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Lucknow News: अब कैंसर मरीजों की सिंकाई होगी और भी आसान, प्लास्टिक मास्क और निशान से भी मुक्ति
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कैंसर इंस्टीट्यूट के डॉक्टरों ने किया अध्ययन।
लखनऊ। पेल्विक कैंसर (गर्भाशय, मलाशय, प्रोस्टेट) के मरीजों के लिए रेडिएशन थेरेपी (सिंकाई) अब आसान होगी। मरीजों को प्लास्टिक मास्क और शरीर पर स्थायी टैटू के निशानों से पूरी तरह मुक्ति मिलेगी। कल्याण सिंह सुपर स्पेशियलिटी कैंसर इंस्टीट्यूट के डॉक्टरों ने यह संभव किया है।
संस्थान के डॉ. प्रमोद कुमार गुप्ता, डॉ. शरद सिंह, डॉ. रुमिता सिंह और सुमंत मन्ना की टीम ने आधुनिक एसजीआरटी (सरफेस-गाइडेड रेडिएशन थेरेपी) पर अध्ययन किया है। इसमें साबित हुआ है कि यह तकनीक इलाज को आसान बनाती है। पारंपरिक रेडियो थेरेपी में मरीजों को थर्माप्लास्टिक मास्क से कसकर बांधा जाता था। त्वचा पर पक्के टैटू भी बनाए जाते थे, जो हमेशा शरीर पर रहते थे। एसजीआरटी तकनीक में इन सबकी आवश्यकता नहीं पड़ती है। डॉक्टरों ने 100 मरीजों के 2,376 रेडिएशन सत्रों का विश्लेषण किया। यह अध्ययन हाल ही में एक अंतरराष्ट्रीय रिसर्च जर्नल में प्रकाशित हुआ।
नई तकनीक के लाभ
- चेहरे या पेट के निचले हिस्से को टाइट प्लास्टिक मास्क से कसने की जरूरत नहीं होती।
- मरीजों को घबराहट और असुविधा नहीं होती।
- त्वचा पर जीवनभर रहने वाले काले या नीले टैटू के निशानों से आजादी मिलती है।
- टेबल पर लेटने और मशीन सेटअप का समय 3.55 मिनट से घटकर औसतन 2.51 मिनट रह गया है।
पारंपरिक थेरेपी में थीं ये परेशानियां
पुरानी तकनीक में मास्क को टेबल के साथ कसकर फिक्स किया जाता था। इससे मरीज हिल नहीं पाते थे और पेट, कमर या जांघों पर भारी दबाव महसूस होता था। शरीर के निचले हिस्से या चेहरे पर सख्त मास्क बंधे होने से कई मरीजों को घुटन और डर लगता था। मास्क त्वचा से चिपका रहता था, जिससे खिंचाव, पसीना और खुजली का खतरा रहता था। सेटअप और डिलीवरी के दौरान कसी हुई स्थिति में रहने से मांसपेशियों में अकड़न होती थी।
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संस्थान के डॉ. प्रमोद कुमार गुप्ता, डॉ. शरद सिंह, डॉ. रुमिता सिंह और सुमंत मन्ना की टीम ने आधुनिक एसजीआरटी (सरफेस-गाइडेड रेडिएशन थेरेपी) पर अध्ययन किया है। इसमें साबित हुआ है कि यह तकनीक इलाज को आसान बनाती है। पारंपरिक रेडियो थेरेपी में मरीजों को थर्माप्लास्टिक मास्क से कसकर बांधा जाता था। त्वचा पर पक्के टैटू भी बनाए जाते थे, जो हमेशा शरीर पर रहते थे। एसजीआरटी तकनीक में इन सबकी आवश्यकता नहीं पड़ती है। डॉक्टरों ने 100 मरीजों के 2,376 रेडिएशन सत्रों का विश्लेषण किया। यह अध्ययन हाल ही में एक अंतरराष्ट्रीय रिसर्च जर्नल में प्रकाशित हुआ।
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नई तकनीक के लाभ
- चेहरे या पेट के निचले हिस्से को टाइट प्लास्टिक मास्क से कसने की जरूरत नहीं होती।
- मरीजों को घबराहट और असुविधा नहीं होती।
- त्वचा पर जीवनभर रहने वाले काले या नीले टैटू के निशानों से आजादी मिलती है।
- टेबल पर लेटने और मशीन सेटअप का समय 3.55 मिनट से घटकर औसतन 2.51 मिनट रह गया है।
पारंपरिक थेरेपी में थीं ये परेशानियां
पुरानी तकनीक में मास्क को टेबल के साथ कसकर फिक्स किया जाता था। इससे मरीज हिल नहीं पाते थे और पेट, कमर या जांघों पर भारी दबाव महसूस होता था। शरीर के निचले हिस्से या चेहरे पर सख्त मास्क बंधे होने से कई मरीजों को घुटन और डर लगता था। मास्क त्वचा से चिपका रहता था, जिससे खिंचाव, पसीना और खुजली का खतरा रहता था। सेटअप और डिलीवरी के दौरान कसी हुई स्थिति में रहने से मांसपेशियों में अकड़न होती थी।
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