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'बदनाम' प्रदेश में सपा को कैसे मिली संजीवनी

Wed, 17 Sep 2014 01:16 PM IST
राजेंद्र सिंह/अमर उजाला, लखनऊ
राजेंद्र सिंह/अमर उजाला, लखनऊ Updated Wed, 17 Sep 2014 01:16 PM IST
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कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर कठघरे में खड़ी की जाती रही समाजवादी पार्टी के लिए विधानसभा और लोकसभा उपचुनाव संजीवनी बनकर आए हैं। सपा ने भाजपा से विधानसभा की आठ सीटें ही नहीं छीनी, मैनपुरी के अपने गढ़ को भी महफूज रखा है।

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उपचुनावों के परिणामों ने प्रदेश की राजनीति में सपा की अहमियत और बढ़ा दी है। नतीजों का प्रदेश की राजनीति पर दूरगामी असर पड़ने की संभावना है। प्रदेश में विधानसभा के 11 और लोकसभा की मैनपुरी सीट के उपचुनाव पर देश भर की नजरें लगी थीं।
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चार महीने पहले ही भाजपा ने प्रदेश में लोकसभा की 71 सीटें जीती हैं। दो सीटें उसके सहयोगी अपना दल को मिली थीं। बंपर जीत के बाद प्रदेश की राजनीति में भाजपा की सक्रियता काफी बढ़ गई थी। भाजपा नेता सपा पर लगातार हमले कर रहे थे। कभी-कभी तो सपा बैकफुट पर नजर आई।
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ऐसे माहौल में हुए उपचुनावों में भाजपा को 11 में महज तीन सीटें ही मिल सकीं। मैनपुरी सीट पर भी उसकी करारी हार हुई है। लोकसभा चुनाव में खोई प्रतिष्ठा पाने की जद्दोजहद में जुटी सपा के लिए ये चुनाव संजीवनी साबित हुई।

सियासी के साथ रणनीतिक जीत भी

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कमजोर सीटों पर दूसरे दलों के नेताओं को प्रत्याशी बनाया
केस-1: सपा ने मुरादाबाद जिले की ठाकुरद्वारा सीट पर 2012 में दूसरे नंबर पर रहने वाले कांग्रेस प्रत्याशी नवाब जान को सपा में शामिल किया और चुनाव मैदान में उतारा। कांठ में सांप्रदायिक माहौल के बावजूद ढाई साल पहले पांचवें नंबर पर रही सपा 27 हजार से ज्यादा वोटों से चुनाव जीत गई।

केस-2: कौशांबी जिले की सिराथू सीट पर सपा कमजोर स्थिति के साथ नंबर तीन पर रही थी। उसने 2007 में इसी सीट से बसपा से विधायक रहे वाचस्पति पासी पर दांव लगाया। रणनीति सटीक बैठी और वाचस्पति 25 हजार से ज्यादा वोटों से चुनाव जीत गए।

केस-3: बहराइच की बलहा सीट पर सपा ने बसपा के नानपारा विधानसभा क्षेत्र के संयोजक और दो बार के जिला पंचायत सदस्य बंशीधर बौद्ध को पार्टी में शामिल किया और प्रत्याशी बना दिया। वह 25 हजार से ज्यादा वोटों से विजयी रहे। इस सीट पर 2012 में सपा के शब्बीर अहमद काफी पिछड़ते हुए तीसरे नंबर पर रहे थे।

कामयाब रहा जीत ही धर्म है का फॉर्मूला

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दूसरे दलों के मजबूत नेताओं को सपा में शामिल करके चुनाव लड़ाने के ये चंद उदाहरण यह समझने के लिए काफी हैं कि समाजवादी पार्टी ने आठ विधानसभा सीटों पर जीत का परचम यूं ही नहीं लहराया। प्रत्याशी चयन से लेकर प्रचार तक के लिए बनाई गई सपा की कारगर रणनीति ने असर दिखाया।

जिन 11 सीटों पर उपचुनाव हुआ है, उनमें वर्ष 2012 में सपा केवल तीन सीटों लखनऊ, चरखारी और निघासन में ही नंबर दो पर रही थी। छह सीटों पर बसपा और दो पर कांग्रेस प्रत्याशी दूसरे स्थान पर थे।

सपा को मालूम था कि उपचुनाव वाली सीटों पर उसकी स्थिति 2012 में पार्टी की लहर होने के बावजूद बहुत अच्छी नहीं रही थी, इसलिए उसने मजबूत प्रत्याशी चुनने में कई प्रयोग किए। मुलायम सिंह कहते रहे हैं कि चुनाव में जीत ही धर्म है।

इसीलिए जीत के लिए ठाकुरद्वारा, बलहा, सिराथू और सहारनपुर की सीटों पर दूसरे दलों से तोड़कर लाए गए नेताओं को प्रत्याशी बनाया। जहां पार्टी नंबर दो पर थी, वहां पुराने प्रत्याशियों पर ही भरोसा जताया। दोनों ही रणनीतियां कारगर रहीं। अन्य सीटों पर उस क्षेत्र के सामाजिक समीकरण को ध्यान में रखकर रणनीति बनाई गई। मतलब पार्टी के लिए नंबर दो रणनीति कामयाब रही।

ध्रुवीकरण रोकने में मिली कामयाबी

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भाजपा वोटों का ध्रुवीकरण करके उपचुनाव जीतना चाहती थी। इसके लिए योगी आदित्यनाथ और डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने आक्रामक प्रचार किए। इसके जवाब में सपा ने सधा हुआ प्रचार किया। केवल ठाकुरद्वारा सीट पर ही मुस्लिम प्रत्याशी उतारा।

पिछली बार निघासन में आरए उस्मानी को उम्मीदवार बनाया गया था, लेकिन इस बार कुर्मी बहुल इस सीट पर पूर्व विधायक कृष्ण गोपाल पटेल को टिकट दिया। यह दांव सटीक रहा।

इसी तरह सिराथू से दलित वर्ग से वाचस्पति पासी को मैदान में उतारा। सहारनपुर सीट पर पिछली बार महाजिर हसन चौथे नंबर पर रहे थे, इस बार वहां संजय गर्ग को प्रत्याशी बनाया। भले ही वे चुनाव हार गए लेकिन 81 हजार से ज्यादा वोट लेने में सफल रहे।

ये रहे सपा के रणनीतिकार

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सपा ने हर विधानसभा सीट पर कुछ मंत्रियों को प्रभारी और सहप्रभारी बनाया। कोशिश यह रही कि ज्यादातर सीटों पर ऐसे मंत्रियों को लगाया जाए जो वहां से बहुत वाकिफ नहीं थे। मकसद साफ था, नए लोग गुटबंदी से अलग रहेंगे। इस रणनीति के तहत सहारनपुर में बलराम सिंह यादव और शाहिद मंजूर, बिजनौर में महबूब अली और भगवत शरण गंगवार, ठाकुरद्वारा में राजकिशोर सिंह और नरेन्द्र वर्मा को प्रभारी बनाया गया।

लखनऊ पूरब की जिम्मेदारी चार मंत्रियों अंबिका चौधरी, अरविद सिंह गोप, अहमद हसन और अभिषेक मिश्रा को दी गई थी। महबूब अली और भगवत शरण गंगवार बिजनौर के प्रभारी बनाए गए थे।

राजकिशोर सिंह और नरेंद्र वर्मा ठाकुरद्वारा के प्रभारी बनाए गए थे। इसी तरह नोएडा की कमान मंत्री नारद राय और असीम यादव को तथा बलहा विधानसभा उपचुनाव की जिम्मेदारी एसपी यादव और विनोद सिंह के हवाले की गई थी।

निघासन में मंत्री राममूर्ति वर्मा और रामकरण आर्य, सिराथू में पारसनाथ यादव और शंखलाल मांझी को चुनाव जिताने का जिम्मा दिया गया था। हमीरपुर में गायत्री प्रसाद प्रजापति कमान संभाले हुए थे। इसी तरह अन्य सीटों पर भी मंत्री लगाए गए थे।

नोएडा में प्रत्याशी चयन पर उठी थी अंगुलियां

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सपा ने सभी सीटों पर जिताऊ प्रत्याशी ढूंढे, वहीं नोएडा सीट पर डिबाई (बुलंदशहर) के विधायक श्री भगवान शर्मा उर्फ गुड्डू पंडित की पत्नी काजल शर्मा को उम्मीदवार बना दिया।

पार्टी के ही कई नेताओं को गुड्डू पंडित की पत्नी की उम्मीदवारी पर ऐतराज था। उनका कहना था कि भले ही काजल प्रत्याशी हैं लेकिन लोग यही मानेंगे कि चुनाव गुड्डू पंडित लड़ रहे हैं। इस सीट पर सपा को उनकी छवि का नुकसान हुआ।

सबसे कम मतदान के बावजूद इस सीट पर भाजपा प्रत्याशी लगभग 59 हजार वोटों से विजयी रहीं। सहारनपुर में सपा को कांग्रेस प्रत्याशी के मजबूती से चुनाव लड़ने और हाल ही में दंगे के कारण वोटों के ध्रुवीकरण जैसी स्थिति के कारण हार का सामना करना पड़ा।

सीएम को भी मिली ताकत

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उपचुनाव के नतीजे यद्यपि सरकार को सीधे तौर पर प्रभावित नहीं करेंगे, फिर भी सपा और सरकार पर उनका असर पड़ेगा। लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद से सपा नेता और कार्यकर्ता हतोत्साहित थे।

उपचुनावों के नतीजों से उनमें उत्साह का संचार हुआ है। वर्ष 2017 की सत्ता को लेकर भी उम्मीदें जगी हैं। किसी दल के कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ा होना ही जंग जीतने की पहली शर्त कही जाती है। इस लिहाज से उपचुनाव के नतीजे सपा के लिए काफी मुफीद माने जा रहे हैं।

लोकसभा चुनाव के बाद ब्यूरोक्रेसी और सियासी लोगों में सपा के निष्प्रभावी होने का संदेश गया था। इससे सरकार के कामकाज पर प्रत्यक्ष तौर पर न सही, अप्रत्यक्ष तौर पर असर पड़ा था।

विधानसभा की आठ और लोकसभा की मैनपुरी सीट जीतने के बाद सपा के प्रदेश अध्यक्ष और मुख्यमंत्री की नैतिक ताकत बढ़ी है। इससे सरकार और संगठन में वह मजबूत होकर उभरे हैं। सीएम को ताकत मिलने से वह और मजबूती से सरकार चला सकेंगे।

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