खेवनहार ही डुबो रहे भाजपा की चुनावी नाव!
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अमित शाह का चुनाव प्रबंधन फेल हो गया। डैमेज कंट्रोल के इंतजाम हवा हो गए। टिकटों और सीटों का झगड़ा सड़क पर आ गया।
राष्ट्रीय अध्यक्ष बयानबाजी पर लगाम की चेतावनी दे रहे हैं। नेतृत्व के खिलाफ मैदान में ताल ठोक रहे नेता मैदान से हटने के लिए शर्तों का पुलिंदा लिए डटे हैं।
ताल ठोकने वाले न तो नए चेहरे हैं और न आम कार्यकर्ता। इनमें वे चेहरे शामिल हैं जो कभी पार्टी का नेतृत्व कर चुके हैं।
वैसे नजर दौड़ाएं तो इन मुसीबतों के लिए कोई दूसरा नहीं, खुद भाजपा की बागडोर संभालने वाले ही कठघरे में खड़े दिखाई देते हैं। झगड़ा अहं की लड़ाई का दिखता है।
जगने लगीं चुनावी महत्वकांक्षाएं
लंबे समय तक संगठन मंत्री रहे एक नेता तर्क देते हैं कि पार्टी के पास पहले सुंदर सिंह भंडारी, कुशाभाऊ ठाकरे जैसे नेता थे, जिनका चुनावी राजनीति से कुछ लेना-देना नहीं था।
इनकी अपनी कोई महत्वाकांक्षा नहीं थी। इन नेताओं की नजर दूसरों दलों से लोगों को लाने के बजाय अपने ही दल के लोगों को तवज्जो देने पर रहती थी।
इसलिए इनके टिकटों से लेकर अन्य फैसलों पर अंगुलियां उठाने की किसी को हिम्मत नहीं होती थी। पर, दुर्भाग्य से पिछले कुछ वर्षों में भाजपा के भीतर इस तरह के नेताओं की संख्या घटी है।
जो कुछ बचे हैं, उनके भीतर चुनावी महत्वाकांक्षाएं जाग गईं। महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए कुछ ने पार्टी के ढांचे को नुकसान पहुंचाया।
फिर संगठन मंत्रियों के खिलाफ माहौल बनाकर उन्हें अविश्वसनीय बनाया। धीरे-धीरे पूरे तंत्र पर कब्जा कर लिया। चुनावी महत्वाकांक्षाएं पाले नेताओं ने कार्यकर्ताओं के बीच भरोसा खो दिया।
चुनाव समिति की बैठक बगैर बन गए पैनल
इन्हीं स्थितियों के कारण भाजपा की मुसीबतों में भी इजाफा होता जा रहा है। भाजपा में पार्टी की प्रदेश चुनाव समिति काफी महत्वपूर्ण व शक्तिशाली रही है।
हमेशा इस समिति की कई दौर की बैठकों के बाद प्रत्याशियों के पैनल दिल्ली जाते थे। समिति में सारे प्रमुख नेताओं की मौजूदगी से जहां टिकटों के फैसले में इन सबकी राय शामिल हो जाती थी, वहीं नेताओं का अहं भी संतुष्ट हो जाता था।
पर, पता नहीं चूक कहां हुई कि चुनावी व सांगठनिक प्रबंधन के महारथी माने जाने वाले शाह का ध्यान इस ओर गया ही नहीं।
उन्होंने खुद कुछ लोगों को साथ लेकर अपने स्तर से जिस तरह प्रत्याशियों के पैनल बनवाए, उससे यूपी के प्रमुख नेताओं में यह संदेश गया कि फैसलों से जान-बूझकर उन्हें दूर किया जा रहा है।
क्या कहना है वाजपेयी का
हालांकि पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी कहते हैं कि प्रदेश चुनाव समिति की एक बैठक पिछले वर्ष 4 मई को लखनऊ में और दूसरी 16 सितंबर को दिल्ली में हुई थी।
इसके बाद सभी प्रमुख नेताओं से अलग-अलग बात की गई। वाजपेयी की बात ही स्वीकार करें तो साफ हो जाता है कि 16 सितंबर के बाद प्रदेश चुनाव समिति की बैठक नहीं हुई।
मतलब, 16 सितंबर की चर्चा से निकले निष्कर्षों पर मार्च 2014 में प्रत्याशी तय किए जा रहे हैं।
यह तो होना ही था
भाजपा के एक पूर्व प्रदेश अध्यक्ष तर्क देते हैं कि फैसलों में देरी और साहस के अभाव ने समस्या पैदा की है।
पहले कार्यकर्ताओं को उनकी पसंद से टिकट का भरोसा दिया गया और बाद में दूसरे दलों से चेहरों को लाने के इंतजार में निर्णयों में देरी की गई।
उससे नीचे से ऊपर तक महत्वाकांक्षाएं बढ़नी ही थीं। उसी का टकराव हो रहा है। आम लोगों की न सही, पार्टी हाईकमान को कम से कम बड़े चेहरों के बारे में तो अब तक फैसला कर ही देना चाहिए था।
अगर इन्हें चुनाव लड़ाना था तो सीट की घोषणा कर देते। अगर नहीं लड़ाना था तो उसे हिम्मत करके यह बात सार्वजनिक करनी चाहिए थी कि सूबे के अमुक-अमुक नेताओं को पार्टी ने दूसरी भूमिकाएं देने का फैसला किया है।
तब जो नेतृत्व के खिलाफ मुखर होता तो उस पर कार्रवाई करते।
पर, जब यह संदेश देने की कोशिश की जाएगी कि मुरली मनोहर जोशी, लालजी टंडन, कलराज मिश्र, सूर्यप्रताप शाही, केशरी नाथ त्रिपाठी, विनय कटियार, ओमप्रकाश सिंह जैसे नेताओं की पार्टी के फैसलों में अब कोई भूमिका नहीं है तो इस तरह का संकट खड़ा होगा ही ।