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UP: वोटरों पर सास-ससुर से ज्यादा रही बहू की छाप, विरासत संभालने के बाद खूब चला सियासत में सोनिया गांधी का जादू
Sun, 07 Apr 2024 02:11 PM IST
शाहरुख खान
धर्मेश त्रिवेदी, अमर उजाला, रायबरेली
धर्मेश त्रिवेदी, अमर उजाला, रायबरेली
Published by: शाहरुख खान
Updated Sun, 07 Apr 2024 02:11 PM IST
सार
परिवार की विरासत संभालने के बाद सियासत में सोनिया गांधी का रायबरेली लोकसभा सीट पर खूब जादू चला। साल 2019 को छोड़ बाकी में अधिक वोट पाने और जीत का रिकॉर्ड बनाया।
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UP Lok Sabha Election 2024
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
लहर कोई भी रही हो। रंगत किसी की भी रहे, लेकिन गांधी परिवार के बिना रायबरेली की राजनीति की चर्चा अधूरी रहती है। पहले फिरोज गांधी तो फिर उनकी पत्नी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी रायबरेली की राजनीति में छाई रहीं। इंदिरा गांधी ने यहां से चुनाव जीतकर प्रधानमंत्री का सफर तय किया।
बावजूद इसके वोटरों पर अच्छी पकड़ होने की बात करें तो सास-ससुर से ज्यादा सांसद सोनिया गांधी की छाप रही है। 1952 से 2019 के लोकसभा चुनाव के आंकड़े बताते हैं कि इंदिरा और सोनिया गांधी किस तरह वोटरों को अपने पाले में करने में कामयाब रहीं। यही वजह है कि वर्ष 2019 का चुनाव छोड़ दिया जाए तो अधिक वोट पाने और जीत में उन्होंने रिकॉर्ड बनाया।
एक बार फिर लोकसभा चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। जिले में चुनावी सरगर्मी तेज हो गई हैं। सोनिया गांधी के राज्यसभा चले जाने के बाद असमंजस की स्थिति है कि गांधी परिवार की विरासत अब कौन संभालेगा। वर्ष 2004 के चुनाव में सास इंदिरा गांधी की विरासत संभालने के बाद सोनिया गांधी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
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पहले ही चुनाव में उन्होंने दो लाख 49 हजार 765 वोटों से जीत हासिल करके सबको चौंका दिया। सोनिया की वोटरों में पकड़ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2004 व 2006 में सपा और वर्ष 2009 के चुनाव में बसपा के उम्मीदवारों के मैदान में आने के बाद भी उनकी जीत का अंतर कम नहीं हुआ।
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बावजूद इसके वोटरों पर अच्छी पकड़ होने की बात करें तो सास-ससुर से ज्यादा सांसद सोनिया गांधी की छाप रही है। 1952 से 2019 के लोकसभा चुनाव के आंकड़े बताते हैं कि इंदिरा और सोनिया गांधी किस तरह वोटरों को अपने पाले में करने में कामयाब रहीं। यही वजह है कि वर्ष 2019 का चुनाव छोड़ दिया जाए तो अधिक वोट पाने और जीत में उन्होंने रिकॉर्ड बनाया।
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एक बार फिर लोकसभा चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। जिले में चुनावी सरगर्मी तेज हो गई हैं। सोनिया गांधी के राज्यसभा चले जाने के बाद असमंजस की स्थिति है कि गांधी परिवार की विरासत अब कौन संभालेगा। वर्ष 2004 के चुनाव में सास इंदिरा गांधी की विरासत संभालने के बाद सोनिया गांधी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।
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पहले ही चुनाव में उन्होंने दो लाख 49 हजार 765 वोटों से जीत हासिल करके सबको चौंका दिया। सोनिया की वोटरों में पकड़ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2004 व 2006 में सपा और वर्ष 2009 के चुनाव में बसपा के उम्मीदवारों के मैदान में आने के बाद भी उनकी जीत का अंतर कम नहीं हुआ।
रायबरेली का किला ढहाने का दंभ भर रही भाजपा भी कोई कमल नहीं कर पाई। सोनिया गांधी के हटने के बाद अब भाजपा कांग्रेस के गढ़ में किलेबंदी मजबूत करने की कोशिश शुरू कर दी है।
विनय कटियार भी नहीं कर पाए कमाल, बन गया रिकार्ड
वर्ष 2006 का उपचुनाव खूब सियासत भरा रहा। भाजपा ने गांधी परिवार का गढ़ ढहाने के लिए हिंदूवादी नेता विनय कटियार को चुनाव मैदान में उतारा था। बावजूद इसके सोनिया गांधी का वोटरों पर खूब जादू चला।
वर्ष 2006 का उपचुनाव खूब सियासत भरा रहा। भाजपा ने गांधी परिवार का गढ़ ढहाने के लिए हिंदूवादी नेता विनय कटियार को चुनाव मैदान में उतारा था। बावजूद इसके सोनिया गांधी का वोटरों पर खूब जादू चला।
- यही वजह रही कि चार लाख 17 हजार 888 मतों से जीत हासिल करके सोनिया गांधी ने रायबरेली लोकसभा चुनाव के इतिहास का अब तक का सर्वाधिक बड़ी जीत का रिकॉर्ड बना दिया। इस उप चुनाव में भाजपा तीसरे, जबकि सपा दूसरे नंबर पर रही।
दिनेश ने खड़ी कर दी नई लकीर
वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी दिनेश प्रताप सिंह ने नई लकीर खड़ी करते हुए सोनिया गांधी के जीत का अंतर कम कर दिया। हालांकि सोनिया गांधी ने पांच लाख से ज्यादा वोट बटोरे, लेकिन दिनेश ने भी तीन लाख से ज्यादा वोट झटके। इससे जरूर कांग्रेसी खेमे में जरूर निराशा हुई।
वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी दिनेश प्रताप सिंह ने नई लकीर खड़ी करते हुए सोनिया गांधी के जीत का अंतर कम कर दिया। हालांकि सोनिया गांधी ने पांच लाख से ज्यादा वोट बटोरे, लेकिन दिनेश ने भी तीन लाख से ज्यादा वोट झटके। इससे जरूर कांग्रेसी खेमे में जरूर निराशा हुई।
कांग्रेस के साथ ही भाजपा में भी प्रत्याशी पर माथापच्ची
अमेठी के बाद भाजपा रायबरेली का किला ढहाने का दंभ तो भर रही है, लेकिन लोकसभा चुनाव की रणभेरी बजने के बाद प्रत्याशी तय नहीं कर पा रही है। हालात ये हैं कि गांधी परिवार के गढ़ में उम्मीदवार चयन करने में भाजपा हाईकमान को माथापच्ची करनी पड़ रही है। कई दावेदारों की चर्चाएं हर दिन उठती हैं और फिर अपने आप शांत हो जाती हैं।
अमेठी के बाद भाजपा रायबरेली का किला ढहाने का दंभ तो भर रही है, लेकिन लोकसभा चुनाव की रणभेरी बजने के बाद प्रत्याशी तय नहीं कर पा रही है। हालात ये हैं कि गांधी परिवार के गढ़ में उम्मीदवार चयन करने में भाजपा हाईकमान को माथापच्ची करनी पड़ रही है। कई दावेदारों की चर्चाएं हर दिन उठती हैं और फिर अपने आप शांत हो जाती हैं।