। उन्होंने नामांकन पत्र भी खरीद लिया था। हालांकि, पार्टी नेतृत्व ने उनकी जगह आशुतोष तिवारी को प्रत्याशी बनाया। टिकट बदलने के फैसले के बाद नरोत्तम समर्थकों और तत्कालीन जिलाध्यक्ष रघुवीर सिंह कुशवाह की ओर से विरोध सामने आया था। कुशवाह ने जिलाध्यक्ष पद से इस्तीफा भी दे दिया था। बाद में पार्टी ने इस्तीफा स्वीकार नहीं किया और नरोत्तम मिश्रा के समझाने के बाद उन्होंने चुनाव में काम किया। इसके बावजूद भाजपा को करीब 6 हजार वोटों से हार का सामना करना पड़ा।
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हार के बाद पूरा जिला संगठन भंग किया था
उपचुनाव के परिणाम तीन अगस्त को आए थे। इसके बाद पार्टी ने हार के कारणों की समीक्षा के लिए दो सदस्यीय समिति बनाई। समिति की रिपोर्ट के बाद चार अगस्त को दतिया का पूरा जिला संगठन भंग कर दिया गया। इसमें तत्कालीन जिलाध्यक्ष रघुवीर सिंह कुशवाह के साथ जिला पदाधिकारी, मंडल, मोर्चा और अन्य संगठनात्मक इकाइयां भी शामिल थीं।
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नई कार्यकारिणी से होगा शक्ति संतुलन
संगठन भंग होने के करीब 49 दिन बाद मानवेंद्र सिंह परिहार को जिलाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई है। वे संघ से भी जुड़े रहे हैं। पिछली बार उन्होंने जिलाध्यक्ष पद के लिए दावेदारी की थी, लेकिन नियुक्ति नहीं हो सकी थी। अगस्त में नए जिलाध्यक्ष को लेकर आशुतोष तिवारी का नाम भी चर्चा में था। हालांकि, बताया जाता है कि उन्होंने अध्यक्ष बनने से इंकार कर दिया था। नए जिलाध्यक्ष की नियुक्ति के बाद अब नजर नई जिला कार्यकारिणी पर है। मंडल, मोर्चा और अन्य पदों पर किन चेहरों को जिम्मेदारी मिलती है, इससे दतिया भाजपा में नए शक्ति-संतुलन के संकेत मिलेंगे। अगले साल प्रस्तावित नगरीय निकाय चुनाव और 2028 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए यह पुनर्गठन महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
दतिया में सक्रिय बने हुए हैं नरोत्तम
चुनाव में हार के बाद नरोत्तम मिश्रा दतिया पहुंचे तो समर्थकों ने उनका स्वागत किया था। इसके बाद भी वह क्षेत्र में सक्रिय हैं। रविवार को विकसित भारत संकल्प यात्रा के दौरान वह करीब 500 वाहनों के काफिले के साथ दतिया के अलग-अलग क्षेत्रों में निकले। इस दौरान आशुतोष तिवारी के समर्थकों की दूरी चर्चा में रही। भोपाल में भी मिश्रा की भाजपा नेताओं के साथ लगातार मुलाकातें सामने आ रही हैं। ऐसे में नए जिलाध्यक्ष के सामने संगठन को एकजुट रखने और स्थानीय नेताओं के बीच संतुलन बनाने की चुनौती होगी।
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संगठनात्मक संतुलन बनाने की कोशिश
वरिष्ठ पत्रकार प्रभु पटैरिया के मुताबिक, मानवेंद्र सिंह परिहार पुराने भाजपा कार्यकर्ता हैं और दतिया में पहले भी संगठन की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। उनका कहना है कि पिछले करीब 15 वर्षों से दतिया भाजपा संगठन पर नरोत्तम मिश्रा समर्थकों का प्रभाव रहा है। उपचुनाव में हार के बाद पार्टी अब संगठनात्मक संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है। इसी रणनीति के तहत ऐसे पुराने पदाधिकारी को जिलाध्यक्ष बनाया गया है, जो किसी एक गुट से सीधे तौर पर जुड़े नहीं माने जाते।
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नरोत्तम का टिकट कटने पर संगठन में हुआ था विरोध
दतिया उपचुनाव से पहले पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा क्षेत्र में लगातार सक्रिय थे और चुनाव की तैयारी कर रहे थे। उन्होंने नामांकन पत्र भी खरीद लिया था। हालांकि, पार्टी नेतृत्व ने उनकी जगह आशुतोष तिवारी को प्रत्याशी बनाया। टिकट बदलने के फैसले के बाद नरोत्तम समर्थकों और तत्कालीन जिलाध्यक्ष रघुवीर सिंह कुशवाह की ओर से विरोध सामने आया था। कुशवाह ने जिलाध्यक्ष पद से इस्तीफा भी दे दिया था। बाद में पार्टी ने इस्तीफा स्वीकार नहीं किया और नरोत्तम मिश्रा के समझाने के बाद उन्होंने चुनाव में काम किया। इसके बावजूद भाजपा को करीब 6 हजार वोटों से हार का सामना करना पड़ा।
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हार के बाद पूरा जिला संगठन भंग किया था
उपचुनाव के परिणाम तीन अगस्त को आए थे। इसके बाद पार्टी ने हार के कारणों की समीक्षा के लिए दो सदस्यीय समिति बनाई। समिति की रिपोर्ट के बाद चार अगस्त को दतिया का पूरा जिला संगठन भंग कर दिया गया। इसमें तत्कालीन जिलाध्यक्ष रघुवीर सिंह कुशवाह के साथ जिला पदाधिकारी, मंडल, मोर्चा और अन्य संगठनात्मक इकाइयां भी शामिल थीं।
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नई कार्यकारिणी से होगा शक्ति संतुलन
संगठन भंग होने के करीब 49 दिन बाद मानवेंद्र सिंह परिहार को जिलाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई है। वे संघ से भी जुड़े रहे हैं। पिछली बार उन्होंने जिलाध्यक्ष पद के लिए दावेदारी की थी, लेकिन नियुक्ति नहीं हो सकी थी। अगस्त में नए जिलाध्यक्ष को लेकर आशुतोष तिवारी का नाम भी चर्चा में था। हालांकि, बताया जाता है कि उन्होंने अध्यक्ष बनने से इंकार कर दिया था। नए जिलाध्यक्ष की नियुक्ति के बाद अब नजर नई जिला कार्यकारिणी पर है। मंडल, मोर्चा और अन्य पदों पर किन चेहरों को जिम्मेदारी मिलती है, इससे दतिया भाजपा में नए शक्ति-संतुलन के संकेत मिलेंगे। अगले साल प्रस्तावित नगरीय निकाय चुनाव और 2028 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए यह पुनर्गठन महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
दतिया में सक्रिय बने हुए हैं नरोत्तम
चुनाव में हार के बाद नरोत्तम मिश्रा दतिया पहुंचे तो समर्थकों ने उनका स्वागत किया था। इसके बाद भी वह क्षेत्र में सक्रिय हैं। रविवार को विकसित भारत संकल्प यात्रा के दौरान वह करीब 500 वाहनों के काफिले के साथ दतिया के अलग-अलग क्षेत्रों में निकले। इस दौरान आशुतोष तिवारी के समर्थकों की दूरी चर्चा में रही। भोपाल में भी मिश्रा की भाजपा नेताओं के साथ लगातार मुलाकातें सामने आ रही हैं। ऐसे में नए जिलाध्यक्ष के सामने संगठन को एकजुट रखने और स्थानीय नेताओं के बीच संतुलन बनाने की चुनौती होगी।
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संगठनात्मक संतुलन बनाने की कोशिश
वरिष्ठ पत्रकार प्रभु पटैरिया के मुताबिक, मानवेंद्र सिंह परिहार पुराने भाजपा कार्यकर्ता हैं और दतिया में पहले भी संगठन की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। उनका कहना है कि पिछले करीब 15 वर्षों से दतिया भाजपा संगठन पर नरोत्तम मिश्रा समर्थकों का प्रभाव रहा है। उपचुनाव में हार के बाद पार्टी अब संगठनात्मक संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है। इसी रणनीति के तहत ऐसे पुराने पदाधिकारी को जिलाध्यक्ष बनाया गया है, जो किसी एक गुट से सीधे तौर पर जुड़े नहीं माने जाते।
