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यूपी चुनाव: छोटे दलों की कोटे वाली सीटों की लगने लगी बोली, संभावित प्रत्याशियों से लिया जा रहा 'एडवांस'

Thu, 20 Jan 2022 06:47 PM IST
ishwar ashish सुधीर कुमार सिंह, अमर उजाला, लखनऊ
सुधीर कुमार सिंह, अमर उजाला, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Thu, 20 Jan 2022 06:47 PM IST
सार

छोटे दलों की कोटे वाली सीटों की बोली लगनी शुरू हो गई है। समीकरणों के लिहाज से जीत की अधिक संभावना वाली सीटों की ज्यादा कीमत है।

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small parties sell their votes for money after alliance with caste based parties.
प्रतीकात्मक तस्वीर

विस्तार

भाजपा और सपा से गठबंधन करने वाले छोटे सियासी दलों की सीटों का बंटवारा भले ही अब तक मुकम्मल नहीं हो पाया हो, पर छोटे दलों ने अपने कोटे की संभावित सीटों पर माननीय बनने की चाहत रखने वालों से मोलभाव शुरू कर दिए हैं। जातीय समीकरणों के लिहाज से जीत की अधिक संभावना वाली कुछ सीटों पर तो तीन-चार दावेदार मुंहमांगी कीमत देने को तैयार हैं। एक तरह से नीलामी की तर्ज पर सीटों की बोली लगाई जा रही है। कुछ दलों ने तो संभावित प्रत्याशियों से ‘एडवांस’ जमा कराने के बाद भी उन्हें ‘क्लियरेंस’ देने के बजाय प्रतीक्षा सूची में डाल रखा है।

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जातिगत आधार पर बने 12 से अधिक दल ऐसे हैं, जो हर चुनाव में किसी न किसी दल से गठबंधन करके ही मैदान में उतरते हैं। बड़े दल भी खास बिरादरी को साधने की रणनीति के तहत ऐसे दलों को साथ ले ही लेते हैं। बस यहीं से खेल शुरू होता है। समझौते में जो सीटें मिलती हैं उन पर छोटे दल अपने काडर के लोगों को मैदान में उतारने के बजाय, मालदार उम्मीदवारों की तलाश करते हैं।
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सियासी पंडितों का राजनीतिक दलों के अब तक के प्रदर्शन के आधार पर मानना है कि इस बार चुनाव द्विकोणीय होने के ज्यादा आसार हैं। इससे सीटों की कीमतें बढ़ गई हैं। खासकर पूर्वांचल में कई सीटों के लिए छोटे दलों के पास उम्मीदवारों की भीड़ लगने लगी है। कुछ बाहुबली भी कतार में हैं। कुछ बिल्डरों, ठेकेदारों, बड़े व्यापारियों, उद्योगपतियों में भी भाजपा और सपा से गठबंधन करने वाले छोटे दलों को मिलने वाली सीटों के लिए होड़ मची हुई है।

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बाहुबलियों के लिए प्रवेश द्वार भी हैं छोटे दल

देखा जाए तो बाहुबलियों के बड़े दलों या सत्ताधारी दल में प्रवेश का माध्यम भी यही छोटे दल बनते हैं। लोकसभा और विधानसभा के पिछले कई चुनाव इस बात के गवाह हैं कि छोटे दल समझौते में मिली सीटों पर अपने काडर के लोगों के बजाय बाहरी को ही चुनाव लड़ाते हैं। इनमें वे लोग शामिल होते हैं जो या तो बाहुबली या माफिया छवि के हैं, या किसी बड़े दल ने जिनका टिकट काट दिया हो। 2017 के चुनाव में भी सत्ताधारी दल से गठबंधन करने वाले दलों ने ऐसा ही किया था।

उदाहरण के तौर पर शाहगंज, अजगरा, दुद्धी, मडियाहूं, छानबे जैसी कई सीटों पर लड़े उम्मीदवारों को देखा जा सकता है। इस बार भी सपा और भाजपा से गठबंधन करने वाले छोटे दलों से कई माफिया व बाहुबली चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी में हैं। इन सबने भी सीटों के लिए मोलभाव शुरू कर दिए हैं।

चुनाव के समय ही बढ़ती है सक्रियता
सक्रियता के आधार पर आकलन किया जाए तो जातिगत आधार पर जन्म लेने वाले ऐसे छोटे दल करीब साढ़े चार साल तक शांति से बैठे रहते हैं। इनके संस्थापकों को इस अवधि में न तो जाति के उत्थान की याद आती है और न ही उनकी सियासी भागीदारी को लेकर किसी तरह के कार्यक्रम के आयोजन को लेकर ही ये सक्रिय होते हैं। अलबत्ता इनकी सक्रियता सिर्फ चुनावी साल में ही देखने को मिलती है। जातीय गोलबंदी करने के नाम पर राजनीतिक दलों का संचालन करने वाले ये लोग जाति के अधिकार और सम्मान के बजाय चुनाव के समय भी सिर्फ सीटों की सौदेबाजी के लिए ही सक्रियता दिखाते हैं।

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