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यूपी निकाय चुनाव : सुप्रीम कोर्ट में भी आसान नहीं है सरकार की राह, सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय बदला तो ही राहत
Wed, 28 Dec 2022 12:11 AM IST
पंकज श्रीवास्तव
अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
Published by: पंकज श्रीवास्तव
Updated Wed, 28 Dec 2022 12:11 AM IST
सार
सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता जयदीप नारायण माथुर का कहना है कि उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की लाइन पर ही फैसला सुनाया है। उच्च न्यायालय से बोल्ड जजमेंट दिया था, इसी तरह के फैसले की उम्मीद थी। उनका मानना है कि सरकार एक बार तो सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर करेगी लेकिन वहां भी सरकार को राहत मिलना मुश्किल है।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : Social Media
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विस्तार
नगरीय निकाय चुनाव में ओबीसी आरक्षण को लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के बाद अब सरकार सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर करेगी। विधिक विशेषज्ञों का मानना है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की लाइन पर ही अपना फैसला सुनाया है इसलिए सर्वोच्च न्यायालय में भी सरकार के लिए राह आसान नहीं होगी। सर्वोच्च न्यायालय ने यदि अपना ताजा फैसला बदला तब ही सरकार को राहत मिल सकती है।
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इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंगनाथ पांडेय का कहना उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के परिपेक्ष्य में ही निर्णय दिया है। इस निर्णय में कुछ भी अविधिक या अनियमित नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा है कि निकाय चुनाव में ओबीसी आरक्षण तब ही लागू कर सकते हैं जब आयोग का गठन करेंगे। आयोग के जरिये पिछड़े वर्ग के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन का आकलन करेंगे। लेकिन जब तक ऐसा नहीं करते हैं तब तक पिछड़ों को आरक्षण नहीं दे सकते है। उनका मानना है कि सरकार को उच्च न्यायालय के फैसले के तहत एससी, एसटी और महिला आरक्षण का निर्धारित कर चुनाव कराना चाहिए।
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उनका कहना है कि उच्च न्यायालय ने साफ किया है कि निकाय चुनाव नहीं रोक सकते हैं। ऐसे में सरकार को ओबीसी के आरक्षण बिना चुनाव कराना होगा। सरकार तब ही चुनाव रोक सकती है जब सर्वोच्च न्यायालय की ओर से उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगा दी जाए। उनका मानना है कि सर्वोच्च न्यायालय के पांच जजों की बैंच ने इस संबंध में पिछला फैसला सुनाया है ऐसे 99 फीसदी चांस में तो उसे लागू करना होता है। उनका कहना है कानून तो समय और कार्य के अनुसार बदलता रहता है, कानून को कोई स्थायी नहीं है कानून की व्याख्या अलग-अलग होती है। लिहाजा सर्वोच्च न्यायालय में यदि कोई नया तथ्य सामने आता है तो सरकार को राहत मिल सकती है।
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सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय बदला तो ही राहत मिलेगी
सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता जयदीप नारायण माथुर का कहना है कि उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की लाइन पर ही फैसला सुनाया है। उच्च न्यायालय से बोल्ड जजमेंट दिया था, इसी तरह के फैसले की उम्मीद थी। उनका मानना है कि सरकार एक बार तो सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर करेगी लेकिन वहां भी सरकार को राहत मिलना मुश्किल है क्योंकि उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के आधार पर ही निर्णय दिया है। निकाय चुनाव में आरक्षण से जुड़े तमाम तर्कों को सुप्रीम कोर्ट सुन चुका है उसके बाद अब कुछ बचता नहीं है, बहस की गुंजाइश नहीं है। उनका मानना है कि जब तक कि सुप्रीम कोर्ट अपना ताजा आदेश बदल न दे। उनका मानना है कि आयोग के गठन में समय बहुत लगेगा, आयोग को सर्वे करने और रिपोर्ट देने में पूरा समय चाहिए। ऐसे में अधिकतम छह महीने बाद चुनाव कराना तो संवैधानिक बाध्यता है। उच्च न्यायालय ने चुनाव कराने के लिए कहा है इसलिए सरकार के पास ज्यादा संभावना नहीं है।