'लोग भाजपा-अपना दल गठबंधन तोड़ देना चाहते हैं'
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अपना दल से लोकसभा सांसद अनुप्रिया पटेल का कहना है कि पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष कृष्णा पटेल मनमाने तरीके से संगठन चलाना चाहती हैं। परिवार तथा दल में कुछ स्वार्थी एवं महत्वाकांक्षी लोग मेरी 5 वर्ष की मेहनत को भुनाना और अपना दल व भाजपा गठबंधन को तोड़ना चाहते हैं। इस साजिश को किसी भी कीमत पर कामयाब नहीं होने दिया जाएगा।
जहां तक मुझ पर भाजपा से मिलकर दल विरोधी काम करने का आरोप है तो मैं याद दिलाना चाहती हूं कि गठबंधन वार्ता के समय मेरे सामने भाजपा की ओर से विलय का प्रस्ताव रखा गया था। भाजपा के चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ने का दबाव भी डाला गया था।
पर, मैंने अस्वीकार कर दिया। जहां तक विधानसभा की रोहनिया सीट के उपचुनाव की बात है तो मैं भी इससे सहमत थी कि किसी कार्यकर्ता को लड़ाया जाए। पर, जब राष्ट्रीय अध्यक्ष ने खुद चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी तो सभी ने चुनाव लड़ाया। मुझसे ज्यादा वोट उन्हें मिले। ऐसे में मेरे ऊपर हराने का आरोप उचित नहीं है।
महत्वाकांक्षा का टकराव भी संभव
यूपी की सियासत में पहला मौका होगा जब मां-बेटी के झगड़े में कोई राजनीतिक दल टूट की कगार पर पहुंच गया है। अपना दल की राष्ट्रीय अध्यक्ष कृष्णा पटेल ने बेटी अनुप्रिया पटेल को पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव पद से बर्खास्त कर दिया है तो अनुप्रिया ने मां पर आरोप लगाया है कि वह नियमों का ताक पर रखकर संगठन चलाना चाहती हैं।
कुछ स्वार्थी तत्व भाजपा व अपना दल गठबंधन तोड़ना चाहते हैं, जो मैं नहीं होने दूंगी। कुछ तो इस विवाद को महत्वाकांक्षा का टकराव मानते हैं लेकिन कुछ इसके पीछे सपा या भाजपा जैसे राजनीतिक दलों का हाथ भी देख रहे हैं। इस तरह का निष्कर्ष निकालने वालों का तर्क है कि इसमें दोनों का लाभ है।
दो नेताओं के झगडे़ या फिर अस्तित्व व अस्मिता की लड़ाई में दलों में विभाजन की घटनाएं तो सुनी गई हैं, लेकिन कम से कम यूपी की सियासत में कोई ऐसा वाकया याद नहीं आता जब घर व संपत्ति की तरह पार्टी पर उत्तराधिकार की लड़ाई दल के बंटवारे तक पहुंची हो। बाजी मां के हाथ लगेगी या बेटी के, अथवा यह दल टूट-टूटकर उन तमाम लोगों के दिल तोड़ने वाला इतिहास बनाएगा, जिन्होंने कुर्मी स्वाभिमान के नाम पर स्व. सोनेलाल पटेल को आगे करके इस तरह के राजनीतिक संगठन की कल्पना की थी, इन सारे सवालों के जवाब सामने आने में अभी वक्त लगेगा।
पर, राजनीति के गलियारे में यह सवाल लोगों की जुबान पर है कि आखिर विवाद का कारण क्या है? जो बात इतनी बढ़ गई कि एक ही परिवार के दो सदस्य और वह भी मां-बेटी आमने-सामने खड़ी हो गईं।
यह भी हो सकता है टकराव का कारण
राजनीतिक समीक्षक मानते हैं कि परिवार, कम्युनिटी और जाति पर आधारित राजनीतिक दलों का यह हश्र जन्म के साथ तय हो जाता है। ज्यादातर लोगों का मानना है कि यह महत्वाकांक्षा की लड़ाई है।
जिस तरह से अनुप्रिया पटेल अपना दल की पर्याय बनती जा रही थीं, उसके मद्देनजर उनकी बड़ी बहन पल्लवी के मन में भी कहीं न कहीं अपनी पहचान जताने की महत्वाकांक्षा के बीज फूटने ही थे। कृष्णा पटेल ने पल्लवी को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया। यह अनुप्रिया को नागवर लगना ही था।
खारिज नहीं की जा सकती यह भी संभावना
मां और बेटी एक-दूसरे पर चापलूसों के फेर में फंसकर पार्टी को नुकसान पहुंचाने के आरोप लगा रही हैं। उसके मद्देनजर इस विवाद में सपा और भाजपा का हाथ होने की संभावनाओं को भी पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। राजनीतिक समीक्षकों का भी मानना है कि लोकसभा चुनाव में झटका खाने के बाद समाजवादी पार्टी पिछड़ा वोट में बंटवारा रोकने को खासी चिंतित है।
यह बातें भी देती हैं ऐसा ही संकेत
सपा के रणनीतिकारों की कुर्मी व पटेल वोटों को पार्टी के साथ जोड़ने की कोशिश स्वाभाविक है। अनुप्रिया चूंकि भाजपा के सहयोग से सांसद हैं, इसलिए सपाई रणनीतिकारों के अनुप्रिया के बजाय कृष्णा पटेल को साथ लाने का रणनीतिक खेल खेलने से इन्कार नहीं किया जा सकता।
क्षेत्रीय दलों की भूमिका सीमित रहना भाजपा के लिए भी अनुकूल है। वरिष्ठ पत्रकार रतनमणि लाल कहते हैं कि उनके पास प्रमाण तो नहीं हैं लेकिन अनुभव के आधार पर ऐसा कह सकते हैं कि भाजपा को भी यह स्थिति सुविधाजनक लग रही होगी। इसलिए उसकी तरफ से अनुप्रिया की महत्वाकांक्षाएं जगाने से भी इन्कार नहीं किया जा सकता।
अनुप्रिया पटेल की तरफ से खुलकर कहा जा रहा है कि अपना दल के भाजपा से गठबंधन के बाद सपा काफी बेचैन है। सपा को चिंता है कि इससे आगे आने वाले विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में उसकी मुसीबतें बढ़ेंगी।
वहीं, कृष्णा पटेल कह रही हैं कि सांसद होने के बाद कुछ लोग अनुप्रिया की महत्वाकांक्षाएं बढ़ा रहे हैं, जिससे उन्हें अपना दल की ताकत का लाभ मिले। पर, मैं (कृष्णा पटेल) ऐसा नहीं होने दूंगी। इस सबसे भी अपना दल के विवाद में इन दोनों दलों का हाथ होने की संभावना नजर आती है।
कृष्णा पटेल से सीधी बात
-अनुप्रिया पटेल का कहना है कि संविधान के मुताबिक आप राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का पद सृजित नहीं कर सकतीं?
जवाब- मैं अपना दल की राष्ट्रीय अध्यक्ष हूं। कायदे-कानून मुझे भी पता हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष सिर्फ दस्तखत करने के लिए नहीं होता। यह आने वाला समय तय करेगा कि दल कौन तोड़ रहा है।
-अनुप्रिया का कहना है कि परिवार के लोग मेरे परिश्रम को भुनाना चाहते हैं, पल्लवी को राजनीतिक अनुभव नहीं है?
जवाब-अनुप्रिया जब राजनीति में आई थीं तो उन्हें ही कितना अनुभव था। रही परिश्रम भुनाने की बात तो पार्टी की स्थापना मेरे पति डॉ. सोनेलाल पटेल ने की थी। मैंने पति के कंधे से कंधा मिलाकर पार्टी को यहां तक पहुंचाया। पार्टी को यहां तक लाने में 60 प्रतिशत योगदान मेरा भी है।
-अनुप्रिया की तरफ से कहा जा रहा है कि आप कुछ लोगों की साजिश का शिकार हो रही हैं?
जवाब- पता नहीं इस लड़की को क्या हो गया है। मेरा घर तो मंदिर की तरह था। जो हो रहा है, उस तरह के संस्कार मैंने अपने बच्चों को नहीं दिए थे। मुझे अनुप्रिया से यह उम्मीद भी नहीं थी। ऐसा लगता है कि वह कुछ चापलूसों के चक्कर में पार्टी को तोड़ने में जुटी है। मेरे जीते जी इसमें कोई सफल नहीं हो पाएगा।
मुझे पता है कि पार्टी किसके हाथों में सुरक्षित?
- क्या लगता है कि इस स्थिति में भी पार्टी बच जाएगी?
जवाब- पार्टी टूटने की जो लोग भी बात कर रहे हैं, उन्हें अपना दल के बारे में कुछ नहीं पता। अपना दल के लोग सोनेलाल पटेल से जुड़े हैं। वे जानते हैं कि पार्टी किसके हाथ में सुरक्षित रहेगी।
- कहीं भाजपा तो इसके पीछे नहीं?
जवाब- हम सपा या भाजपा अथवा अन्य किसी दूसरे को दोष क्यों दें। अनुप्रिया नासमझ नहीं हैं। मुझे इस तरह के काम की उससे उम्मीद भी नहीं थी। मुझे तो लगता है कि पुरानी कहावत सही साबित हो रही है कि लड़की जब दूसरे के घर की हो जाती है तो उस पर मां-बाप का दबाव नहीं रहता। मुझे लगता है कि गड़बड़ होने का असली कारण यही है।