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यूपी : मायावती की बसपा में अब सतीश ही बड़े नेता, ज्यादातर नेता या तो निकाल दिए गए, या छोड़ गए
Fri, 04 Jun 2021 09:56 AM IST
पंकज श्रीवास्तव
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ/महेंद्र तिवारी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ/महेंद्र तिवारी
Published by: पंकज श्रीवास्तव
Updated Fri, 04 Jun 2021 09:56 AM IST
सार
लोकसभा चुनाव में बना सपा-बसपा गठबंधन टूटने के बाद बसपा नेताओं की सपा में जाने की लाइन लग गई। पूर्व मंत्री इंद्रजीत सरोज, आरके चौधरी व राम प्रसाद चौधरी सहित बड़ी संख्या में पुराने नेता, कोऑर्डिनेटर व पदाधिकारी सपा पहुंच चुके हैं।
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सतीश चंद्र मिश्रा
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विस्तार
मायावती के नेतृत्व वाली बसपा में उनके अलावा अब सिर्फ सतीश चंद्र मिश्रा ही बड़े नेता रह गए हैं। बाकी सभी प्रमुख नेता एक-एक कर या तो बसपा छोड़ गए या निष्कासित कर दिए गए। जो नेता हैं भी, उनकी कोई खास भूमिका नहीं रह गई है।
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बसपा संस्थापक कांशीराम के मूवमेंट व उसके बाद जुड़े ज्यादातर प्रमुख नेता अब बसपा से बाहर हो चुके हैं। कांशीराम की बसपा में पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी, राज बहादुर, आरके चौधरी, दीनानाथ भास्कर, मसूद अहमद, बरखूराम वर्मा, दद्दू प्रसाद, जंगबहादुर पटेल और सोनेलाल पटेल जैसे नेताओं की लंबी फेहरिस्त हुआ करती थी। स्वामी प्रसाद मौर्य, जुगुल किशोर, सतीश चंद्र मिश्र, रामवीर उपाध्याय, सुखदेव राजभर, जयवीर सिंह, ब्रजेश पाठक, रामअचल राजभर, इंद्रजीत सरोज, मुनकाद अली और लालजी वर्मा भी बसपा की रीति-नीति के सहभागी बने।
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ये सभी अपने-अपने समाज व क्षेत्र में अच्छा प्रभाव रखते रहे हैं। कई लोगों की बसपा काडर के बीच प्रदेश स्तर पर खासा प्रभाव हुआ करता था। मगर, बसपा में मायावती का प्रभाव जैसे-जैसे बढ़ा एक-एक नेता बसपा से बाहर होते गए। कई ने अपनी पार्टी या संगठन बनाकर अलग राह चुनी तो ज्यादातर दूसरे दलों के साथ हो लिए।
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हाल के वर्षों में नसीमुद्दीन सिद्दीकी सहित कई लोग आज कांग्रेस में चले गए तो स्वामी प्रसाद मौर्य, ब्रजेश पाठक, जुगुल किशोर व दीनानाथ भास्कर सहित तमाम पुराने चेहरे भाजपा के साथ आ गए। लोकसभा चुनाव में बना सपा-बसपा गठबंधन टूटने के बाद बसपा नेताओं की सपा में जाने की लाइन लग गई। पूर्व मंत्री इंद्रजीत सरोज, आरके चौधरी व राम प्रसाद चौधरी सहित बड़ी संख्या में पुराने नेता, कोऑर्डिनेटर व पदाधिकारी सपा पहुंच चुके हैं।
राम अचल राजभर और लालजी वर्मा के निष्कासन के साथ बसपा स्थापना से लेकर संघर्ष की यात्रा से जुड़े अधिकतर प्रमुख नेता बसपा से बाहर हो चुके हैं। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष सुखदेव राजभर जैसे पुराने नेता हैं भी तो कोई बड़ी भूमिका नजर नहीं आ रही है। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष मुनकाद अली को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने के बाद मुख्य सेक्टर प्रभारी तक की जिम्मेदारी लगातार बदलती रही है।
बसपा के राज्यसभा सदस्य व राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा इकलौते नेता हैं जो मायावती के साथ मुख्य भूमिका में अब भी नजर आ रहे हैं। हालांकि पार्टी में उनकी एक्टिविटी चुनाव के आसपास ही ज्यादा नजर आती है। बाकी समय वह केंद्रीय राजनीति में ही पार्टी का प्रतिनिधित्व करते नजर आ रहे हैं।
बसपा के लिए भी बड़ा झटका
रामअचल राजभर व लालजी वर्मा का निष्कासन इन नेताओं के लिए ही नहीं बसपा के लिए भी बड़ा झटका है। बसपा के सत्ता से बाहर होने के बाद भी स्वामी प्रसाद मौर्य, राम अचल राजभर व लालजी वर्मा की तिकड़ी पिछड़ी जातियों का मजबूत प्रतिनिधित्व करती थी। तीनों अपने अपने-अपने समाज के साथ उनसे मिलती-जुलती अन्य पिछड़ी जातियों में भी खासा असर रखते रहे हैं। सरकारें आती-जाती रही, ये चुनाव जीतते रहे हैं। करीब पांच वर्ष पहले स्वामी प्रसाद मौर्य ने बसपा छोड़ी और अब राम अचल राजभर और लालजी वर्मा निष्कासित कर दिए गए। बसपा को पिछड़े वर्गों में आधार बढ़ाने के लिए नए चेहरों को लाने की चुनौती है।
विधानसभा चुनाव से पहले नई लीडरशिप का इंतजार
आगामी विधानसभा चुनाव से पहले पिछड़े समाज के दो बड़े नेताओं के निष्कासन के बाद बसपा में प्रदेश स्तर पर नई चेहरे तैयार करने की चुनौती है। बसपा ने भीम राजभर को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर राजभर समाज में नया चेहरा जरूर दिया, लेकिन वह रामअचल राजभर या अन्य दूसरे राजभर नेताओं की तरह अभी तक प्रदेश स्तर पर स्थापित नहीं हो पाए हैं। गुड्डू जमाली को विधानमंडल दल का नेता बनाकर मुस्लिम समाज में नया नेतृत्व उभारने की कोशिश की है। इसी तरह प्रदेश की राजनीति में कुर्मी व अन्य पिछड़े वर्गों को जोड़ने के लिए नए नेतृत्व को खड़ा करना होगा।