UP News: जमीन का अधिग्रहण... न कोई नोटिस, बनाने लगे पुल; सेतु निगम अफसरों की मनमानी से फ्लाईओवर का काम ठप
लखनऊ में न जमीन का अधिग्रहण किया और न ही कोई नोटिस दिया। सीधे जाकर पुल बनाने लगे। सेतु निगम अफसरों की मनमानी से तीन महीने से एक फ्लाईओवर का काम ठप पड़ा है।
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राजधानी लखनऊ में केसरीखेड़ा फ्लाईओवर की तरह ही 153 करोड़ रुपये की लागत वाला जलालपुर-पारा रेलवे ओवरब्रिज भी सेतु निगम अफसरों की मनमानी का शिकार हो गया है। निगम के अफसरों ने जलालपुर-पारा में न तो रूट के बीच में आने वाले लोगों की जमीन का अधिग्रहण किया। न ही उनको कोई नोटिस दिया। बीते साल के अंतिम माह में सीधे निगम की टीम पहुंची और घेराबंदी कर पुल का निर्माण शुरू कर दिया।
इस पुल का करीब 25 फीसदी निर्माणाधीन हिस्सा जब 87 लोगों के घर और दुकान के पास पहुंचा तो लोगों को बिना मुआवजा उनके निर्माण को ध्वस्त करने का भय सताने लगा। इसके बाद लोगों ने राजाजीपुरम के हिस्से की तरफ विरोध प्रदर्शन कर काम ठप करा दिया। अब ओवरब्रिज का निर्माण ठप हुए करीब तीन माह बीत चुके हैं। सेतु निगम ने अब तक उनके मुआवजा का इंतजाम नहीं किया है।
पुल की चपेट में जलालपुर-पारा के 85 परिवार
जलालपुर-पारा पुल के हिस्से की तरफ 85 परिवार चपेट में हैं। पार्षद नागेंद्र सिंह ने बताया कि जब से पुल के निर्माण का काम ठप हुआ, तब से सेतु निगम के अफसरों ने उनसे बात करना ही बंद कर दिया है। पुल की जद में जिन परिवारों के मकान एवं दुकान आए, वह अधर में अटके हैं। ऐसे परिवारों को मुआवजा मिले तो नए आशियाना एवं रोजी-रोटी का नया ठिकाना तलाश सकें। पूरा प्रकरण रक्षामंत्री राजनाथ सिंह तक पहुंच चुका है।
अफसरों की जल्दबादी से अटका पुल
जलालपुर-पारा क्षेत्र के रवि चौरसिया ने बताया कि पुल बनने से आम जनता को बहुत सहूलियत मिलेगी, मगर सेतु निगम के अफसरों की जल्दबाजी के कारण पुल का निर्माण अटक गया है। उन्होंने कहा कि सेतु निगम ने कुल 87 परिवारों को अब तक कोई नोटिस नहीं दिया कि उनके घर और दुकान का पुल के निर्माण के लिए अधिग्रहण किया जा रहा है। अफसरों ने पुल के दोनों तरफ जलालपुर और राजाजीपुरम की तरफ से निर्माण शुरू किया था।
दो प्रोजेक्ट अटके, जिम्मेदारों पर कार्रवाई तक नहीं
देश के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के संसदीय क्षेत्र में सेतु निगम के अफसरों मनमानी के चलते केसरीखेड़ा फ्लाईओवर छह माह और जलालपुर-पारा फ्लाईओवर का प्रोजेक्ट तीन माह से अटके हैं। शासनस्तर से इन प्रोजेक्ट के जिम्मेदार अफसरों पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। उनसे यह सवाल तक नहीं किया गया कि अफसरों से कहां चूक हुई, जिससे निर्माण विभाग की किरकिरी हो रही है।