अखिलेश की कोशिशों पर फिरा पानी, माफिया की शरण में पहुंच ही गई सपा
सपा आखिरकार माफिया और आपराधिक छवि वालों की शरण में पहुंच ही गई। 2012 के विधानसभा चुनाव के वक्त पश्चिम के बाहुबली डीपी यादव को सपा में लेने से इन्कार कर अखिलेश यादव ने अपने नेतृत्व में पार्टी को नई पहचान देने का संदेश दिया था।
पर, 2017 का चुनाव करीब देख सपा फिर आपराधिक छवि वाले नेताओं के मोहपाश में जकड़ी दिख रही है। यह बात साफ हो गई है कि सपा को दागियों या बाहुबलियों से कोई परहेज नहीं है। वोट के लिए कल को अन्य दागियों को भी सपा में जगह मिल सकती है।
भले ही तमाम गंभीर मुकदमों में आरोपी मुख्तार अंसारी के शामिल होने के सवाल पर शिवपाल ने ‘मुख्तार से कोई बात नहीं हुई है’ कहकर आपराधिक छवि वालों से पार्टी की दूरी बरकरार रखने का संदेश देने की कोशिश की हो। पर, हालात पर नजर दौड़ाएं तो यह बात चेहरा बचाने की कोशिश से ज्यादा कुछ नहीं है।
जब कौमी एकता दल का सपा में विलय हो गया है तो उसके विधायक और वह भी ऐसी पार्टी के जो उनके परिवार की ही हो, मुख्तार अलग कैसे रह सकते हैं। यह मुख्तार से सिर्फ औपचारिक परहेज दिखाने की कोशिश है। लगता है, अंसारी भाइयों को सपा में लेने की एक बड़ी वजह पूर्वांचल के मुसलमान हैं।
सपा के रणनीतिकार जानते हैं कि आपराधिक होने के बावजूद अंसारी परिवार को एक तरह से पूर्वांचल में मुस्लिमों का ध्रुवीकरण कराने वाला माना जाता है। सपा को इन भाइयों के आने से कितना लाभ होगा, यह तो भविष्य में पता चलेगा। पर, फिलहाल अंसारी भाइयों को गले लगाने के पीछे सपा के रणनीतिकारों की मंशा पूर्वी उप्र के मुसलमानों को पार्टी के करीब लाने की है।
सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे
राजनीतिक समीक्षक इस कदम को ‘गुड़ खाकर गुलगुले से परहेज’ जैसा बताते हैं। उनके अनुसार, खास बात यह कि अफजाल, सिबगतुल्ला और मुख्तार अलग-अलग नहीं हैं। तीनों भाई परस्पर मिलकर पूर्वांचल में अपनी ताकत बनाने और बढ़ाने के लिए सक्रिय रहते हैं।
ऐसे में मुख्तार के सपा में शामिल होने की घोषणा की सिर्फ औपचारिकता नहीं हुई है बाकी सब कुछ हो गया है। यह संभव नहीं है कि तीनों भाई अलग-अलग रहें।
समीक्षकों के अनुसार, सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने इस कहानी की पटकथा इस तरह तैयार की है कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।
मुख्तार के परिवार और उनके प्रभाव का फायदा सपा को मिल जाए लेकिन परिवार में कलह भी न हो। अखिलेश यादव को यह कहने का मौका भी रहे कि मुख्तार को तो सपा में लिया नहीं गया है।
मुख्तार अंसारी पर हैं 15 मुकदमे
मुख्तार अंसारी ने पिछले विधानसभा चुनाव में जो शपथ पत्र दाखिल किया था उसमें 15 मुकदमों का जिक्र है। इसमें उनके ऊपर आईपीसी की धारा 307 यानी जान से मारने के प्रयास के चार मुकदमें हैं। जबकि चार मुकदमें जान से मारने यानी धारा 302 के दर्ज हैं। गंभीर मारपीट के भी कई मामले उन पर हैं।
आईपीसी की धारा 120 बी के तहत अपराधिक षडयंत्र के आरोप की भी पांच धाराएं लगी हैं। दंगा करवाने की धाराएं भी मुख्तार पर हैं। खतरनाक हथियारों का उपयोग करने के भी आरोप हैं। आईपीसी की धारा 420 के तहत धोखाधड़ी के भी दो मामले दर्ज हैं।
अफजाल अंसारी पर तीन मामले
मुख्तार के भाई अफजाल अंसारी पर तीन गंभीर मामले दर्ज हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने जो शपथ पत्र दाखिल किया उसमें उन पर एक मामला हत्या (धारा 302) का जबकि जान से मारने के प्रयास (धारा 307) का एक मामला दर्ज है। मारपीट-फसाद के भी मामले हैं। अपराधिक षडयंत्र के आरोप की धारा 120 बी भी उन पर लगी हुई है।
मुख्तार के बाबा कांग्रेसी थे और पिता कम्युनिस्ट
पूर्वांचल के डॉन छवि वाले मुख्तार अंसारी का परिवार काफी पहले से सियासी रहा है। उनके बाबा कांग्रेस में थे, तो उनके पिता कम्युनिस्ट। जमीन और कब्जों को लेकर मुख्तार और बृजेश सिंह के बीच कई बार संघर्ष हुआ, जिसमें कई लोग मारे गए। मुख्तार पर पहली बार हत्या का आरोप 1988 में लगा। कई आपराधिक मुकदमे उन पर चल रहे हैं।
मुख्तार ने 1995 में राजनीति शुरू की और 1996 में पहली बार विधायक बने। बृजेश सिंह के करीबी माने जाने वाले और पूर्वांचल में मुख्तार के लिए चुनौती बन रहे भाजपा विधायक कृष्णानंद राय से उनकी तब ठन गई, जब राय ने 2002 में गाजीपुर के मोहम्मदाबाद से पांच बार विधायक रहे मुख्तार के भाई अफजाल को चुनाव में हरा दिया। बाद में राय की हत्या हो गई, जिसके मुख्य आरोपी मुख्तार हैं। वह बसपा में भी रह चुके हैं, पर रामदीन मौर्य की हत्या में नाम आने पर उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया।
कई पार्टियों में जाने की जुगत भिड़ाने के बाद अंसारी ने आखिरकार कौमी एकता दल नाम से अपनी पार्टी बनाई। मुख्तार और उनके बड़े भाई सिबगतुल्ला अंसारी पार्टी के विधायक और तीसरे भाई अफजाल अंसारी अध्यक्ष हैं। मंगलवार को उनकी पार्टी का सपा में विलय में हो गया।