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डीसीपी समेत अन्य पुलिस अफसर तलब : जिला अदालत के कुछ वकीलों के गुट की आपराधिक गतिविधियों पर हाईकोर्ट सख्त

अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ Published by: पंकज श्रीवास्‍तव Updated Tue, 07 Dec 2021 11:30 PM IST

सार

कोर्ट ने कहा है कि यह समूह रंगदारी, ब्लैकमेलिंग, मनी लांड्रिंग व अदालत परिसर में कानून व्यवस्था में परेशानी पैदा करने में लिप्त हैं। ऐसे में कुछ अराजक तत्वों को कानून के शासन को हाईजैक नहीं करने दिया जा सकता।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ
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विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने जिला अदालत के कुछ वकीलों के संगठित समूह की आपराधिक गतिविधियों पर सख्त रुख अख्तियार किया है। कोर्ट ने कहा है कि यह समूह रंगदारी, ब्लैकमेलिंग, मनी लांड्रिंग व अदालत परिसर में कानून व्यवस्था में परेशानी पैदा करने में लिप्त हैं। ऐसे में कुछ अराजक तत्वों को कानून के शासन को हाईजैक नहीं करने दिया जा सकता।

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कोर्ट ने लखनऊ के पुलिस कमिश्नर को निर्देश दिया है कि वह स्थानीय वकीलों के खिलाफ  दर्ज केसों का ब्योरा उनकी तफ्तीश व ट्रायल की स्थिति के साथ निजी हलफनामे पर पेश करें। कोर्ट ने पुलिस कमिश्नर को यह छूट भी दी है कि वह उन केसों को दोबारा देखें, जिनमें फाइनल रिपोर्ट लग गई है। अगर यह पाया जाए कि उनकी तफ्तीश में कमी रह गई हो या फिर आरोपियों के डर से सभी गवाह सामने न आए हों तो उनमें अग्रिम विवेचना का आदेश दें।


न्यायमूर्ति राकेश श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति शमीम अहमद की खंडपीठ ने यह आदेश पीयूष श्रीवास्तव की याचिका पर दिया है। याची ने अदालत परिसर में कुछ वकीलों की आपराधिक गतिविधियों, घटनाओं का जिक्र कर इनमें पुलिस के लचर रुख का मुद्दा उठाया था। साथ ही मामले में समुचित कार्रंवाई की गुजारिश की थी। कोर्ट ने इन  घटनाओं से संबंधित प्राथमिकियों पर पुलिस की कार्रवाई जाननी चाही है।

कोर्ट ने कहा कि अगर वकीलों को हिंसा में प्रवृत्त होने दिया गया तो समाज में शांति बनाए रखना असंभव हो जाएगा। इस मामले की सुनवाई के समय गत 30 नवंबर को डीसीपी पश्चिमी समेत वजीर गंज के एसएचओ व केस के विवेचक पेश हुए थे। कोर्ट ने इन पुलिस अफसरों को फिर 13 दिसंबर को तलब किया है।

सीजेएम से वकीलों की अभद्रता की घटना का लिया संज्ञान
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने संज्ञान लिया कि वर्ष 2017 में लखनऊ की तत्कालीन सीजेएम संध्या श्रीवास्तव के साथ भी कुछ वकीलों ने अभद्रता की थी। कोर्ट ने कहा कि यह बेहद खेदजनक स्थिति है कि इस मामले में वर्ष 2017 में ही आरोप पत्र दाखिल हो चुका है, लेकिन अब तक आरोप तय नहीं हो सके हैं। साथ ही कोर्ट ने जिला जज लखनऊ को यह भी बताने को कहा है कि क्या उक्त मामले में तत्कालीन सीजेएम ने अदालत की अवमानना का कोई संदर्भ हाईकोर्ट के संज्ञान के लिए भेजा था? सुनवाई के दौरान डीसीपी पश्चिमी सोमेन वर्मा ने एक पूरक शपथ पत्र दाखिल करते हुए बताया कि याची के मामले में शामिल अधिवक्ताओं ने एलडीए द्वारा निर्मित एक कम्युनिटी सेंटर को भी गिरा दिया था व चार अक्तूबर 2021 को उनके खिलाफ  एफआईआर भी दर्ज की गई थी, लेकिन गिरफ्तारी नहीं की जा सकी। वहीं, एक महिला द्वारा एससी-एसटी एक्ट के तहत दर्ज कराई गई एफआईआर में भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। साथ ही कुछ वकीलों ने कुशीनगर से आए पुलिसकर्मियों से अभद्रता भी की थी। कोर्ट ने इन सभी मामलों में हुई कार्रवाई का ब्योरा 13 दिसंबर को तलब किया है।

वकील को धमकी देने के मामले में जिला जज से मांगी रिपोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने दीवानी दावा दायर करने वाले एक वकील को धमकी देकर मारपीट करने के आरोप के मामले में जिला जज लखनऊ से सीलबंद रिपोर्ट मांगी है। कोर्ट ने डीसीपी पश्चिमी को निर्देश दिया है कि इस घटना में शामिल लोगों की पहचान करें। इसके लिए कोर्ट में उन्हें सीसीटीवी फुटेज व याचिका के कथन की मदद लेने की छूट दी है। अदालत ने जिला जज समेत लखनऊ बार एसोसिएशन व सेंट्रल बार एसोसिएशन के अध्यक्षों को निर्देश दिया है कि आरोपियों की पहचान करने में डीसीपी पश्चिमी की पूरी मदद करें। साथ ही डीसीपी से घटना की विस्तृत रिपोर्ट 13 दिसंबर को तलब की है।

न्यायमूर्ति राकेश श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति शमीम अहमद की खंडपीठ ने यह आदेश स्थानीय अधिवक्ता चंद्र शेखर यादव की याचिका पर दिया है। याची का कहना था उसने सिविल कोर्ट में एक दावा दायर किया था। इसमें प्रतिवादी की तरफ  से दो वकीलों ने बगैर पता दिए व बिना मोबाइल नंबर के वकालतनामा दाखिल किया। साथ ही याची को दावे में पैरवी करने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी। याची का यह भी आरोप है कि गत 1 नवंबर को इन्हीं दोनों वकीलों ने 50-60 अज्ञात लोगों के साथ आकर याची के साथ के वकीलों व उसके साथ एक मुंशी को सिविल जज एफटीसी सीनियर डिवीजन लखनऊ की अदालत में जाने से रोका व हाथापाई की।

याची ने इस घटना की प्राथमिकी वजीरगंज थाने में दर्ज कराई थी। याची ने याचिका में घटना की जांच समेत जिला कोर्ट परिसर में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जाने की गुजारिश की है। याची का कहना था कि एक माह बाद भी इस मामले ती तफ्तीश शुरू नहीं हुई। कोर्ट ने कहा कि अपने तरह का यह पहला केस नहीं है बल्कि एक और मामला हिंसा व वकीलों के गैर व्यावसयिक आचरण से संबंधित है। ऐसे मामलों में विवेचना न होना स्वीकार्य नहीं है। हिंसा संबंधी शिकायतों व न्याय देने में बाधा की घटनाओं की समुचित व समय से विवेचना कर जल्द गौर किया जाना चाहिए। कोर्ट ने मामले की सुनवाई के समय गत 30 नवंबर को दूसरे केस में पेश हुए डीसीपी पश्चिम जोन समेत वजीरगंज थाने के एसएचओ व विवेचक को फिर 13 दिसंबर को अगली सुनवाई पर तलब किया है।







 
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