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अखिलेश को झटका, मायाकाल के 791 वकीलों को 'अभयदान'

Thu, 06 Nov 2014 01:00 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला,लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला,लखनऊ Updated Thu, 06 Nov 2014 01:00 PM IST
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the high court gives decision in favour of advocates.

हाईकोर्ट की खंडपीठ ने एक अहम फैसले में 791 सरकारी वकीलों को हटाने का आदेश रद्द कर दिया। इन्हें वर्ष 2008 और इसके बाद सूबे की बसपा सरकार के दौरान जिलों में बतौर सरकारी वकील नियुक्त किया गया था, जिन्हें मौजूदा सपा सरकार में हटाने के साथ ही इनके नवीनीकरण को खारिज कर दिया गया।

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वकीलों ने कुल 357 याचिकाएं दायर कर इसे कानून की मंशा के खिलाफ बताकर हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि इन याचिकाकर्ता वकीलों के नवीनीकरण या तैनाती के मामले में तीन माह में फिर से गौर कर पालन रिपोर्ट पेश की जाए।
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कोर्ट ने सूबे में अभियोजन निदेशालय की स्थापना करने के निर्देश भी दिए हैं। साथ ही कहा कि अभियोजन निदेशक की नियुक्ति हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की सहमति से होनी चाहिए।
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न्यायमूर्ति देवी प्रसाद सिंह और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार त्रिपाठी द्वितीय की खंडपीठ ने बुधवार को यह सुरक्षित फैसला अजय कुमार शर्मा समेत 791 लोगों की ओर से दायर 357 याचिकाओं को मंजूर कर सुनाया।

कोर्ट ने इन याचियों के नवीनीकरण खारिज किए जाने के आदेशों को रद्द कर दिया तथा सरकार को तीन माह में इनके नवीनीकरण या नियुक्ति मामले में पुन: विचार करने के निर्देश दिए।

साथ ही सरकार को कहा कि जिला शासकीय अधिवक्ताओं की तैनाती, नवीनीकरण व चयन प्रक्रिया को पटरी पर लाने के लिए समुचित कदम उठाए।

इस फैसले को सरकार के लिए एक और झटका माना जा रहा है। हालांकि सूबे के महाधिवक्ता विजयबहादुर सिंह ने इसे ऐतिहासिक निर्णय बताया है।

96 सरकारी वकीलों की तैनाती अवैध

the high court gives decision in favour of advocates.

हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने 27 मई 2014 से 30 मई 2014 के बीच राजधानी समेत सूबे के 20 जिलों में की गई 96 सरकारी वकीलों की तैनाती को अवैध करार दिया है।

साथ ही विधि परामर्शी दफ्तर की कार्यशैली की भी निंदा की है। अदालत ने कहा कि कानून व एलआर मैनुअल के तहत सरकारी वकील के रूप में तैनाती व नवीनीकरण के लिए आवेदकों को 15 दिन का वक्त देकर अखबारों में इश्तिहार दिया जाना चाहिए था।

इसके बावजूद लखनऊ, सीतापुर, हमीरपुर, एटा, बिजनौर, सिद्धार्थनगर, शाहजहांपुर, कासगंज, सोनभद्र, श्रावस्ती, कौशांबी, बदायूं, उन्नाव, मेरठ, कुशीनगर, ललितपुर, मुजफ्फरनगर, मुरादाबाद, झांसी व चंदौली जिलों में इसके लिए फरवरी व मार्च 2013 में विभिन्न तारीखों में विज्ञापन जारी किया गया।

और इसे इन 96 पदों पर की गई नियुक्तियों का आधार माना गया। इन जिलों में की गई इन नियुक्तियों को अदालत ने मनमानी और विधि परामर्शी के दफ्तर पर कलंक करार देते हुए इसकी भर्त्सना की।

मेरिट पर तैनात हों सरकारी वकील

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हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने सरकारी वकीलों के मामले में दिए गए फैसले में राज्य सरकार से अपेक्षा जताई है कि वह जल्द ही मेरिट के आधार पर सरकारी वकीलों के पदों पर नियुक्तियां करेगी।

किसी को भी महज इस आधार पर वंचित नहीं किया जाएगा कि वह किसी जाति या धर्म विशेष से संबंधित है। न्यायमूर्ति देवी प्रसाद सिंह और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार त्रिपाठी की खंडपीठ ने यह व्यवस्था याचियों की तरफ से जाति, धर्म व वंश के आधार पर सरकारी वकीलों की तैनाती संबंधी आरोपों के मद्देनजर दी।

हालांकि कोर्ट ने इन आरोपों को ठहरने योग्य नहीं माना क्योंकि इससे संबंधित कोई सामग्री प्रस्तुत नहीं की गई थी।

कोर्ट ने सूबे के सभी जिला न्यायाधीशों व जिलाधिकारियों को तत्काल यह सुनिश्चित कराने के निर्देश दिए हैं कि ऐसा कोई व्यक्ति, जिसका आपराधिक रिकॉर्ड हो या फिर जिसके खिलाफ नैतिक कदाचार की प्राथमिकी दर्ज हो, को जिला शासकीय अधिवक्ता के रूप में काम न करने दिया जाए।

अदालत ने सख्त ताकीद की कि ऐसे सभी लोगों की तैनाती पहले के फैसले के मद्देनजर सरकार महीने भर में रद्द करेगी।
कोर्ट ने फैसले की प्रति सूबे के मुख्य सचिव व प्रमुख सचिव विधि को हफ्तेभर में पालन के लिए भेजने के निर्देश दिए हैं।
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