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यूपी: हर ग्राम पंचायत में खुलेंगे जनसेवा केंद्र, घर के पास मिलेंगी जरूरी डिजिटल सेवाएं; बनेंगे आईटी पार्क

Tue, 25 Aug 2026 10:35 PM IST
रोहित मिश्र अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ Published by: रोहित मिश्र Updated Tue, 25 Aug 2026 10:35 PM IST
सार

UP Cabinet decisions: यूपी के गांव अब बेहतर होने जा रहे हैं। सरकार ने यह फैसला किया है कि जनसेवा केंद्र बनाकर आम लोगों के लिए डिजिटल सेवाएं बढ़ाई जाएंगी। 

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UP: Public service centers will open in every gram panchayat of the state, essential digital services will be
यूपी कैबिनेट का फैसला। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

प्रदेश सरकार ने जनता को उनके घर के पास पारदर्शी, सुरक्षित और समयबद्ध डिजिटल सेवाएं देने के लिए बड़ा फैसला लिया है। राज्य में जल्द ही कॉमन सर्विस सेंटर 4.0 परियोजना लागू होने जा रही है। नई व्यवस्था के तहत प्रदेश के हर जिले में खुली और प्रतिस्पर्धी ई-निविदा प्रक्रिया के जरिए 2 डिस्ट्रिक्ट सर्विस प्रोवाइडर का चयन होगा। इससे संबंधित प्रस्ताव को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है।

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आईटी एवं इलेक्ट्रानिक्स मंत्री सुनील शर्मा ने बताया प्रस्तावित सीएससी 4.0 योजना के तहत राज्य की प्रत्येक ग्राम पंचायत में कम से कम दो जनसेवा केंद्र संचालित किए जाएंगे। इनमें से एक जनसेवा केंद्र को अनिवार्य रूप से पंचायत सचिवालयों में पंचायत सहायक के माध्यम से चलाया जाएगा। ये भी स्पष्ट किया है कि वर्तमान में काम कर रहे योग्य वीएलई ( विलेज लेवल इंटरप्रैन्योर्स) की सेवाएं जारी रहेंगी। नई व्यवस्था में उन्हें प्राथमिकता दी जाएगी। ये पूरी योजना पीपीपी मॉडल पर संचालित की जाएगी, जिससे राज्य सरकार पर कोई अतिरिक्त वित्तीय बोझ नहीं पड़ेगा। शुरुआत में इस परियोजना की अवधि तीन वर्ष तय की गई है, जिसे आवश्यकता पड़ने पर अगले दो वर्षों के लिए और बढ़ाया जा सकेगा।
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सेंटर फॉर ई-गवर्नेंस राज्य स्तरीय नोडल संस्था के रूप में नीति निर्धारण, तकनीकी मानकीकरण और मॉनिटरिंग का काम संभालेगी। राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र ई डिस्ट्रिक्ट पोर्टल के तकनीकी उन्नयन और आधुनिक डिजिटल सुविधाओं के एकीकरण को सुनिश्चित करेगा। डिस्ट्रिक्ट ई-गवर्नेंस सोसाइटी जिला स्तर पर योजना को प्रभावी ढंग से लागू करने और उसकी निगरानी करने के लिए जिम्मेदार होगी।

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3 लाख से अधिक छूटे छात्रों को शुल्क भरपाई का रास्ता साफ

कैबिनेट ने वर्ष 2025-26 के उन पात्र छात्रों के लिए छात्रवृत्ति के साथ शुल्क भरपाई के प्रस्ताव को हरी झंडी दे दी है, जिन्हें विभिन्न कारणों भुगतान नहीं हो पाया था। इनके लिए छात्रवृत्ति का पोर्टल दुबारा खोला जाएगा। इन छात्रों की कुल संख्या 3 लाख 16 हजार 57 है। इस पर 551.85 करोड़ रुपये का व्यय-भार आएगा।

इन छूटे छात्रों में एससी, एसटी, सामान्य, अन्य पिछड़ा और अल्पसंख्यक वर्ग के छात्र शामिल हैं। सामान्य, ओबीसी और अल्पसंख्यक वर्ग के छात्रों के लिए देयता अगले वित्त वर्ष में बकाया न रहने का प्रावधान है। यानी, वित्त वर्ष समाप्त होने पर संबंधित विभागों पर देयता का भार नहीं रहता है। इसलिए इस प्रस्ताव को कैबिनेट में लाना पड़ा।

ये छात्र शिक्षण संस्थान, विश्वविद्यालयों और संबद्धता देने वाली एजेंसियों के स्तर पर मास्टर डाटा लॉक नहीं होने के कारण लाभ नहीं पा सके थे। डीएलएड आदि का परीक्षाफल समय से न आने, पीएफएमएस से रिजेक्ट होने, फीस न भरे होने, जिलास्तरीय समिति पर आवेदन लंबित रहने या ट्रांजेक्शन फेल होने के कारण भुगतान नहीं हो सका था।

छोटे शहरों में भी आईटी पार्क बनाने का रास्ता साफ

 राज्य सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी जनित सेवा नीति-2022 में कई महत्वपूर्ण संशोधनों को मंजूरी दी है। इसका मुख्य उद्देश्य राज्य में निवेश को आकर्षित करना, नवाचार (इन्नोवेशन) को बढ़ावा देना और बड़े पैमाने पर उच्च गुणवत्ता वाले रोजगार सृजित करना है। इससे छोटे शहरों में भी आईटी पार्क बनाने का रास्ता साफ हो गया है।

इस संशोधन के जरिये उप्र ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (जीसीसी) नीति और अन्य प्रगतिशील राज्यों की तर्ज पर एक प्रतिस्पर्धी और आकर्षक निवेश माहौल तैयार किया जाएगा। संशोधित नीति के तहत प्रदेश में पहले से स्थापित और भविष्य में आने वाली लघु, मध्यम तथा वृहद आईटी/आईटीईएस इकाइयों के विकास के लिए पात्रता मानकों को सरल और लचीला बनाया गया है। 

अब पूंजी निवेश आधारित मॉडल के साथ-साथ रोजगार सृजन और व्यवसायिक क्षमता को भी पात्रता का मुख्य पैमाना माना जाएगा। इसका सबसे बड़ा फायदा टियर-2 और टियर-3 शहरों में काम कर रहे स्टार्टअप्स और नई आईटी कंपनियों को मिलेगा। इसके तहत आईटी पार्क और आईटी सिटी स्थापित करने के लिए जरूरी न्यूनतम भूमि (क्षेत्रफल) की अनिवार्यता को भी तर्कसंगत और व्यावहारिक बना दिया है। स्टार्टअप्स, नए उद्यमियों और सूक्ष्म एवं लघु आईटी इकाइयों को सस्ते और किफायती कार्यस्थल (वर्कस्पेस) उपलब्ध कराने पर विशेष ध्यान दिया गया है। इसके लिए को-वर्किंग स्पेस डेवलपर्स को नीति के तहत सरकार की ओर से पूंजीगत सहायता (कैपिटल असिस्टेंस) दी जाएगी।

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