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...तो इसलिए गहरी होती जा रही है मुलायम-अमर की दोस्ती

Wed, 15 Jul 2015 10:18 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Wed, 15 Jul 2015 10:18 PM IST
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Reason for friendship of Mulayam and Amar.

अमर और मुलायम सिंह के बीच दोस्ती के रिश्ते और गाढ़े होने की ध्वनि गूंजने के साथ ही जयाप्रदा को विधान परिषद को भेजने की चर्चा शुरू हो गई है। हालांकि अमर सिंह सपा में शामिल होने पर अभी चुप्पी नहीं तोड़ रहे हैं।

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वह जयाप्रदा के विधान परिषद में मनोनीत होने की संभावनाओं से भी इन्कार कर रहे हों लेकिन दोनों तरफ से रिश्तों पर जमी बर्फ पिघलाने की कोशिश जिस तरह परवान चढ़ रही है, उससे इन कयासों को बल ही मिल रहा है।
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वैसे भी राजनीति में माना जाता है कि न तो कुछ असंभव होता है और न कोई इन्कार किसी संभावना को हमेशा के लिए समाप्त ही कर देता है। ऐसा होता तो शायद न मुलायम सिंह ही इफ्तार पार्टी में अमर को बुलाने उनके घर जाते और न मुलायम को लेकर अमर सिंह की बोली ही बदलती।
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वैसे भी सूबे में अखिलेश सरकार बनने के बाद पहली बार मुलायम और अमर की नजदीकी चर्चा में नहीं आई है। लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद जनेश्वर मिश्र की पुण्य तिथि पर मुलायम और अमर की दोस्ती चर्चा में आई थी। तब से अब तक दोनों की कई मुलाकातें हो चुकी हैं।

एक तीर से कई निशाने

Reason for friendship of Mulayam and Amar.

माना जा रहा है कि राजनीति के चतुर खिलाड़ी मुलायम सिंह जयाप्रदा के बहाने अमर की तरफ दोस्ती का एक और कदम बढ़ाने की कोशिश जरूर करेंगे। इससे उन्हें दो लाभ होंगे। एक तो इन सीटों का पार्टी से कोई सीधा रिश्ता न होने की वजह से अमर के लिए फिलहाल यह कहने की सुविधा भी रहेगी कि वह सपा में शामिल नहीं हुए हैं तो दूसरी तरफ मुलायम को अमर सिंह जैसे तार्किक राजनीतिक वक्ता का समर्थन व साथ भी मिल जाएगा।

वहीं मुलायम के लिए आजम और रामगोपाल यादव को साथ रखना भी आसान रहेगा। यही नहीं, मनोनयन कोटे वाली इन सीटों को लेकर राजभवन व सरकार के बीच जारी गतिरोध को भी दूर करने में सुविधा रहेगी। कारण, जयाप्रदा के मनोनयन पर सवाल इसलिए भी नहीं उठेगा क्योंकि सपा से सांसद रह लेने के बावजूद उनकी स्थापित अभिनेत्री वाली छवि अभी लोगों के दिमाग से मिटी नहीं है।

टूट सकता है गतिरोध
विधान परिषद में मनोनयन कोटे की चार सीटों पर राजभवन की हरी झंडी मिल गई है लेकिन पांच सीटों पर अब भी गतिरोध कायम है। जिन नामों पर पेंच फंसा है उनमें पूर्व विधायक कमलेश पाठक, बिल्डर संजय सेठ, रणविजय सिंह, मत्स्य विकास निगम के चेयरमैन डॉ. राजपाल कश्यप और सहारनपुर निवासी सरफराज खान शामिल हैं।

इनमें सबसे ज्यादा गतिरोध संजय सेठ के नाम पर माना जा रहा है। सेठ पर आयकर का छापा भी पड़ चुका है। पर, मुलायम जैसे नेता को भी इन नामों पर यू टर्न लेने के लिए कोई बहाना तो चाहिए ही। जाहिर है कि जयाप्रदा को समायोजित करने से ज्यादा मुफीद तर्क उनके लिए दूसरा नहीं हो सकता।

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