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यादव सिंह को बचाने की हर सरकारी कोशिश नाकाम

Fri, 17 Jul 2015 02:28 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Fri, 17 Jul 2015 02:28 AM IST
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UP govt could not save Yadav Singh.

इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के बाद सीबीआई के फंदे में फंसे नोएडा के चर्चित पूर्व मुख्य अभियंता यादव सिंह को बचाने के लिए सरकार का न्यायिक आयोग बनाने का दांव भी नहीं चल सका।

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हाईकोर्ट ने यह कहते हुए यादव सिंह के मामले की सीबीआई जांच का आदेश दिया है कि उसे राज्य सरकार के जांच आयोग पर भरोसा नहीं है। पिछले साल यादव सिंह के ठिकानों पर आयकर के छापे में अकूत संपत्ति मिलने पर पहले तो राज्य सरकार कार्रवाई से बचती रही फिर चौतरफा दबाव के बाद सरकार ने उसे निलंबित किया।
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आयकर विभाग द्वारा यादव सिंह के ठिकानों पर 28 नवंबर 2014 को छापा मारा गया था, जिसमें करोड़ों की नगदी व हीरे-जवाहरात मिले थे। इसके बाद भी राज्य सरकार आयकर व प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जांच की दुहाई देकर उसके खिलाफ कोई कार्रवाई करने से बचती रही।
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इसे लेकर राजनीतिक दलों ने तो सरकार की घेरेबंदी की ही, राज्यपाल ने भी सरकार के रवैये पर नाराजगी जताई थी। चौतरफा दबाव पड़ने पर 8 दिसंबर 2014 को सरकार ने उसे सस्पेंड किया।

यादव सिंह मामले की सीबीआई जांच के लिए दाखिल पीआईएल पर जब हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने 16 दिसंबर 2014 को राज्य सरकार से जवाब-तलब किया तो 10 फरवरी 2015 को जांच के लिए जस्टिस एएन वर्मा की अध्यक्षता में न्यायिक आयोग का गठन कर दिया गया। इसके पीछे यह वजह थी कि 16 फरवरी 2015 को हाईकोर्ट में इस मामले की सुनवाई होनी थी।

बताया कि सीबीआई जांच का कोई औचित्य नहीं

UP govt could not save Yadav Singh.

यह यादव सिंह का रसूख ही था कि मामले की जांच सीबीआई के हाथ में जाने से रोकने के लिए सरकार ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया।

वकीलों की लंबी-चौड़ी फौज के साथ महाधिवक्ता विजय बहादुर सिंह खुद हाईकोर्ट में मोर्चा संभाले रहे। उनकी दलील थी कि न्यायिक आयोग यादव सिंह मामले की जांच कर रहा है। ऐसे में सीबीआई जांच का कोई औचित्य नहीं है।

मायावती सरकार के चहेते रहे यादव सिंह की अखिलेश सरकार में भी तूती बोल रही थी। सत्तारूढ़ दल के कई बड़े नेताओं और वरिष्ठ नौकरशाहों से उसके करीबी संबंध बताए जाते हैं।

कहा तो यहां तक जाता है कि समाजवादी पार्टी के एक बड़े नेता की सिफारिश पर ही यादव सिंह को नोएडा के साथ-साथ ग्रेटर नोएडा व यमुना एक्सप्रेस-वे अथॉरिटी के चीफ इंजीनियर का भी चार्ज दिया गया था।

सत्ता पर यादव सिंह की मजबूत पकड़ का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आयकर के छापे में अकूत संपत्ति का खुलासा होने के बाद कई दिनों तक मामले की एफआईआर तक दर्ज नहीं हुई।

अपने हिसाब से समीकरण बनाने का महारथी

UP govt could not save Yadav Singh.

यादव सिंह अपने हिसाब से समीकरण बनाने का महारथी माना जाता है। बसपा सरकार हो या फिर सपा की, उसने अपने हिसाब से मनमाफिक तैनाती कराई। बसपा सरकार में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में सभी महत्वपूर्ण कामों पर यादव सिंह का एकाधिकार रहा। भाजपा के वरिष्ठ नेता किरीट सोमैया ने यादव सिंह की कई फर्जी कंपनियों का खुलासा किया था और यह भी आरोप लगाया था कि उनके मायावती के भाई के साथ व्यावसायिक संबंध हैं।

2012 में यादव सिंह पर शुरू में सपा सरकार की नजर भले ही टेढ़ी हुई हो, लेकिन सपा के एक शीर्ष नेता के इशारे पर यादव सिंह को 17वें महीने में ही बहाल कर दिया गया और पहले नोएडा फिर ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेस-वे जैसे तीन महत्वपूर्ण अथॉरिटी का मुख्य अभियंता बना दिया गया। यह बहाली इतनी गुपचुप तरीके से हुई कि तत्कालीन मुख्य सचिव जावेद उस्मानी तक को इसकी भनक नहीं लग सकी थी।

जेई से चीफ इंजीनियर तक का सफर
यादव सिंह ने औद्योगिक विकास प्राधिकरण में 1981 में बतौर अवर अभियंता के तौर पर जॉइन किया। प्राधिकरण में आने के बाद से ही वह अपने हिसाब से पोस्टिंग पाता रहा। यादव सिंह ने  2011 में औद्योगिक विकास प्राधिकरण से एक नया पद सृजित कराया और इसे नाम दिया गया इंजीनियर इन चीफ। इसके अधीन नोएडा और ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी दोनों कर दिया गया।

इसके बाद नोएडा और ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी से यादव सिंह के इशारे पर ही सारे काम दिए गए। दिसंबर 2011 में नोएडा अथॉरिटी के 954 करोड़ रुपये का काम केवल 10 दिन के अंदर ही चहेती कंपनियों को बांटने के बाद ज्यादा चर्चा में आए।

अपने हिसाब से कराता सीईओ की तैनाती

UP govt could not save Yadav Singh.

यादव सिंह की हनक का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि नोएडा और ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी में वह सीईओ की तैनाती अपने हिसाब से कराता था। जिसने भी उसकी नहीं सुनी या अनदेखी करने की कोशिश की यादव सिंह ने उसे हटवा दिया।

आनन-फानन में जारी हुआ आदेश

यादव सिंह मामले की सीबीआई जांच की मांग संबंधी पीआईएल पर बुधवार को सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की कड़ी फटकार और उसके सख्त रुख को देखते हुए जांच में जस्टिस वर्मा आयोग द्वारा आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) की मदद लेने संबंधी आदेश भी आनन-फानन में बैक डेट से जारी कर दिया गया।

दरअसल, बुधवार को कोर्ट के रुख से ही संकेत मिलने लगे थे कि मामले की जांच सीबीआई को सौंपी जा सकती है। ऐसे में सरकार की ओर एक और पासा फेंका गया। जस्टिस वर्मा आयोग से शासन को चिट्ठी भिजवाई गई कि चूंकि यादव सिंह प्रकरण में आर्थिक मामले भी शामिल हैं, जिसकी जांच के लिए ईओडब्ल्यू के सहयोग की आवश्यकता है।

पत्र में आयोग की ओर से शासन से जांच में ईओडब्ल्यू के सहयोग की अपेक्षा की गई थी। इसके बाद आनन-फानन में बैक डेट में आदेश जारी किया गया कि यादव सिंह मामले की जांच में ईओडब्ल्यू आयोग की मद्द करेगा।

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