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विहिप गांव-गांव जाएगी, अयोध्या आंदोलन का इतिहास बताएगी
Fri, 06 Dec 2019 02:23 PM IST
विक्रांत चतुर्वेदी
अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
Published by: विक्रांत चतुर्वेदी
Updated Fri, 06 Dec 2019 02:23 PM IST
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अयोध्या विवाद
- फोटो : Amar Ujala
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तीन दशक से ज्यादा चले श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन की सूत्रधार विश्व हिंदू परिषद ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद अब इसका पूरा इतिहास लोगों के दिल वह दिमाग में उतारने की तैयारी की है। इसके लिए उसने अपने लोगों को इसी सप्ताह से गांव-गांव भेजकर लोगों को अयोध्या आंदोलन का सच इतिहास बताने की योजना बनाई है। इसके लिए विहिप ने ‘श्रीरामजन्मभूमि मंदिर के तथ्य’ नाम से चार पन्नों का फोल्डर तैयार कराया है। इस फोल्डर में इस आंदोलन का सन 1528 से सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की बातों तक को शामिल किया गया है।
दरअसल, संघ परिवार की हमेशा यह कोरशिश रही है कि देश की राजनीतिक दिशा और सियासी समीकरणों की दशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले इस आंदोलन को हिंदू समाज के दिल और दिमाग में हमेशा जिंदा रखा जाए। इसके पीछे मंशा हिंदुत्व के एजेंडे के साथ चुनावी समीकरणों को भी 60 प्रतिशत बनाम 40 प्रतिशत बनाने की दिखती है।
विहिप के मीडिया प्रभारी शरद शर्मा कहते भी हैं कि हिंदुओं के सम्मान, स्वाभिमान और सांस्कृतिक चेतना से जुड़े इस मामले में लगभग 400 वर्ष चले संघर्ष के घटनाक्रम को वर्तमान और भावी पीढ़ी को बताने की जिम्मेदारी हमारे ऊपर इसलिए भी हैं क्योंकि इस संघर्ष और आंदोलन ने सांस्कृतिक चेतना, स्वाभिमान के पुनर्जागरण का भी काम किया है। राम भारतीय संस्कृति का प्रतीक हैं।
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सांस्कृतिक संगठन के नाते विहिप की जिम्मेदारी है कि इस स्थल की मुक्ति के लिए हुए संघर्ष, लोगों के बलिदान और न्यायिक प्रक्रिया की पूरी जानकारी लोगों तक पहुंचाएं। जिससे लोग इस जगह और आंदोलन के महत्व तथा सांस्कृतिक स्वाभिमान की चेतना के प्रतीकों के मूल्य को समझें और उनकी सुरक्षा के लिए सजग रहे।
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दरअसल, संघ परिवार की हमेशा यह कोरशिश रही है कि देश की राजनीतिक दिशा और सियासी समीकरणों की दशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले इस आंदोलन को हिंदू समाज के दिल और दिमाग में हमेशा जिंदा रखा जाए। इसके पीछे मंशा हिंदुत्व के एजेंडे के साथ चुनावी समीकरणों को भी 60 प्रतिशत बनाम 40 प्रतिशत बनाने की दिखती है।
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विहिप के मीडिया प्रभारी शरद शर्मा कहते भी हैं कि हिंदुओं के सम्मान, स्वाभिमान और सांस्कृतिक चेतना से जुड़े इस मामले में लगभग 400 वर्ष चले संघर्ष के घटनाक्रम को वर्तमान और भावी पीढ़ी को बताने की जिम्मेदारी हमारे ऊपर इसलिए भी हैं क्योंकि इस संघर्ष और आंदोलन ने सांस्कृतिक चेतना, स्वाभिमान के पुनर्जागरण का भी काम किया है। राम भारतीय संस्कृति का प्रतीक हैं।
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सांस्कृतिक संगठन के नाते विहिप की जिम्मेदारी है कि इस स्थल की मुक्ति के लिए हुए संघर्ष, लोगों के बलिदान और न्यायिक प्रक्रिया की पूरी जानकारी लोगों तक पहुंचाएं। जिससे लोग इस जगह और आंदोलन के महत्व तथा सांस्कृतिक स्वाभिमान की चेतना के प्रतीकों के मूल्य को समझें और उनकी सुरक्षा के लिए सजग रहे।
इस तरह याद दिलाया इतिहास
फोल्डर में 1528 से सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय तक के घटनाक्रम का संक्षेप में उल्लेख किया गया है। तर्कों व तथ्यों से यह भी समझाने की कोशिश की गई है कि यह मामला मंदिर-मस्जिद का विवाद का नहीं बल्कि सांस्कृतिक स्वाभिमान के चेतना का था। जिसे बाबर ने हमला कराकर और श्रीराम जन्मभूमि स्थल तुड़वाकर अपमानित व नष्ट करने की कोशिश की थी। फोल्डर में सन 1528 से 1949 तक इस स्थल की मुक्ति के लिए हुए संघर्षो का संक्षिप्त में उल्लेख किया गया है।
इसी के साथ 1885 में दायर हुए पहले मुकदमे से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचे मुकदमों का उल्लेख करते हुए उनके फैसलों के बारे में भी लोगों को बताया गया है । इसके अलावा 1983 में मुजफ्फरनगर में हुए हिंदू सम्मेलन का उल्लेख करते हुए लोगों को श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के इतिहास की जानकरी दी गई है। इसके अंतर्गत राम रथ यात्राओं, शिलापूजन, श्रीराम ज्योति पूजन, कारसेवा आंदोलन, समय-समय पर हुई धर्म संसद और शिलादान सहित अन्य सभी प्रमुख घटनाक्रम का उल्लेख है।
फोल्डर में 1528 से सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय तक के घटनाक्रम का संक्षेप में उल्लेख किया गया है। तर्कों व तथ्यों से यह भी समझाने की कोशिश की गई है कि यह मामला मंदिर-मस्जिद का विवाद का नहीं बल्कि सांस्कृतिक स्वाभिमान के चेतना का था। जिसे बाबर ने हमला कराकर और श्रीराम जन्मभूमि स्थल तुड़वाकर अपमानित व नष्ट करने की कोशिश की थी। फोल्डर में सन 1528 से 1949 तक इस स्थल की मुक्ति के लिए हुए संघर्षो का संक्षिप्त में उल्लेख किया गया है।
इसी के साथ 1885 में दायर हुए पहले मुकदमे से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचे मुकदमों का उल्लेख करते हुए उनके फैसलों के बारे में भी लोगों को बताया गया है । इसके अलावा 1983 में मुजफ्फरनगर में हुए हिंदू सम्मेलन का उल्लेख करते हुए लोगों को श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के इतिहास की जानकरी दी गई है। इसके अंतर्गत राम रथ यात्राओं, शिलापूजन, श्रीराम ज्योति पूजन, कारसेवा आंदोलन, समय-समय पर हुई धर्म संसद और शिलादान सहित अन्य सभी प्रमुख घटनाक्रम का उल्लेख है।
बताएंगे सुलह को इच्छुक नहीं दिखा मुस्लिम पक्ष
फोल्डर में सुलह-समझौते का सच भी बताया गया है। लिखा है कि विहिप ने वार्तालाप के सभी माध्यमों से इस विवाद को सुलझाने की कोशिश की। पर, नतीजा नहीं निकला। राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में दिल्ली में शुक्रवार के दिन वार्ता थी। वार्ता के बीच ही मुस्लिम पक्ष के लोग नमाज पढ़ने चले गए। लौटकर आए तो स्वामी सत्यमित्रानन्द खड़े हुए और उन्होंने अपने अंगवस्त्र को मुस्लिम पक्ष के सामने फैलाते हुए कहा, ‘नमाज के बाद जकात (दान) देने की पंरपरा है।
मैं आपसे श्रीराम जन्मभूमि की भीख मांग रहा हूं।’ पर, मुस्लिम पक्ष चुप्पी साधे रहा। पत्र में लिखा है कि एक अन्य वार्ता के समय सैय्यद शहाबुद्दीन ने कहा था कि सिद्ध हो जाए कि मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई तो हम स्वेच्छा से हिंदुओं को दे देंगे। पर, बाद में इस वायदे का पालन भी नहीं किया गया। यही नहीं, उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ के हिंदुओं के पक्ष में निर्णय के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर कर दी गई। फोल्डर में इस मामले के सर्वोच्च न्यायालय पहुंचने का वर्णन करते हुए देश की सर्वोच्च अदालत के निर्णय के प्रमुख बिंदुओं का उल्लेख भी किया गया है।
फोल्डर में सुलह-समझौते का सच भी बताया गया है। लिखा है कि विहिप ने वार्तालाप के सभी माध्यमों से इस विवाद को सुलझाने की कोशिश की। पर, नतीजा नहीं निकला। राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में दिल्ली में शुक्रवार के दिन वार्ता थी। वार्ता के बीच ही मुस्लिम पक्ष के लोग नमाज पढ़ने चले गए। लौटकर आए तो स्वामी सत्यमित्रानन्द खड़े हुए और उन्होंने अपने अंगवस्त्र को मुस्लिम पक्ष के सामने फैलाते हुए कहा, ‘नमाज के बाद जकात (दान) देने की पंरपरा है।
मैं आपसे श्रीराम जन्मभूमि की भीख मांग रहा हूं।’ पर, मुस्लिम पक्ष चुप्पी साधे रहा। पत्र में लिखा है कि एक अन्य वार्ता के समय सैय्यद शहाबुद्दीन ने कहा था कि सिद्ध हो जाए कि मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई तो हम स्वेच्छा से हिंदुओं को दे देंगे। पर, बाद में इस वायदे का पालन भी नहीं किया गया। यही नहीं, उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ के हिंदुओं के पक्ष में निर्णय के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर कर दी गई। फोल्डर में इस मामले के सर्वोच्च न्यायालय पहुंचने का वर्णन करते हुए देश की सर्वोच्च अदालत के निर्णय के प्रमुख बिंदुओं का उल्लेख भी किया गया है।