...तो 50-60 पैसे यूनिट महंगी हो जाएगी बिजली
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बिजली अभियंताओं ने पावर कॉर्पोरेशन के निजी कंपनियों को कोयला आयात व खुले बाजार से कोयला खरीदने की अनुमति देने के फैसले को गलत बताया है। उनका कहना है कि इससे बिजली 50-60 पैसे प्रति यूनिट महंगी हो जाएगी।
अभियंताओं ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से तत्काल प्रभावी हस्तक्षेप की अपील करते हुए कहा है कि पावर कॉर्पोरेशन निजी घरानों को खुलेआम मुनाफा कमाने और लूट का लाइसेंस दे रहा है जिसे हर हाल में रोका जाना चाहिए।
गौरतलब है कि प्रदेश में बिजली की जबर्दस्त किल्लत को देखते हुए पावर कॉर्पोरेशन ने शुक्रवार को रोजा बिजलीघर के लिए रिलायंस को कोयला आयात और बजाज एनर्जी को खुले बाजार से कोयला खरीदने की अनुमति देने का फैसला किया था।
ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के चेयरमैन शैलेंद्र दुबे व राज्य विद्युत परिषद अभियंता संघ के महासचिव डीसी दीक्षित ने इस फैसले के औचित्य पर सवाल उठाते हुए कहा कि इससे इन बिजलीघरों से मिलने वाली बिजली की दरों में 50-60 पैसे प्रति यूनिट तक वृद्धि हो जाएगी।
बढ़ेगी बिजली की उत्पादन लागत
कॉर्पोरेशन इस समय रोजा से 6.06 रुपये यूनिट और बजाज से 7.75 रुपये प्रति यूनिट की दर पर बिजली ले रहा है जो सबसे महंगी है। अब कोयला आयात के नाम पर इन बिजलीघरों से पावर कॉर्पोरेशन को और महंगी बिजली खरीदनी पड़ेगी।
अभियंताओं का कहना है कि रोजा प्रथम चरण के लिए 27 लाख टन प्रतिवर्ष व द्वितीय चरण के लिए 22 लाख टन प्रतिवर्ष कोयला चाहिए जिसका अनुबंध सेंट्रल कोलफील्ड लिमिटेड के साथ है।
भारतीय कोयले का मूल्य 1900 रुपये प्रति टन है जबकि आयातित कोयला 7500-8000 रुपये तक प्रति टन पड़ेगा। इस प्रकार 11.25 प्रतिशत यानी 5.5 लाख टन आयातित कोयला प्रयोग करने से उत्पादन लागत 50 से 60 पैसे प्रति यूनिट बढ़ जाएगी।
सालाना 503 करोड़ से ज्यादा की चपत
अगर उत्पादन लागत में 50 पैसे यूनिट की वृद्धि होती है तो रिलायंस से खरीदी जाने वाली 7748 मिलियन यूनिट बिजली के लिए 387 करोड़ तथा बजाज एनर्जी से खरीदी जाने वाली 2323 मिलियन यूनिट बिजली के लिए 116 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष कॉर्पोरेशन को अधिक भुगतान करना होगा। अंतत: इसकी भरपाई टैरिफ बढ़ाकर आम जनता से की जाएगी।
अखिर सरकार का मकसद क्या है?
पदाधिकारियों ने कहा कि रोजा और बजाज के साथ किए गए एमओयू व बिजली खरीद अनुबंध पर सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में गंभीर आपत्तियां उठाते हुए 8000 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान होने का अनुमान लगाया है। ऐसे में आपत्तियों पर समुचित कार्यवाही किए बिना रोजा और बजाज को कोयले के नाम पर मनमानी लूट की इजाजत देने का क्या औचित्य है?
लूट की खुली छूट क्यों?
अभियंता पदाधिकारियों का कहना है कि जब देशव्यापी कोयला संकट के चलते सस्ती बिजली देने वाले उत्पादन निगम के अपने बिजलीघर बंद हो रहे हैं तो किस नीति के तहत सबसे महंगी बिजली देने वाले रिलायंस व बजाज को कोयला आयात व खुले बाजार से खरीद की छूट दी गई है?
किसी ऑडिट के अभाव में कैसे पता चलेगा कि रोजा में कितना आयातित कोयला वास्तव में खर्च हुआ या दाम बढ़ाने के लिए फर्जी खर्च दिखा दिया गया? उत्पादन निगम की जांच में फर्जीवाड़ा उजागर भी हो चुका है। रोजा व बजाज से खरीदी जाने वाली बिजली की दरों की कोई अधिकतम सीमा क्यों नहीं तय की जा रही है?
रोजा व बजाज के साथ किए गए एमओयू पर सीएजी की रिपोर्ट के मद्देनजर करार निरस्त करने की कार्यवाही के बजाय कोयला की आड़ में लूट की छूट क्यों दी जा रही है? रिलायंस पर सासन बिजलीघर से मात्र 1.20 रुपये प्रति यूनिट की दर पर मिलने वाली बिजली के पूरे हिस्से के लिए क्यों नहीं दबाव डाला जा रहा है?