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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   UP: It is not just the rainfall, but the pattern that is changing; fifth June drought since 1901—read the BSIP

UP: अब बारिश नहीं, उसका पैटर्न बदल रहा, 1901 के बाद जून में पड़ा पांचवां सूखा; पढ़ें बीएसआईपी की रिपोर्ट

Fri, 03 Jul 2026 09:13 AM IST
Akash Dwivedi विनीत चतुर्वेदी, अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
विनीत चतुर्वेदी, अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ Published by: Akash Dwivedi Updated Fri, 03 Jul 2026 09:13 AM IST
सार

देश में मानसून का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार अब समस्या केवल कम वर्षा नहीं, बल्कि बारिश का असमान और अनिश्चित वितरण है। लंबे अध्ययन और हालिया मौसम आंकड़ों से संकेत मिले हैं कि इसका असर खेती, जल संसाधनों, शहरी जीवन और पर्यावरण पर लगातार बढ़ सकता है।

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UP: It is not just the rainfall, but the pattern that is changing; fifth June drought since 1901—read the BSIP
बदल रहा देश का बारिश पैटर्न - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

भारत के सामने अब चुनौती केवल कम या ज्यादा बारिश की नहीं, बल्कि बदलते मानसून-पैटर्न की है। वर्ष 2026 में देश ने 1901 के बाद का पांचवां सबसे सूखा जून देखा। कई राज्यों में मानसून करीब दो सप्ताह तक ठहरा रहा, जबकि कुछ क्षेत्रों में कुछ ही घंटों की मूसलाधार बारिश ने बाढ़ जैसे हालात बना दिए।

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मौसम वैज्ञानिक इसे भारतीय मानसून के बदलते पैटर्न का संकेत मान रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि सबसे बड़ा खतरा बारिश की कमी नहीं, उसकी अनिश्चितता है। यदि यही प्रवृत्ति रही तो भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती कम वर्षा नहीं, बल्कि उसका अनिश्चित और असमान वितरण है। यह बदलाव खेती, जल सुरक्षा और शहरों के लिए सबसे बड़ा जोखिम बन सकता है।

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2700 वर्षों के इतिहास से मिले अहम संकेत

लखनऊ स्थित बीएसआईपी की लगभग 2700 वर्षों के मानसूनी इतिहास पर आधारित अध्ययन ने इस बहस को नया आधार दिया है। बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान के निदेशक प्रो. एमजी. ठक्कर की निगरानी में वैज्ञानिक डॉ. अंजलि, अनुपम ने मध्य प्रदेश के बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व की प्राचीन झीलों की तलछट में सुरक्षित जीवाश्म परागकणों और वनस्पति अवशेषों का अध्ययन कर पिछले करीब 2700 वर्षों के मानसून, वनस्पति और मानव गतिविधियों का डाटा जुटाया है।

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अध्ययन में बताया गया कि भारतीय मानसून पहले भी कई बार अपने स्वभाव में बड़े बदलाव ला चुका है। हर बदलाव के साथ जंगल, खेती और मानव बसावट का स्वरूप भी बदला। अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका ''''क्वार्टनरी रिसर्च''''ने इसे प्रकाशित किया है।

 

आज के मानसून में वही पैटर्न क्यों दिख रहा है?

वैज्ञानिकों का कहना है कि अब कुल बारिश से ज्यादा उसकी वितरण प्रणाली बदल रही है। बारिश वाले दिन घट रहे हैं, लेकिन कम समय में ज्यादा वर्षा हो रही है। इससे फ्लैश फ्लड, शहरी जलभराव, अधिक नमी के कारण बढ़ता हीट इंडेक्स और अचानक गर्मी जैसी स्थितियां बन रही हैं। विशेषज्ञ इसे उभरती हुई''''फ्लड-ड्रॉट साइकिल'''' मान रहे हैं, जो भविष्य में और गंभीर हो सकती है।

जून रहा कमजोर, जुलाई भी चुनौतीपूर्ण

भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के अनुसार जून 2026 में देश में सामान्य से करीब 40 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज हुई, जिससे यह 1901 के बाद पांचवां सबसे शुष्क जून बन गया। जुलाई में भी सामान्य से कम वर्षा की संभावना जताई गई है। हालांकि कुछ क्षेत्रों में भारी बारिश के दौर आ सकते हैं।

 

क्यों कमजोर पड़ा मानसून

जून में मानसूनी हवाएं अधिकांश समय कमजोर रहीं। मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन (एमजेओ) अनुकूल स्थिति में नहीं था, उत्तर हिंद महासागर में प्री-मानसून लो-प्रेशर सिस्टम और चक्रवात भी लगभग नहीं बने। इसके साथ ही मजबूत एल-नीनो ने भी मानसून पर दबाव डाला।

जून में देश में सामान्य 165.3 मिमी के मुकाबले केवल 99.5 मिमी बारिश हुई। यह सामान्य से 39.8 प्रतिशत कम है। मानसून केरल तीन दिन देरी से पहुंचा और पश्चिम व मध्य भारत में करीब दो सप्ताह तक उसकी प्रगति लगभग थमी रही। इसका सीधा असर खरीफ बुवाई पर पड़ा। धान, मक्का, कपास और सोयाबीन जैसी फसलों की बुवाई पिछले वर्ष की तुलना में काफी पीछे चल रही है।

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