यूपी की हालत खस्ता, योगी कैसे कराएंगे अर्थव्यवस्था का 'शीर्षासन'
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यूपी के आम बजट में नई सरकार के हाथ विकास कार्यों के लिए जिस तरह बंधे नजर आए हैं, उससे राज्य की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था की तस्वीर सामने आ गई है। इसके बावजूद 2017-18 के आम बजट में वित्त मंत्री राजेश अग्रवाल और बजट बाद ब्रीफिंग में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अगले पांच साल में राज्य की विकास दर दहाई अंक में ले जाने का सुनहरा ख्वाब दिखाया है। यह अर्थव्यवस्था का ‘शीर्षासन’ कराने जैसा है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि यह लक्ष्य कठिन है लेकिन असंभव नहीं है। इसके लिए सरकार को परंपरागत नीतियों को भी शीर्षासन कराना होगा। मामूली सुधारों से यह लक्ष्य प्राप्त करना संभव नहीं है। महेंद्र तिवारी की एक रिपोर्ट-
वित्त विभाग के एक जिम्मेदार अधिकारी कहते हैं कि उन्होंने बजट पर यह प्रतिक्रिया भी सुनी है कि पांच वर्षों में प्रदेश को 10 प्रतिशत की विकास दर तक ले जाना योगी सरकार की वैसी ही बात है जैसी कि किसानों की आत्महत्या के बीच केंद्र सरकार का कर्जमाफी से इन्कार लेकिन 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का दावा।
पर, तथ्यों की बात करें तो योगी सरकार ने कमजोर अर्थव्यवस्था की हकीकत और रिजर्व बैंक व तमाम अर्थशास्त्रियों की आलोचनाओं को दरकिनार कर किसानों की कर्जमाफी जैसा निर्णय लेने का दम दिखाया है। इसके लिए अपने बजट से व्यवस्था की। कर्ज के लिए झोली नहीं फैलाई। लुभावनी घोषणाएं करने का मोह नहीं पाला।
साथ ही किसानों का उत्पादन बढ़ाने के लिहाज से जरूरी सिंचाई, बीहड़, बंजर, जल भराव वाले क्षेत्रों को सुधारने के अलावा कृषि मजदूरों को आवंटित भूमि का उपचार कराने तथा उन्हें आजीविका दिलाने के लिए पंडित दीनदयाल उपाध्याय किसान समृद्धि योजना का भी एलान किया। मिट्टी परीक्षण और गन्ना किसानों के मूल्य भुगतान को प्राथमिकता में रखा। वह कहते हैं कि इससे बेहतर किसानी का रास्ता बनेगा। किसानों का उत्पादन बढ़ेगा। उनकी आय बढ़ेगी। सरकार ने कर्जमाफी अर्थव्यवस्था को नजरअंदाज करने के लिए नहीं, बल्कि उसे ‘बूस्ट-अप’ करने के लिए की है। इसका फायदा आगे नजर आएगा।
ऊपर वाले का भी रहा साथ तो दिखेगी अर्थव्यवस्था की रफ्तार
बजट के विशेषज्ञ एक अन्य अधिकारी कहते हैं कि अगले वित्त वर्ष से कर्जमाफी जैसा खर्च नहीं होगा। यह पैसा विकास से जुड़ी दूसरे कार्यों के लिए उपलब्ध होगा। इसके अलावा इस वित्त वर्ष में जीएसटी से ज्यादा लाभ भले नजर न आए, लेकिन अगले वित्त वर्ष से इसका सर्वाधिक फायदा यूपी को ही होने की उम्मीद है। यूपी सबसे ज्यादा उपभोक्ता वाला राज्य है।
इसके अलावा जीएसटी ने अर्थव्यवस्था को ऑनलाइन सिस्टम में लाने की पहल की है। इससे ‘टैक्स लिकेज’ रुकेगी और केंद्र की रेवेन्यू रिसीप्ट बढ़ेगी। केंद्र की रेवेन्यू रिसीप्ट में प्रदेश की हिस्सेदारी भी बढ़ेगी। अर्थव्यवस्था में पारदर्शिता आएगी तो सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) बढ़ेगा और प्रदेश की ऋण क्षमता भी बढ़ जाएगी।
सर्विस सेक्टर को प्रोत्साहन मिलेगा तो परचेज पावर बढ़ेगा। इसके अलावा कृषि सेक्टर को प्रोत्साहित करने के लिए सिंचाई, कीटनाशक, फसल तैयार होने पर लाभकारी मूल्य में उसकी बिक्री की मुक्कमल व्यवस्था पर ध्यान दिया जाए। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पशुपालन व डेयरी पर फोकस किया जाए। इससे गांव में ही रोजगार के अवसर बढ़ते हैं। नौकरी के लिए होने वाला पलायन रुकता है।
सरकार ने पहली बार ऐसी इंडस्ट्री पॉलिसी दी हैजिससे पिछड़े क्षेत्रों में उद्योग लगेंगे। यह नीति सफल रही तो प्रदेश की तस्वीर बदलेगी। सर्विस सेक्टर, इंडस्ट्री और कृषि क्षेत्र उम्मीद के हिसाब से रहे तो लक्ष्य मुमकिन है, लेकिन इसमें ऊपर वाले की कृपा सबसे ज्यादा जरूरी है। वजह, प्रदेश की कृषि मानसून पर निर्भर है। दैवी आपदा की चिंता बनी रहती है। यदि सब कुछ योजना के हिसाब से चला तो अगले साल से ही अर्थव्यवस्था में बेहतरी के संकेत मिलने लगेंगे।
नीति आयोग की नीति पर तय टाइमलाइन से बढ़ रही सरकार
नियोजन विभाग के एक अधिकारी कहते हैं कि नीति आयोग किसानों की आय दोगुनी करने और विकास दर दहाई अंक में ले जाने के लिए काम कर रहा है। नई सरकार ने नीति आयोग के दिशा-निर्देशों के हिसाब से फोकस बनाकर टाइमलाइन से काम करने का निर्देश दिया है। पहली बार पूरा नीति आयोग लखनऊ आया।
मुख्यमंत्री खुद इसके निर्देशों पर अमल पर नजर रख रहे हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री या वित्त मंत्री का दहाई अंक में विकास दर की बात करना लक्ष्य के प्रति एकाग्रता ही दिखाता है।
अरसे बाद अनावश्यक खर्चों में कटौती, दिखेगा असर
व्यय नियंत्रण पर नजर रख रहे एक अफसर बताते हैं कि बजट का मतलब लोक लुभावनी घोषणाएं ही मानी जाती रही हैं। व्यय नियंत्रण का मतलब जिस पर नाराज, उसके बजट में कटौती और जहां सरकार का फरमान, वहां फंड ट्रांसफर करने तक सीमित था। दशकों बाद किसी सरकार ने अनावश्यक खर्चों में कटौती की पहल की है। संस्थाओं को बिना मतलब दिए जाने वाले ऋण में कमी की है।
4314 करोड़ रुपये ऋण अनुदान में कटौती की गई है। कर्ज को वित्तीय अनुशासन के दायरे में रखने का स्पष्ट लक्ष्य तय किया है। राजकोषीय घाटा जो पिछली सरकार में मानक को पार कर गया था, उसे 2017-18 के लिए 2.97, 18-19 के लिए 2.81, 19-20 के लिए 2.91 और 20-21 के लिए 2.99 प्रतिशत रखने का लक्ष्य तय किया है।
इसके अलावा छुट्टियां कम कर काम के घंटे बढ़ाए हैं। ये कड़े कदम आने वाले दिनों में अर्थव्यवस्था को बेहतर दिशा देंगे। राज्य की ऋणग्रस्तता भी सकल राज्य घरेलू उत्पाद के सापेक्ष 30 प्रतिशत के भीतर तय की है। 2017-18 के लिए 28.6 प्रतिशत रखा है।
लक्ष्य तय, प्रयास शुरू, जरूर सफल होंगे
इस पर वित्तमंत्री राजेश अग्रवाल का कहना है कि विकास दर दहाई में ले जाने की बात एक दिन में नहीं हो सकती। इसके लिए योजना बनाकर काम करना होगा। सरकार ने इसका लक्ष्य तय किया है। इसके लिए पांच साल का समय लिया गया है।
किसानों की कर्जमाफी और कृषि से जुड़े सेक्टर पर बजट का बहुत बड़ा हिस्सा समर्पित किया गया है। इससे किसानों की आय बढ़ेगी, ऐसा विश्वास है। जब काश्तकारों के हाथ में पैसा होगा तो वह पैसा बाजार में आएगा। इंडस्ट्री आगे बढ़ेगी। सरकार का रेवेन्यू बढ़ेगा। सरकार विकास में निवेश बढ़ा सकेगी। सरकार चरणबद्ध तरीके से काम कर इस लक्ष्य को प्राप्त करने का विश्वास रखती है।
प्रदेश की विकास दर
2013--4.47
2014--4.74
2015--7.24
2016--7.56
प्रमुख मदों में कटौती
यात्रा--20.02 प्रतिशत
कार्यालय खर्च--31.02 प्रतिशत
फर्नीचर व उपकरण--43.28 प्रतिशत
विज्ञापन आदि--7.82 प्रतिशत
गोपनीय खर्च--8.74 प्रतिशत
निवेश/ऋण--6.94 प्रतिशत
अन्य व्यय--25.57 प्रतिशत
वर्दी व्यय--2.25 प्रतिशत
लघु निर्माण--70.74 प्रतिशत
बड़े निर्माण--18.09 प्रतिशत
(नोट--यह कटौती वित्त वर्ष 2016-17 के बजट के सापेक्ष है।)
2021 तक जीएसडीपी 20 लाख करोड़ पहुंचने का अनुमान
वित्त वर्ष--रकम (करोड़ रुपये में)
2016-17--12,36,000
2017-18--14,45,770
2018-19--15,86,588
2019-20--17,69,522
2020-21--19,68,593