फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   This is how Ayodhya issue came in court.

134 साल की मुकदमेबाजी के बाद नई सुबह की उम्मीद में रामनगरी, अब फैसले पर टिकी निगाहें

Thu, 17 Oct 2019 12:51 PM IST
ishwar ashish धीरेंद्र सिंह, अमर उजाला, अयोध्या
धीरेंद्र सिंह, अमर उजाला, अयोध्या Published by: ishwar ashish Updated Thu, 17 Oct 2019 12:51 PM IST
विज्ञापन
This is how Ayodhya issue came in court.
अयोध्या नगरी का एक विहंगम दृश्य। - फोटो : amar ujala

दीपोत्सव से पहले रामनगरी में सुबह से ही नया उत्साह और उमंग दिखी। 1885 में जिला अदालत में शुरू हुआ मुकदमा बुधवार को शीर्ष न्यायालय में परिणति पर पहुंचा। अब फैसले पर सभी की निगाहें टिकी हैं। हिंदू-मुस्लिम पक्षकार ही नहीं, यहां के कारोबारी, नौकरीपेशा और दूर देश में रहने वाले लोग भी गदगद नजर आए। सभी की जुबान पर यही था कि अब अयोध्या में अमन-चैन होगा, विकास होगा और हर तरह का संशय समाप्त हो जाएगा।

विज्ञापन


अयोध्या विवाद की कहानी काफी लंबी है। दस्तावेज बताते हैं कि 1528 के पहले तक अयोध्या अपने रौ में थी, रामकोट का इलाका घंटे-घड़ियाल, आरती और भक्तों से ओतप्रोत नजर आता था। 23 मार्च 1528 से पहले श्रीरामजन्मस्थान मंदिर परिसर का व्यवस्थापन श्री पंचरामानंदीय निर्मोही अखाड़ा के पास था, लेकिन 1524 में महाराणा सांगा (संग्राम सिंह) को हराकर बाबर दिल्ली में तख्तनशीं हुआ।
विज्ञापन


कोर्ट में चली सुनवाइयों में बातें रखी गईं कि बाबर ने 1528 में दल-बल के साथ अयोध्या के शेखा घाघरा संगम पर डेरा डाला था। फकीर फजल अब्बास कलंदर और मूसा आसिकान से दुआ मांगने गया तो उसे श्रीरामजन्मस्थान पर मंदिर बनाने के बाद ही दुआ कबूल करने की शर्त रखी गई थी। इसके बाद मीर बाकी ने बाबर का हुकुमनामा लेकर अयोध्या कूच किया।
विज्ञापन
विज्ञापन


17 दिन तक चले युद्ध में हिंदुओं की हार हुई। मंदिर बचाने में 1 लाख 72 हजार हिंदू शहीद हुए। मुगलकाल के बाद ब्रिटिश काल शुरू हुआ। पुरातत्वविद् कनिंघम द्वारा 1981-82 में श्रीराममंदिर में शिलालेख लगाने का मामला उलझा।

इस तरह जिला न्यायालय में दर्ज हुआ श्रीरामजन्मभूमि का मामला

This is how Ayodhya issue came in court.

निर्मोही अखाड़ा ने आपत्ति की लेकिन सुनवाई नहीं होने पर 19 जनवरी 1885 को फैजाबाद कनिष्ठ न्यायालय में निर्मोही अखाड़ा के महंत रघुवर दास ने चबूतरे पर छत डालने की अनुमति मांगी। यह याचिका निरस्त हुई तब पहली बार बाबरी मस्जिद और श्रीरामजन्मभूमि का मामला जिला न्यायालय में दीवानी वाद के रूप में क्र.17/1885 प्रस्तुत हुआ।

न्यायाधीश कर्नल एमईए चामियार ने राम जन्मस्थान का दौरा किया लेकिन पूर्व के निर्णय को बरकरार रखा। 18 मार्च 1886 को कमिश्नर ऑफ डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में अपील हुई। न्यायाधीश डब्ल्यू यंग ने ‘विवादित स्थल-मस्जिद दि जन्मस्थान’ कहकर दावा निरस्त किया।

आजादी के बाद तेजी से बदले परिदृश्य

This is how Ayodhya issue came in court.
रामजन्मभूमि न्यास में रखे पत्थर। - फोटो : amar ujala

श्रीरामजन्मभूमि और बाबरी मस्जिद को लेकर आजादी के पहले तक कई बार संघर्ष हुए, मगर 19 मार्च 1949 को श्री पंचरामानंदीय निर्मोही अखाड़ा का पंजीकृत न्यास और उसके 15 ट्रस्टी बनने के बाद मामला नए सिरे से गर्म होने लगा।

अक्तूबर 1949 में अयोध्या में रजवाड़े के सामने हुई एक सभा में दिगंबर अखाड़ा के महंत परमहंस रामचंद्र दास, बाबा अभिराम दास, ठा. गोपाल सिंह आदि की उपस्थिति में बाबा अभिराम दास और महंत रामचंद्र दास को जब रामजन्मस्थान पर बोलने का मौका नहीं मिला तो वे सभा छोड़कर चले गए।

23 दिसंबर 1949 को तड़के 4 बजे विराजमान रामलला में हुई घटना के बाद संत अभिराम दास, वृंदावन दास, रामशुभग दास, रामसकल दास, राम विलास दास, सुदर्शन दास पर मूर्तियां स्थापित करने का आरोप लगा। मामला उच्चाधिकारियों तक पहुंचा, डीआईजी सरदार सिंह हवाई जहाज से फैजाबाद पहुंचे। जिलाधिकारी को मूर्ति हटाने का आदेश दिया गया। गर्भगृह में प्रशासन ने ताला जड़ दिया।

डीएम ने विवादग्रस्त वास्तु घोषित करते हुए धारा 145 के अंतर्गत 29 दिसंबर 1949 को परिसर कुर्की के साथ 200 गज परिसर में गैर हिंदुओं का प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया। पूजा-भोग की व्यवस्था के लिए चार पुजारी नियुक्त कर दर्शनार्थियों के लिए लोहे के शिकंजे के बाहर से दर्शन की व्यवस्था की गई।

अदालत ने 1955 में दिए मूर्ति की यथास्थिति के निर्देश

This is how Ayodhya issue came in court.
प्रतीकात्मक तस्वीर

हिंदू महासभा के जिलाध्यक्ष गोपाल सिंह विशारद ने दीवानी न्यायालय में 16 जनवरी 1950 को प्रतिबंध के खिलाफ अपील की। प्रशासन के अधिकारियों समेत जहूर अहमद, हाजी फेकू टेढ़ीबाजार के मो. फायत, रायगंज के मो. शमी, चूड़ी वाला कटरा के मो. अच्छन मियां को प्रतिवादी बनाया।

कोर्ट ने 26 अप्रैल 1955 को अंतिम निर्णय तक मूर्ति आदि की व्यवस्था जैसी है वैसी ही सुरक्षित रखने और पूजा, उत्सव, दर्शन जैसे हो रहे हैं, वैसे होते रहने का आदेश दिया। इसके बाद 1962 में सुन्नी वक्फ बोर्ड ने हिंदू महासभा और निर्मोही अखाड़ा द्वारा रखी गई मूर्तियां हटाने की याचिका दायर की। इसके खिलाफ महंत परमहंस रामचंद्र दास, देवकीनंदन अग्रवाल और भाष्कर दास की ओर से पैरवी की गई।

इस दौरान अयोध्या विवाद को लेकर राजनीतिक गतिविधियां भी काफी तेज हो गईं। 1963 में विज्ञान भवन दिल्ली में विश्व हिंदू धर्मसम्मेलन हुआ। अध्यक्षता राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन ने की। इसमें शंकराचार्य द्वारिकापुरी, बद्रीनाथ, गोरक्षपीठाधीश्वर, पंचपीठाधीश्वर आदि उपस्थित थे।

रामजन्म भूमि आंदोलन के साथ हलचल हुई तेज

This is how Ayodhya issue came in court.
रामजन्मभूमि थाना के प्रवेश मार्ग पर तैनात पुलिसकर्मी। - फोटो : amar ujala

21 जुलाई 1984 को महंत अवेद्यनाथ ने श्रीरामजन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति की स्थापना की। 7 अक्तूबर 1984 को मंदिर में लगे ताला को खोलने की मांग करते हुए सरयू किनारे जनसभा हुई।

31 अक्तूबर 1985 को उडुपी में हुई जनसभा में ताला खोलने के लिए अंतिम तिथि 8 मार्च 1986 महाशिवरात्रि के दिन तय की गई। इसी दौरान मंडल-कमंडल का शोर भी शुरू हुआ। 31 जनवरी 1986 को जिला न्यायालय में ताला खोलने की मांग की गई।

एक फरवरी 1986 को न्यायमूर्ति कृष्णमोहन पांडेय ने श्रीराम जन्ममंदिर में लगा ताला खोलने का आदेश दिया। इसके बाद सरकार ने ताला खुलवाया। तीन फरवरी को मो. हाशिम कुरैशी व जफरयाब जिलानी ने उच्च न्यायालय में अपील की जो निरस्त हो गई। फिर 12 मई 1986 को उ.प्र. सुन्नी वक्फ बोर्ड ने याचिका दायर की। श्रीरामजन्मभूमि न्यास भी विश्व हिंदू परिषद की सरपरस्ती में बनाया गया। केंद्र में भाजपा सरकार आने पर 67.77 एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया गया।

न्यास को लीज पर दी गई 40 एकड़ भूमि

This is how Ayodhya issue came in court.

यूपी में कल्याण सिंह की सरकार आने पर इसमें से न्यास को 40 एकड़ भूमि लीज पर दे दी गई। 6 दिसंबर 1992 को विवादित ढांचा ढहाया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने 10 दिसंबर 1992 को दर्शन-पूजन का 1950 का न्यायालीय आदेश स्थिर रखते हुए यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया।

7 जनवरी 1993 को केंद्र सरकार ने अध्यादेश जारी करके संपूर्ण मंदिर परिसर अधिगृहीत कर लिया। मामले में 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने फैसला सुनाते हुए विवादित भूमि को तीन हिस्सों में बांटने का आदेश दिया।

एक हिस्सा विराजमान रामलला पक्ष को, दूसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़ा को और तीसरा हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को देने का आदेश हुआ। बाद में सभी पक्षों ने फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की। 40 दिन चली लगातार सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखने का आदेश दिया।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed