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Ground Report: मक्के की खेती से मालामाल हो रहे यूपी के किसान, कम लागत में कमा रहे अधिक मुनाफा

Tue, 12 May 2026 09:42 AM IST
Bhupendra Singh चंद्रभान यादव, अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
चंद्रभान यादव, अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ Published by: Bhupendra Singh Updated Tue, 12 May 2026 09:42 AM IST
सार

Ground Report: यूपी के किसान मक्के की खेती से मालामाल हो रहे हैं। कम लागत में अधिक मुनाफा कमा रहे हैं। आलू बेल्ट में लगातार जायद सीजन में मक्के की खेती बढ़ रही है। आगे पढ़ें पूरी खबर...

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UP Farmers Striking It Rich with Maize Cultivation Earning High Profits at Low Cost
मक्के की खेती - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

आलू बेल्ट में तीखी धूप के बाद भी खेतों में हर तरफ हरियाली दिखती है। यह हरियाली मक्के की फसल की है,जो आलू से तबाह हुए किसानों के चेहरे पर संतोष का भाव ला रही है। उन्हें भरोसा है कि मक्के की फसल से न सिर्फ आलू का घाटा पूरा होगा बल्कि वे मालामाल होंगे। क्योंकि इस खेती में लागत नाम मात्र की लगी है।
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आलू बेल्ट के खेतों में पूर्वांचल और बुंदेलखंड की तरह धूल उड़ती नहीं दिखती है, बल्कि हर तरफ मक्के की फसल की हरियाली है। मक्के के एक- एक पौधे में दो से तीन बालियां दिखती हैं। किसान इस खेती के दम पर भविष्य की योजनाएं बना रहे हैं। फर्रुखाबाद, कन्नौज, इटावा, औरैया, कानपुर देहात सहित आसपास के जिलों में जहां आलू ने किसानों के सपने चकनाचूर कर दिए हैं, वहां अब मक्के ने हिम्मत दी है। 
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आलू की खोदाई होते ही मक्के की बोआई कर दी

फर्रुखाबाद के राजेपुर के किसान राजित सिंह कहते हैं कि आलू की खोदाई होते ही मक्के की बोआई कर दी। वह भी बिना खाद के। तेज आंधी नहीं आई तो इस बार मक्का मालामाल करेगा। कमालगंज के किसान वीरेंद्र शुक्ला को भी इसी तरह की उम्मीद है। 

कहते हैं बोआई के चंद दिनों बाद ही हल्की बारिश हुई। चार की जगह दो बार ही पानी देना पड़ा है। कन्नौज के कासिमपुर निवासी हरिशंकर लोधी, विनोद वर्मा भी मक्के की बालियां दिखाकर ईश्वर का आभार जताते हैं। वहीं, बिल्हौर के किसानों को उम्मीद है कि वे मक्के की फसल से अपनी जरूरतें पूरी कर पाएंगे।
 
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मुख्यमंत्री के दौरे के बाद तेजी से बढ़ा रकबा

छिबरामऊ के किसान राजेंद्र कुमार कहते हैं कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले वर्ष मक्के का हवाई सर्वे किया था। इसके बाद से विभागीय अधिकारियों ने किसानों को प्रोत्साहित करना शुरू किया। दो साल फायदा भी दिखा। ऐसे में इस वर्ष रकबा बढ़ गया है। 

त्वरित मक्का विकास योजना में 150 रुपये प्रति किलो अनुदान दिया जा रहा है। इसमें किसानों को बीज पर 15 हजार रुपये प्रति क्विंटल अनुदान मिलता है। संकर मक्का और देसी मक्का के साथ ही स्वीट कॉर्न, बेबी कॉर्न, और पॉप कॉर्न जैसी प्रजातियों के बीजों पर भी 50% तक अनुदान उपलब्ध है। प्रदर्शन कार्यक्रमों में 3,000 से 20,000 रुपये प्रति एकड़ तक का अनुदान प्रदान किया जा रहा है।
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साल दर साल बढ़ रहा है रकबा

कृषि विभाग के अपर निदेशक डॉ. राजेश कुमार बताते हैं कि जायद सीजन में मक्के का रकबा साल दर साल बढ़ रहा है। वर्ष 2024-25 में 8.65 लाख हेक्टेयर मक्के की फसल का लक्ष्य था, जो 10.85 लाख हेक्टेयर पहुंच गया है। यह लक्ष्य वर्ष 2027-28 का था। इसी तरह उत्पादन 22.93 लाख मीट्रिक टन के सापेक्ष 30.55 लाख मीट्रिक टन हो गया है। उत्पादकता 26.51 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के सापेक्ष 28.15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हो गया है।

क्यों बढ़ रही है यह खेती

किसान महेश सिंह सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। वह खेती का अर्थशास्त्र समझाते हैं। बताते हैं कि आलू के खेत में मक्के की खेती करने पर ज्यादा खाद, जोताई आदि की जरूरत नहीं पड़ती है। प्रति बीघा करीब तीन से छह हजार लागत आती है, जबकि कीमत करीब 15 से 20 हजार रुपये मिलती है। जो मक्का भीगने से काला पड़ता है उसे बदायूं की शराब फैक्ट्री भेजा जाता है। कच्चा मक्का बाजार में 20-25 रुपये प्रति किलो बिक जाता है।

गांवों में पहुंचते हैं खरीदार

कम फसल वाले किसानों को बेचने में दिक्कत नहीं होती है। गांवों में पहुंच रहे खरीदार इसे एथेनॉल उत्पादन, पशु चारा, और मुर्गी पालन उद्योग से जुड़े लोगों तक पहुंचाते हैं।

मक्का की खेती से निकल जाता है सालभर का खर्च

मोहम्मदाबाद के किसान सुनील सिंह बताते हैं कि कृषि विभाग के अधिकारियों व वैज्ञानिकों ने मक्के की फसल को लेकर सलाह व प्रशिक्षण दिया। आलू के बाद मक्के की खेती से होने वाली आय अतिरिक्त होती है। आलू में घाटा भी हुआ तो मक्के से सालभर का खर्चा निकल जाता है। खेती के दम पर एक बेटा और दो बेटियां कानपुर में उच्च शिक्षा हासिल कर रही हैं।

सिर्फ जायद सीजन में बढ़ता रकबा

वर्ष क्षेत्रफल उत्पादन
2021-22 0.48 1.38
2022-23 0.49 1.42
2023-24 3.03 10.62
2024-25 5.13 17.82

(स्त्रोतः कृषि विभाग, क्षेत्रफल लाख हेक्टेयर एवं उत्पादन लाख मीट्रिक टन में)
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