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1961 का केस, 89 में सजा और 2016 में निपटी अपील

Sat, 30 Apr 2016 01:54 AM IST
मनोज कुमार सिंह/अमर उजाला, लखनऊ
मनोज कुमार सिंह/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sat, 30 Apr 2016 01:54 AM IST
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Verdict on 55 years old case.
- फोटो : demo pics

वाराणसी के रामेश्वर प्रसाद वाही और हीरालाल। दोनों की उम्र 80 साल से ज्यादा हो चुकी है। वर्ष 1961 के जालसाजी के एक केस में इन्हें 28 साल बाद 1989 में दोषी पाया गया। एक-एक साल की सजा और दो हजार रुपये जुर्माना लगाया गया।

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दोनों ने सजा के खिलाफ अपील की, जो 27 साल तक लंबित रही। आखिरकार बीते बुधवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने मामले का निपटारा किया।

बेंच ने इनकी दोष सिद्धि को बहाल रखते हुए उन्हें सुनाई गई सजा को 15-15 हजार रुपये जुर्माने में बदल दिया। कोर्ट ने अपीलकर्ताओं को जुर्माने की यह रकम 15 दिन में संबंधित अदालत में जमा करने केनिर्देश दिए।
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न्यायमूर्ति आदित्यनाथ मित्तल नेअपने फैसले में कहा कि 80 साल केऊपर के इन अपीलकर्ताओं को जेल भेजने का कोई फायदा नहीं होगा।

ऐसे में इनकी सजा को जुर्माने में तब्दील किया जाना न्यायहित में होगा। हालांकि इसमें कोई विवाद नहीं है कि दोनों अपीलकर्ता एक कंपनी के कर्मचारी थे और वे मामले में वास्तविक लाभ लेने वाले नहीं थे।

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69 में केस, 71 में चार्जशीट

Verdict on 55 years old case.

जालसाजी के इस केस में एफआईआर 1969 में दर्ज हुई। चार्जशीट 1971 में लगी और इसके 18 साल बाद यानी, 29 मार्च 1989 में ट्रायल कोर्ट से आरोपियों को जालसाजी के आरोप में एक-एक की साल केसाथ रेलवे कानून केतहत दो-दो हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई थी।

दोनों अपीलकर्ताओं ने अपनी अधिक उम्र का हवाला देकर अदालत से सजा में नरमी बरतने की अपील की थी। उनकी तरफ से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता आईबी सिंह का कहना था कि एक यह एक तकनीकी प्रकृति का अपराध था।

उधर, सीबीआई केवकील ने कहा कि वास्तविक लाभार्थी वो कंपनियां थीं, जिनमें ये अपीलकर्ता कर्मचारी थे। इन कंपनियों ने पहले ही जुर्माने की रकम जमा कर दी है।

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