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Lucknow News: फेफड़े के दुर्लभ रोग से पीड़ित दो मरीजों की बचाई जान
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संजय गांधी पीजीआई।
लखनऊ। संजय गांधी पीजीआई के डाॅक्टरों ने फेफड़े की दुर्लभ बीमारी से पीड़ित दो मरीजों की जान बचाने में सफलता हासिल की है। पल्मोनरी एल्वियोलर प्रोटीनोसिस (पीएपी) नाम की इस बीमारी में फेफड़े में झाग भरने की समस्या होती है। इससे सांस लेना मुश्किल हो जाता है।
संस्थान के इंटरवेंशनल पल्मोनोलॉजिस्ट प्रो. अजमल खान ने बताया कि दोनों मरीज ग्रामीण पृष्ठभूमि की मध्यम आयु वर्ग की महिलाएं थीं। कई जगह इलाज कराने के बाद ये पीजीआई आई थीं। पल्मोनरी एल्वियोलर प्रोटीनोसिस (पीएपी) एक दुर्लभ लेकिन गंभीर बीमारी है। इसमें फेफड़ों की छोटी वायुकोशियों के अंदर प्रोटीन जैसा झागदार पदार्थ जमा हो जाता है। इससे खून में ऑक्सीजन स्वतंत्र रूप से प्रवाहित नहीं हो पाती। इसके चलते मरीज को मेहनत करने के दौरान सांस फूलने, लगातार खांसी, सीने में भारीपन और थकान की शिकायत होती है। कुछ लोगों को गाढ़ा, सफेद बलगम भी आ सकता है। ये लक्षण निमोनिया और टीबी में भी हो सकते हैं। इसलिए कई बार इसका गलत उपचार होता है। धूम्रपान करने वाले या फिर संक्रमण, रक्त कैंसर और धूल-धुएं से यह बीमारी होती है। मध्यम आयु वर्ग के वयस्क (पुरुषों में थोड़ा ज्यादा) इससे ज्यादा प्रभावित होते हैं।
कम केंद्रों पर उपलब्ध है इलाज
इस बीमारी में फेफड़े को धीरे-धीरे एनेस्थीसिया के तहत बड़ी मात्रा में गर्म सेलाइन वाटर से धोया जाता है। इससे जमाव हटता है। इसी प्रक्रिया के तहत दोनों मरीजों का इलाज किया गया। यह प्रक्रिया बहुत कम केंद्रों पर उपलब्ध है। गंभीर या उपचार-प्रतिरोधी मामलों में, जैविक उपचार, प्लाज्मा बदलना और यहां तक कि फेफड़ों के प्रत्यारोपण जैसे उन्नत विकल्पों की जरूरत भी पड़ सकती है।
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इलाज में ये रहे शामिल
प्रो. अजमल खान, डॉ. मानसी गुप्ता, डॉ. प्रशांत एपी, डॉ. यश जगधारी, डॉ. अमित रस्तोगी, डॉ. पल्लव सिंह, डॉ. आरिब शेख, प्रो. प्रभात तिवारी और प्रोफेसर एसके अग्रवाल।
जागरूकता जरूरी
पीजीआई में पल्मोनरी मेडिसिन के प्रमुख प्रो. आलोक नाथ के मुताबिक, पीएपी अक्सर नजरों से ओझल रहता है। इसे अस्थमा या वायरल बीमारियों, तपेदिक आदि जैसे सामान्य संक्रमण समझ लिया जाता है, जिससे इलाज में देरी हो सकती है। इसलिए जागरूकता जरूरी है।
दस लाख में सात को होती है समस्या
यह एक दुर्लभ बीमारी है। दुनिया भर में प्रति दस लाख लोगों पर केवल सात मामलों में ही इसकी पुष्टि हुई है।
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संस्थान के इंटरवेंशनल पल्मोनोलॉजिस्ट प्रो. अजमल खान ने बताया कि दोनों मरीज ग्रामीण पृष्ठभूमि की मध्यम आयु वर्ग की महिलाएं थीं। कई जगह इलाज कराने के बाद ये पीजीआई आई थीं। पल्मोनरी एल्वियोलर प्रोटीनोसिस (पीएपी) एक दुर्लभ लेकिन गंभीर बीमारी है। इसमें फेफड़ों की छोटी वायुकोशियों के अंदर प्रोटीन जैसा झागदार पदार्थ जमा हो जाता है। इससे खून में ऑक्सीजन स्वतंत्र रूप से प्रवाहित नहीं हो पाती। इसके चलते मरीज को मेहनत करने के दौरान सांस फूलने, लगातार खांसी, सीने में भारीपन और थकान की शिकायत होती है। कुछ लोगों को गाढ़ा, सफेद बलगम भी आ सकता है। ये लक्षण निमोनिया और टीबी में भी हो सकते हैं। इसलिए कई बार इसका गलत उपचार होता है। धूम्रपान करने वाले या फिर संक्रमण, रक्त कैंसर और धूल-धुएं से यह बीमारी होती है। मध्यम आयु वर्ग के वयस्क (पुरुषों में थोड़ा ज्यादा) इससे ज्यादा प्रभावित होते हैं।
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कम केंद्रों पर उपलब्ध है इलाज
इस बीमारी में फेफड़े को धीरे-धीरे एनेस्थीसिया के तहत बड़ी मात्रा में गर्म सेलाइन वाटर से धोया जाता है। इससे जमाव हटता है। इसी प्रक्रिया के तहत दोनों मरीजों का इलाज किया गया। यह प्रक्रिया बहुत कम केंद्रों पर उपलब्ध है। गंभीर या उपचार-प्रतिरोधी मामलों में, जैविक उपचार, प्लाज्मा बदलना और यहां तक कि फेफड़ों के प्रत्यारोपण जैसे उन्नत विकल्पों की जरूरत भी पड़ सकती है।
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इलाज में ये रहे शामिल
प्रो. अजमल खान, डॉ. मानसी गुप्ता, डॉ. प्रशांत एपी, डॉ. यश जगधारी, डॉ. अमित रस्तोगी, डॉ. पल्लव सिंह, डॉ. आरिब शेख, प्रो. प्रभात तिवारी और प्रोफेसर एसके अग्रवाल।
जागरूकता जरूरी
पीजीआई में पल्मोनरी मेडिसिन के प्रमुख प्रो. आलोक नाथ के मुताबिक, पीएपी अक्सर नजरों से ओझल रहता है। इसे अस्थमा या वायरल बीमारियों, तपेदिक आदि जैसे सामान्य संक्रमण समझ लिया जाता है, जिससे इलाज में देरी हो सकती है। इसलिए जागरूकता जरूरी है।
दस लाख में सात को होती है समस्या
यह एक दुर्लभ बीमारी है। दुनिया भर में प्रति दस लाख लोगों पर केवल सात मामलों में ही इसकी पुष्टि हुई है।