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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   The key to the lock will be decided by the characters, the heart of the voters of Aligarh, Hathras, Etah and Kasganj

यूपी का रण : किरदारों से तय होगी ताले की चाबी, अलीगढ़, हाथरस, एटा और कासगंज के मतदाताओं के दिल की बातें

Mon, 03 Jan 2022 04:04 AM IST
पंकज श्रीवास्‍तव अभिषेक शर्मा, अमर उजाला ब्यूरो, अलीगढ़
अभिषेक शर्मा, अमर उजाला ब्यूरो, अलीगढ़ Published by: पंकज श्रीवास्‍तव Updated Mon, 03 Jan 2022 04:04 AM IST
सार

गंगा-यमुना के दोआब में बसे अलीगढ़, हाथरस, एटा, कासगंज की सियासी तासीर की अपनी विशिष्टताएं हैं। चारों जिलों की कुल 17 में से 16 सीटों पर कब्जा जमाए बैठा भगवा खेमा हो या फिर विपक्ष, सभी अपनी-अपनी जीत के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए हैं।

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The key to the lock will be decided by the characters, the heart of the voters of Aligarh, Hathras, Etah and Kasganj
अलीगढ़ के अतरौली में चुनावी चर्चा करते लोग... - फोटो : amar ujala

विस्तार

रैलियां हो रही हैं। मुद्दे उछाले जा रहे हैं। नए समीकरणों की राजनीतिक ताकत दिखाई जा रही है। आजमाई जा रही है। इस सबसे चढ़ते सियासी पारे के बीच मतदाता भी गुणा-भाग में जुटा हुआ है। अपने अंदाज में। हवा का रुख भांपने का उसका अलग पैमाना है। चाय की चुस्कियों के संग...। अलावों की गरमा-गरम चर्चाओं में...वह अपने पैमाने से सबकी ताकत परख रहा है। इसके लिए मुद्दों को ही हथियार बनाया जा रहा है। ...तो बचाव के लिए ढाल भी। एक-दूसरे को कुरेदा जा रहा है। पता किया जा रहा है कि वैचारिक धरातल पर कौन किसके साथ है। कुछ ऐसा ही माहौल है अलीगढ़, हाथरस, एटा और कासगंज में। शहरी सीटों पर मुद्दों को लेकर तर्क-वितर्क तो खूब हैं, पर जातीय-धार्मिक आधार पर मतदाता बंटा हुआ है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय मुद्दे तो हैं, पर जातीय अस्मिता का उभार कहीं ज्यादा है। किरदार यानी प्रत्याशी भी तय करेंगे कि मतदाता उनके किस्मत के ताले की चाबी किन शर्तों पर उन्हें सौंपता है। 

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गंगा-यमुना के दोआब में बसे अलीगढ़, हाथरस, एटा, कासगंज की सियासी तासीर की अपनी विशिष्टताएं हैं। चारों जिलों की कुल 17 में से 16 सीटों पर कब्जा जमाए बैठा भगवा खेमा हो या फिर विपक्ष, सभी अपनी-अपनी जीत के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए हैं। मतदाता भी पाला तय कर चुके हैं। बस उन्हें इंतजार है रण में उतरने वाले चेहरों का। बहरहाल इस बार भाजपा को सपा-रालोद गठबंधन से कड़ी टक्कर मिलती दिख रही है। जिला पंचायत चुनाव में मिली जीत से विपक्ष जोश में है। वहीं, सत्ताधारी खेमा हिसाब बराबर करने के लिए सारे कील-कांटे दुरुस्त कर चुका है।
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अलीगढ़ की बात करें तो सातों विधानसभा सीटों पर अलग-अलग सियासी समीकरण हैं। अलीगढ़ शहर और कोल सीट पर ध्रुवीकरण के चलते सभी दल लड़ाई भाजपा से लड़ रहे हैं। विपक्ष में मुस्लिम वोटों के सहारे सपा ज्यादा मजबूत है, जबकि बसपा व कांग्रेस चेहरों के दम पर मैदान में हैं। इगलास व खैर में लड़ाई सीधे-सीधे सपा-रालोद गठबंधन और भाजपा के बीच होती दिखाई दे रही है। देहात की दो अन्य ठाकुर बहुल सीटों में से बरौली में स्थानीय मुद्दों व जातीय समीकरणों की वजह से बसपा व सपा  से भाजपा को टक्कर मिल रही है। जबकि छर्रा में  विपक्ष जातीय गोलबंदी के लिए प्रयासरत हंै। जिले की सबसे महत्वपूर्ण कल्याण सिंह की अतरौली सीट पर भाजपा को सपा के पूर्व विधायक से कड़ी टक्कर मिल रही है।  
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विधायकों के काम की पड़ताल
तस्वीर महल चौराहे पर चाय की चुस्कियां लेते मिले राजनीतिक जानकार मृत्युंजय शर्मा कहते हैं, अभी बहुत ज्यादा कह पाना कुछ जल्दबाजी होगी। हां, इतना जरूर है कि सरकार के प्रदर्शन से कहीं ज्यादा स्थानीय स्तर पर विधायकों का रिपोर्ट कार्ड आने वाले चुनाव का परिणाम तय करेगा। यहीं मौजूद गांव पाली रजापुर के किसान पंकज शर्मा कहते हैं, अपने जिले में निश्चित तौर पर जातीय समीकरण हावी रहते हैं। साथ में स्थानीय मुद्दे भी हैं। जो कुछ हद तक असर तो डालते ही हैं। हाल ही जिले में एक आपराधिक घटना के बाद शुरू हुई लोध बनाम ठाकुर लहर का असर भी इस चुनाव में दिखेगा। यह भी स्पष्ट है कि हर चुनाव की तरह इस चुनाव में भी सत्तारूढ़ दल को एंटी इन्कंबेंसी से जूझना पड़ेगा। इसका विपक्षी लाभ उठाएंगे। इसी तरह सोमना के युवा व इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर चुके किसान ठा. विक्रमादित्य सिंह कहते हैं कि किसानों से जुड़ी समस्या इस चुनाव में बड़ा मुद्दा है। महंगाई व छुट्टा जानवर से भी लोग परेशान हैं। नगर निगम स्थित चाय की दुकान पर मिले अमरीश त्यागी, सतीश दीक्षित, कंचन सिंह, ब्रजेश लोधी, मनोज शर्मा, चंद्र भान, इफरार, नीटू शर्मा, गुलाब सिंह, मोहम्मद सोजेब, फिरोज चौधरी भी कहते हैं कि इस बार महंगाई, शहरी विकास और रोजगार के मुद्दे प्रमुख हैं। यह बात अलग है कि इन मुद्दों का असर चुनाव में कितना दिखता है।

अतरौली : कल्याण के परिवार की गहरी पैठ

अतरौली सीट पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की सीट है। कई दशक के बाद यह पहला मौका है, जब अतरौली सीट पर उनके बिना चुनाव होने जा रहा है। हालांकि, उनके परिवार की इस पारंपरिक सीट पर गहरी पैठ है। मगर, सपा को भी कमजोर नहीं माना जा सकता। क्योंकि, 2012 के चुनाव में सपा के वीरेश यादव ने कल्याण सिंह की पुत्रवधू को चुनाव हराया था। यहां भी मुद्दों के साथ जातीय समीकरण हावी रहते हैं। अतरौली चौराहे पर मिले क्षेत्र के चौ. नरेंद्र सिंह व बहादुर सिंह कहते हैं, यहां किसानों से जुड़ी समस्याओं के साथ ही चेहरे के दम पर वोट पड़ेंगे। वहीं, उदयवीर सिंह बघेल चर्चा छिड़ते ही अतरौली-छर्रा सीट पर छुट्टा जानवरों से हो रहे नुकसान का हवाला देते हुए विषयांतर कर देते हैं। बेरोजगारी के सवाल पर बुड्डा शर्मा भी सभी को घेरते नजर आए। बहरहाल, यहां भी भाजपा को चुनौती सपा से चुनौती मिल रही है। बसपा व कांग्रेस भी अपना जोर लगाए हुए हैं। 

राजा बनाम चरण सिंह बन रहा बड़ा मुद्दा
जिन्ना को लेकर हमलावर भाजपा राजा महेंद्र प्रताप का नाम और उनके नाम के विश्वविद्यालय की स्थापना को अपनी उपलब्धि में शामिल कर रही है। वहीं, रालोद-सपा चौ. चरण सिंह को सम्मान न देने का आरोप लगाते हुए भाजपा को घेरने की कोशिश कर रहे हैं। इसे लेकर इगलास व खैर सीट से जुड़े ठा. शीलेंद्र सिंह व चौ. जगवीर सिंह कहते हैं कि इन दोनों विषयों का सीटों पर असर दिखाई दे रहा है। परिणाम चुनाव में ही दिखेगा।

कासगंज : तीनों सीटों पर सपा से मिल रही चुनौती
कासगंज जनपद में तीन सीटें-कासगंज, अमापुर और पटियाली हैं। तीनों पर भाजपा का कब्जा है।  सपा यहां सीधे टक्कर में है। लोध, ठाकुर, यादव बहुल इन सीटों का अपना-अपना मिजाज है। वेदराम वर्मा कहते हैं, कासगंज को एक ऐसा चेहरा चाहिए जो कभी किसी विवाद में न रहा हो। भाजपा सरकार ने सोरोंजी को तीर्थ स्थल घोषित किया। यह बड़ी उपलब्धि है, लेकिन बाढ़ के मुद्दे को भी ध्यान में रखना चाहिए था। वे बताते हैं, लोध बहुल सीट पर अन्य जातियां भी निर्णायक भूमिका में रही हैं। इस बार क्षेत्र के यादव-मुस्लिमों का रुझान सपा की ओर है। अमापुर सीट की चर्चा छिड़ते ही भगवान सिंह राघव कहते हैं, लोध, ठाकुर व शाक्य बहुल इस सीट पर भाजपा और सपा में सीधी टक्कर है। पर, यह भी सच है कि यहां चेहरे हावी रहते हैं। पटियाली सीट को लेकर कुशपाल सिंह कहते हैं, लोधी, शाक्य, ठाकुर व मुस्लिम बहुल इस सीट पर चेहरा बहुत असर करता है। जातीय समीकरण भी चुनाव में हावी रहता है। बहरहाल, भाजपा-सपा में सीधी टक्कर है, जबकि अनुसूचित मतों के सहारे बसपा भी दम भर रही है।

बरौली व छर्रा : गठबंधन से मिल रही कड़ी टक्कर
अलीगढ़ जिले की ठाकुर बहुल बरौली व छर्रा सीट को लेकर नगर निगम के बाहर चाय की दुकान पर चर्चा चल रही थी। यहीं मिले हरदुआगंज के ठा. संदीप जादौन, विपिन चौधरी ने बताया कि पिछला चुनाव बेशक मोदी लहर के दम पर जीता गया, पर इस बार अभी कुछ कहना मुश्किल है। भाजपा को दोनों सीटों पर सपा-रालोद गठबंधन से टक्कर मिलने के आसार हैं। बसपा व कांग्रेस भी अपना जोर लगाए हुए हैं। वे कहते हैं, यह बात अलग है कि जिले में केंद्र व प्रदेश की योजनाओं के तहत डिफेंस कॉरिडोर, राजा महेंद्र प्रताप विश्वविद्यालय जैसे उल्लेखनीय काम हुए हैं। मगर, जनप्रनिधियों की सिफारिश पर भी सुनवाई न होना भी यहां मुद्दा है। वहीं, अनूप शर्मा बरौली में चेहरे और स्थानीय मुद्दे को ही प्रभावी बताते हैं। बरौली में साथा मिल भी एक मुद्दा है। यहां भाजपा को बसपा और सपा चुनौती देती दिख रही हैं। हालांकि, यहां अभी तक दो सियासी धुर विरोधियों विधायक ठा. दलवीर सिंह व पूर्व मंत्री ठा. जयवीर सिंह में भाजपा से ही टिकट को लेकर जोरदार जोर-आजमाइश चल रही है।

एटा : काम के पैमाने पर सबको आंक रहे लोग 
जिले की चार सीटों-अलीगंज, एटा, मारहरा व जलेसर पर भाजपा का कब्जा है। 2017 के चुनाव में भी इस जिले में चारों सीटें जीतने वाली भाजपा की सीधी टक्कर सपा से मिली थी। कमोबेश अब भी वैसा ही माहौल बन रहा है। यादव बहुल एटा, लोधी बहुल मारहरा, यादव बहुल अलीगंज, यादव और अनुसूचित जाति बहुल जलेसर सीट पर जातीय समीकरण, चेहरे, स्थानीय मुद्दे इस चुनाव में बड़ा प्रभाव डालने को तैयार हैं। जीटी रोड स्थित मेडिकल कॉलेज के पास एक टी स्टॉल पर चाय की चुस्कियां लेते मिले शहर के ही रमेशपाल कहते हैं, जिले में विकास के कई काम हुए। सबसे बड़ी उपलब्धि मेडिकल कॉलेज है। इसके अलावा जीटी रोड पर बाईपास से भी लोगों को काफी सुकून मिला। बात काटते हुए विक्रांत ने कहा कि ये दोनों ही काम केंद्र सरकार के हैं। राज्य सरकार से जिले को क्या मिला? सपा के शासनकाल में एटा को प्राथमिकता दी जाती थी। छात्र माधव का कहना था, रोजगार के मामले में जो पार्टी काम करेगी, उसको ही युवा पसंद करेंगे। बुजुर्ग राधेश्याम बोले, सरकार ने वृद्धावस्था सहित अन्य सभी पेंशन का पैसा बढ़ा दिया है। राशन भी मुफ्त मिल रहा है। इसीलिए सरकार दोबारा बनवाएंगे।

हाथरस : जातीय समीकरणों से लड़ाई होगी दिलचस्प
हाथरस जिले की  सदर, सिकंदराराऊ सीट पर 2017 में भाजपा जीती थी। सिर्फ सादाबाद सीट पर बसपा से रामवीर उपाध्याय जीते थे। फिलहाल वे बसपा से निष्कासित हैं। उनका परिवार भाजपा में है। सदर सीट पर ब्राह्मण, वैश्य व अनुसूचित जातियों का बाहुल्य है। अलीगढ़ रोड पर चाय की चुस्कियां लेते मिले रामकिशन शर्मा कहते हैं, अपराध कम हुआ है। यही भाजपा कह रही है और हम भी इसे मानतेे हैं। पर,  विकास के पैमाने पर आंकें तो सही मायने में अभी बहुत कमी है। यही बात जोड़ते हुए एडवोकेट दिगंबर सिंह सिसौदिया कहते हैं, छुट्टा जानवरों की समस्या से निजात नहीं मिली। आलू किसानों की भी समस्याओं का हल नहीं निकला। एससी आरक्षित सदर सीट पर भाजपा  विकास के नाम पर मजबूत दावा कर रही है। विपक्ष सपा व बसपा सरकार की नाकामियों के सहारे आगे बढ़ रहा है। ठाकुर, यादव, मुस्लिम व अन्य पिछड़ा वर्ग मतदाता बहुल सिकंदराराऊ सीट पर पिछड़ा वोटों का ध्रुवीकरण भाजपा सहित सभी विपक्षी दलों की धड़कनें बढ़ाए हुए है। यहां विकास से ज्यादा चेहरा, स्थानीय प्रत्याशी और स्थानीय मुद्दे महत्व रखते है। सादाबाद की बात करें तो रालोद-सपा गठबंधन जातीय समीकरणों के सहारे भाजपा को तगड़ी चुनौती दे रहा है।

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