नदवी ने बनाया मानव कल्याण बोर्ड, कहा- हर धर्म के लोगों को बोर्ड में देंगे जिम्मेदारी
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ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के पूर्व सदस्य एवं दारुल उलूम नदवतुल उलमा के डीन मौलाना सलमान हुसैनी नदवी ने बृहस्पतिवार को मानव कल्याण बोर्ड के गठन का एलान किया है। मौलाना ने बोर्ड में सभी मजहब के धर्म गुरुओं और बुद्धिजीवियों को शामिल कर उन्हें बड़ी जिम्मेदारी देने की बात भी कही।
उन्होंने बताया कि बोर्ड किसी भी धार्मिक मसले का समाधान अदालत के बाहर अमन के साथ निपटाने का काम करेगा। बोर्ड के पहले कार्यक्रम में मनकामेश्वर मंदिर की महंत देव्या गिरि समेत सिख, ईसाई और बौद्ध धर्म के लोगों ने शामिल होकर मौलाना की पहल पर अपनी सहमति दे दी है।
कार्यक्रम के दौरान नदवी ने पत्रकारों से कहा कि भारत में अंग्रेजों के आने से पहले सभी मजहब के लोग प्यार मोहब्बत से रहते थे। अंग्रेजों ने मजहब के नाम पर लोगों के लड़ाया और अब उनके शागिर्द ये काम कर रहे हैं। देश की आजादी से लेकर अब तक देश में 25,000 से ज्यादा दंगे हो चुके हैं। ऐसे में नफरत की दीवार गिराने के लिए मानवता व इंसानियत का संदेश देना अहम हो गया है।
हर धर्म के लोगों को बोर्ड में देंगे जिम्मेदारी
सलमान हुसैनी नदवी ने कहा कि मानव कल्याण बोर्ड में सभी मजहब के धर्मगुरुओं और बुद्धिजीवियों को शामिल कर उन्हें बड़ी जिम्मेदारी दी जाएगी। बोर्ड का अध्यक्ष किसी पूर्व चीफ जस्टिस को बनाया जाएगा। स्वास्थ्य, महिला व न्यायिक क्षेत्र के लिए कमेटी बनाई जाएगी।
मौलाना ने पत्रकारों से कहा कि श्रीश्री रविशंकर को भी बोर्ड से जोड़ने की कोशिश हो रही है। अयोध्या के साधु-संतों को भी जोड़ा जाएगा। यहां तक कि समाज में मजहब के नाम पर नफरत फैलाने वाले आरएसएस, बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठनों से इंसानियत का संदेश देने के लिए बात की जाएगी। कश्मीर, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान सहित कई प्रदेशों से लोगों को जोड़ा जा चुका है।
सीमित है पर्सनल लॉ बोर्ड का दायरा
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के समकक्ष बोर्ड खड़ा करने के सवाल पर मौलाना ने कहा, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का दायरा शौहर-बीवी व पारिवारिक रिश्तों तक ही सीमित है जबकि हमारे बोर्ड का दायरा असीमित रहेगा। मानव कल्याण बोर्ड कभी धरना-प्रदर्शन नहीं करेगा। सिर्फ बातचीत से मसले हल होंगे। उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा, वह मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में लौटने को तैयार हैं लेकिन पहले यूसुफ मचाला, ओवैसी व कमाल फारूकी को बाहर निकाला जाए।
किसी दबाव में नहीं हटे अयोध्या मसले से पीछे
क्या बातचीत से अयोध्या का हल निकालने की कोशिश से पीछे हटने की वजह किसी तरह का दबाव है? इस सवाल पर उन्होंने कहा, कोई पक्षकार श्रीश्री रविशंकर की बात मानने को तैयार नहीं हो रहा था। अयोध्या के साधु-संत भी उनकी सुन नहीं रहे थे। मुस्लिम पक्षकार भी अड़े थे। ऐसे माहौल में बातचीत कैसे हो सकती है। इसीलिए हमने भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करना बेहतर समझा। श्रीश्री से हमारा कोई अलगाव नहीं हुआ है। हमारे रास्ते अब भी एक हैं।
उन्होंने कहा कि अयोध्या में मस्जिद बने लेकिन ये जरूरी नहीं है कि मस्जिद का नाम बाबर के नाम पर ही हो। उन्होंने इस्लामिक विश्वविद्यालय बनाने की वकालत करते हुए कहा, विवि में हिंदी, उर्दू समेत हर भाषा में मजहब की जानकारी दी जाए।