मेयरों को झटका, बदले जाएंगे अधिनियम!
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नगर निगमों के मेयर अब मनमानी नहीं कर पाएंगे। राज्य सरकार उनकी मनमानी पर अंकुश लगाने की तैयारी कर रही है। मेयरों के खिलाफ किसी भी तरह की वित्तीय गड़बड़ी की शिकायत पर उनके अधिकार सीज करने की तैयारी है।
हालांकि, अब तक केवल डीएम की संस्तुति पर निकाय चेयरमैनों के अधिकार सीज किए जाते हैं। मेयरों का अधिकार सीज करने के लिए मंडलायुक्त की रिपोर्ट ली जाएगी। राज्य सरकार ‘उत्तर प्रदेश नगरीय स्थानीय निकाय अधिनियम-2015’ में इसका प्रावधान करने जा रही है।
प्रदेश में मौजूदा समय 14 नगर निगम हैं जिसमें मुरादाबाद, मेरठ, गाजियाबाद, बरेली, आगरा, अलीगढ़, कानपुर, झांसी, इलाहाबाद, लखनऊ, गोरखपुर व वराणासी में मेयर हैं। एक नवसृजित व एक नगर निगम में चुनाव न होने से मेयर नहीं हैं। मेयरों का निर्वाचन सीधे चुनाव के जरिये होता है।
निर्वाचित मेयरों पर सीधी कार्रवाई का अधिकार शासन के पास नहीं है। इसलिए शासन समय-समय पर मेयरों के अधिकार में कटौती करती रहती है, फिर भी मेयरों को कोई फर्क नहीं पड़ता है। इसलिए सरकार मेयरों पर सीधा नियंत्रण चाहती है। इस क्रम में उनके वित्तीय अधिकारों को सीज करने के लिए उत्तर प्रदेश नगरीय स्थानीय निकाय अधिनियम 2015 में प्रावधान करने की तैयारी है।
न्याय विभाग से ली जा रही है राय
शासन स्तर पर हुई उच्चाधिकारियों की बैठक में इस पर लगभग सहमति बन गई है। न्याय विभाग से राय ली जा रही है। अधिकारियों का तर्क है कि पालिका परिषद अधिनियम में वित्तीय गड़बड़ी पर निकाय चेयरमैनों के अधिकार सीज करने की व्यवस्था है। इसलिए गड़बड़ी पर मेयरों के अधिकार सीज करने की भी व्यवस्था होनी चाहिए।
अब होगा एक अधिनियम
राज्य सरकार नगर निगम व पालिका परिषद के लिए एक अधिनियम बनाने जा रही है। इसका नाम होगा उत्तर प्रदेश नगरीय स्थानीय निकाय अधिनियम 2015। प्रदेश में अभी तक नगर निगम अधिनियम 1959 और पालिका परिषद अधिनियम 1916 है। ये दोनों उस समय की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाए गए थे। मौजूदा जरूरतों के आधार पर अब ये अधिनियम उपयोगी नहीं रहे।
इसलिए नगर विकास विभाग ने इन दोनों अधिनियमों को मर्ज करते हुए इसके स्थान पर नया अधिनियम उत्तर प्रदेश नगरीय स्थानीय निकाय अधिनियम-2015 बनाने जा रहा है। इसमें नगर निगम और पालिका परिषदों के अधिकारियों में एकरूपता लाई जाएगी।