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नैनो यूरिया बढ़ाएगी किसानों की आय: खत्म होगा सब्सिडी का भार, कालाबाजारी पर लगेगा अंकुश

Sat, 14 May 2022 03:52 PM IST
ishwar ashish अमित मुद्गल, अमर उजाला, लखनऊ
अमित मुद्गल, अमर उजाला, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Sat, 14 May 2022 03:52 PM IST
सार

नैनो यूरिया खेती के साथ ही पर्यावरण के लिए भी मुफीद है। इसके प्रयोग से कालाबाजारी पर अंकुश लगेगा। नैनो यूरिया नाइट्रोजन का मुख्य स्रोत है।

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use of nano urea will increase the income of farmers.
प्रतीकात्मक तस्वीर

विस्तार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2019 में किसानों से यूरिया का प्रयोग आधा करने का आह्वान किया था। इसी का नतीजा है कि यूरिया का बेहतर विकल्प बनकर सामने आए नैनो यूरिया को किसान धीरे-धीरे अपनाने लगे हैं। यदि इसके सही परिणाम आए तो निश्चित रूप से फसलों में परंपरागत यूरिया का प्रयोग आधा हो जाएगा। किसानों की आय भी बढ़ेगी और सरकार पर यूरिया को लेकर बढ़ रहा सब्सिडी का भार भी खत्म हो जाएगा।

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नैनो यूरिया तरल रूप में होता है और नाइट्रोजन का मुख्य स्रोत है। दावा किया जा रहा है कि इससे फसलों के उत्पादन में सात से आठ प्रतिशत की वृद्घि होगी। इससे किसानों का भरोसा भी बढ़ रहा है। खरीद व आसान ढुलाई भी इसके इस्तेमाल को बढ़ावा दे रही है। इफ्को के स्टेट हेड अभिमन्यु राय कहते हैं कि प्रदेश में कुल 72 लाख टन यूरिया की खपत है।
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नैनो यूरिया इस खपत को आधा कर सकती है। मांग के अनुरूप इसकी देश में आपूर्ति सुनिश्चित होने पर यूरिया कालाबाजारी की समस्या भी खत्म हो जाएगी। क्योंकि इस समय किसानों के लिए परंपरागत यूरिया का कोटा फिक्स है। ऐसे में कम उपलब्धता पर इसकी कालाबाजारी की समस्या बनी रहती है। वहीं नैनो यूरिया का कोटा किसानों के लिए फिक्स नहीं है।
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सीधे पत्तियों पर स्प्रे से ज्यादा लाभ
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार नैनो यूरिया नाइट्रोजन का मुख्य स्रोत है। पौधे की संरचना व वृद्धि में नाइट्रोजन का अहम रोल है। एक स्वस्थ पौधे में नाइट्रोजन की मात्रा 1.5 से 4 फीसदी तक होती है। बुरकाव या छिटकवां विधि में यूरिया पौधों की जड़ पर पड़ती है। इससे उसका 25 प्रतिशत भाग ही फसल को मिल पाता है। कुछ गैस बनकर उड़ जाता है और कुछ जड़ में चला जाता है। गैस वाला हिस्सा वायु प्रदूषण और जड़ में जाना वाला भूगर्भ जल को दूषित करता है। नैनो यूरिया का स्प्रे होता है तो यह सीधा पत्तियों पर गिरता है और पौधे को इससे ज्यादा लाभ मिलता है। उनकी नाइट्रोजन की आवश्यकता पूरी होती है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के 20 से अधिक रिसर्च सेंटरों में 94 फसलों पर इसका ट्रायल हुआ और उपज में औसतन 8 प्रतिशत की वृद्धि पाई गई।

45 किलो की बोरी की जगह 500 एमएल की बोतल
इफ्को के प्रोडक्ट नैनो यूरिया की 500 एमएल की एक बोतल उपयोग के लिए यूरिया के 45 किलो की बोरी के बराबर बताई जा रही है। 125 लीटर पानी में इसे डालने पर छिड़काव के लिए आठ टंकी जितना रसायन तैयार होता है। ठोस दानेदार यूरिया की एक बोरी की कीमत 263 रुपये है, जबकि नैनो यूरिया की एक बोतल 240 रुपये में मिल जाती है।

सरकार को दो हजार रुपये तक सब्सिडी देनी पड़ रही है

किसान को यूरिया की बोरी पर फिलहाल सरकार को दो हजार रुपये तक सब्सिडी देनी पड़ रही है। ऊपर से इसके लिए विदेश पर निर्भरता अलग समस्या है। नैनो यूरिया पर सरकार को कोई सब्सिडी नहीं देनी पड़ेगी क्योंकि यह दानेदार यूरिया से बहुत सस्ती है और आने वाले समय में देश इसके उत्पादन में आत्मनिर्भर होगा। नैनो यूरिया के प्रयोग के लिए कृषि, गन्ना विभाग आदि किसानों को स्प्रिंकलर दे रहे हैं।  इसके सही छिड़काव के लिए ड्रोन तकनीक पर भी जोर दिया जा रहा है।

उर्वरा शक्ति भी ज्यादा
भारतीय कृषि प्रणाली अनुसंधान सस्थान मेरठ के निदेशक डॉ. आजाद सिंह पवार कहते हैं कि नैनो यूरिया की उर्वरा शक्ति दानेदार यूरिया से ज्यादा है। धान, गेहूं, गन्ना, तिलहन, सब्जियाें आदि के लिए यह बेहद मुफीद है। 500 एमएल की एक बोतल पूरे एक एकड़ खेत के लिए काफी है।

उत्पादन बढ़ाने की तैयारी
यूपी नैनो यूरिया के बड़े उत्पादन की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। बरेली स्थित आंवला व प्रयागराज स्थित फूलपुर में नैनो यूरिया प्लांट बनाने का काम चल रहा है। फिलहाल अहमदाबाद से पूरी आपूर्ति की जा रही है। बंगलूरू, असम व झारखंड में प्लांट लगाए जाएंगे। पहले इन प्लांटों में नैनो यूरिया की वार्षिक प्रोडक्शन क्षमता 14 करोड़ बोतल की होगी। बाद में इसे बढ़ाकर 18 करोड़ और फिर 32 करोड़ तक ले जाया जाएगा।

हर जगह उपलब्ध
नैनो यूरिया सभी साधन सहकारी समितियों, आईएफएफडीसी, एग्री जंक्शन, डीसीएफ, मार्केटिंग समितियों, केंद्रीय उपभोक्ता भंडारण, इफ्को किसान सेवा केंद्र, मंडी समिति, इफ्को ई-बाजार आदि पर उपलब्ध हैं।

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