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कश्मीर की खूबसूरत वादियां बुला रही हैं हमें

Wed, 07 Aug 2019 01:54 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Wed, 07 Aug 2019 01:54 AM IST
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story of kashmiries
केंद्र सरकार की ओर से कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के फैसले के बाद से यूं तो पूरे देश में खुशी की लहर है लेकिन यह फैसला कश्मीर से निर्वासित कश्मीरियों के लिए सबसे खास है। आतंकियों की वजह से अपना घर, जमीनें और व्यवसाय छोड़कर वहां से आने को मजबूर हुए कश्मीरियों की खुशी का ठिकाना नहीं है। दशकों बाद एक बार फिर से उन्हें अपने पूर्वजों के घर वापसी की उम्मीद बंधी है। राजधानी में रह रहे तकरीबन ढाई सौ कश्मीरी परिवारों में इस समय जश्न का माहौल है और वे अपने पुश्तैनी गांवों में लौटने की योजना बना रहे हैं।
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29 साल से दिल में बसी घर वापसी की ख्वाहिश
लखनऊ। कश्मीर का माहौल जब रहने लायक नहीं बचा तो 19 जनवरी 1990 को हम चार परिवार ट्रक में बैठकर रातों-रात कश्मीर से बाहर आ गए। हमारे ट्रक के आगे और पीछे सेना का एक-एक ट्रक चल रहा था। उम्मीद थी कि माहौल सुधरेगा तो 10-15 दिन में हम लोग वापस आ जाएंगे। 29 साल हो गए पर 15 दिन में घर लौटने की ख्वाहिश दिल में आज भी दबी हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की कोशिशों से यह ख्वाहिश पूरी अब पूरी होती दिख रही है। राजधानी निवासी डीके रैना ने जम्मू कश्मीर में धारा-370 समाप्त होने के बाद कुछ इस तरह से अपनी खुशी जाहिर की।
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जम्मू कश्मीर में राजनैतिक माहौल बदला तो डीके रैना ने भावुक होते हुए अमर उजाला के साथ अपने मन की बात साझा की। उन्होंने बताया कि कश्मीर के हालात बेहद खराब हो चुके थे। दंगे और हमलों के बीच परिवार की सुरक्षा खतरे में लग रही थी। ऐसे में पलायन मजबूरी थी। हमारा घर हब्बा कदल में था। हमारे परिवार के साथ ही साले रोशन कौल और रवि कौल, साली अंजलि कौल और हमारे एक पड़ोसी ने वहां से निकलने की योजना बनाई। उम्मीद थी कि जल्द ही घर लौट आएंगे। इसलिए साथ में सिर्फ मामूली सामान तथा कंबल रजाई ली। हमारे साले का घर थोड़ा दूर था तो वे रात में सिर पर रजाई रखकर कई किलोमीटर का सफर तय करके ट्रक के पास पहुंचे। सेना ने हमें बनियल तक पहुुंचा दिया। इसके बाद हमारा परिवार ने कुछ दिन टेंट में गुजारे। इसके बाद एक-एक कमरा लेकर हम लोगों ने गुजर बसर की। कमरे में इतनी जगह हुआ करती थी जिसमें हम मुश्किल से लेट सकते थे। डीके रैना बताते हैं कि हालात सुधरने के बाद दो तीन बार अपने घर तक गया। घर तो गिर चुका है और सामान चोरी हो चुका था और माहौल इतना खराब था कि कुछ मिनट ठहरना भी मुश्किल था। वहां पर विस्थापित हिंदुओं के मकानों पर अघोषित सा कब्जा हो चुका है। अब उम्मीद है कि वहां के हालात सुधरेंगे। इसके बाद सबसे पहले वहां हम अपना घर बनवाएंगे। इसके बाद कोशिश होगी कि अपनी सरजमीं पर जाकर बस सकें।
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