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यूपी में ‘ब्राह्मण’ वोट के लिए मची मारामारी, 'पंडित' बने राहुल गांधी

Sun, 25 Sep 2016 10:39 PM IST
अनिल श्रीवास्तव/अमर उजाला, लखनऊ
अनिल श्रीवास्तव/अमर उजाला, लखनऊ Updated Sun, 25 Sep 2016 10:39 PM IST
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 Political parties fighting for brahman vote bank in Uttar Pradesh.
पोस्टर में राहुल गांधी के नाम के आगे पंडित - फोटो : amar ujala

विधानसभा चुनाव में इस बार नजारा कुछ बदला-बदला सा दिख रहा है। सभी प्रमुख दलों में ब्राह्मण के सहारे सत्ता हासिल करने की जोर-आजमाइश हो रही है। करीब 55 फीसदी पिछड़ा वर्ग, इनमें से भी तकरीबन 32 फीसदी अति पिछड़ा वर्ग की जातियों को अपने खांचे में फिट करने के बाद सभी दलों ने अब ब्राह्मणों को अपने पाले में खड़ा करने के लिए ताकत झोंक रखी है।

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इनमें खुद को ब्राह्मणों का सबसे बड़ा हितैषी साबित करने की होड़-सी लगी है। कांग्रेस के पोस्टरों में पहली बार राहुल गांधी ‘पंडित’ बताए जा रहे हैं, तो उन्नाव के ब्राह्मण परिवार में आई ‘पंजाबी’ बहू शीला दीक्षित को पार्टी ने ब्राह्मण चेहरा बनाकर बतौर मुख्यमंत्री के रूप में आगे किया है।
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होड़ में पीछे तो भाजपा भी नहीं है। ब्राह्मणों की नाराजगी से बचने तथा उनका समर्थन हासिल करने के लिए 75 साल की बंदिश के बावजूद भाजपा ने कलराज मिश्र को केंद्रीय मंत्रिमंडल में बनाए रखा है, तो काफी समय से उपेक्षित चल रहे शिव प्रताप शुक्ला को राज्यसभा भेजकर ब्राह्मणों का ख्याल रखने का संदेश देने में भी पीछे नहीं है।

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2007 का करिश्मा दोहराने की कोशिश में बसपा

 Political parties fighting for brahman vote bank in Uttar Pradesh.
मायावती - फोटो : amar ujala

जहां तक बसपा का सवाल है तो वह अपने एकमात्र ब्राह्मण चेहरे सतीश चंद्र मिश्र के बलबूते 2007 के दलित ब्राह्मण-दलित समीकरण के करिश्मे को दोहराने की मुहिम में जुटी है। अलबत्ता समाजवादी पार्टी इस होड़ में कहीं दिखाई तो नहीं दे रही है, लेकिन माता प्रसाद पांडेय, अशोक वाजपेयी व शारदा प्रताप शुक्ला जैसे नेताओं के  सहारे वह भी ब्राह्मणों को अपने पाले में लाने की कोशिश में जरूर है।

मौजूदा समय में सूबे में चल रही सियासी जोड़-तोड़ पर नजर डालें तो साफ है कि सपा को छोड़ बाकी तीनों बड़ी पार्टियां लगभग 10 फीसदी ब्राह्मण वोट की राजनीति में ही जुटी हैं। कांग्रेस, बसपा और भाजपा तीनों ने ही ब्राह्मण को चुनाव की धुरी बनाया है।

2007 के विधानसभा चुनाव को छोड़ दें, जब मायावती ने ब्राह्मण और दलित समीकरण बना कर सत्ता हासिल की थी, तो पिछले 27 साल में पहली बार प्रमुख राजनीतिक दलों का एकाएक ब्राह्मणों की तरफ रुझान बढ़ा है। इसकी एक वजह यह भी मानी जा सकती है कि ब्राह्मण वर्ग हमेशा से बड़ी समझदारी व रणनीतिक तरीके से वोट करता आया है।

आम तौर पर ब्राह्मणों का वोट उसी तरफ जाता है, जिस पार्टी की सरकार बनने की संभावना रहती है। ऐसे में सभी पार्टियां अपने-अपने पक्ष में माहौल बनाकर ब्राह्मणों को आकर्षित करने के लिए पूरा दम लगाए हुए हैं।

कांग्रेस कर रही है ये कोशिशें

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हाल की सियासी सरगर्मियों पर नजर डालें तो ब्राह्मणों को चुनावी राजनीति की धुरी बनाने की पहल कांग्रेस की ओर से शुरू हुई। उसने शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित किया।

शुरू में थोड़ी हिचक दिखाने के बाद अब वे खुल कर प्रचार में उतर आई हैं और अपनी पूरी सक्रियता दिखाने की कोशिश कर रही हैं। कांग्रेस के चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर की पहल पर कांग्रेस ब्राह्मणों की बैठकें करा रही है।

बंद कमरे में ब्राह्मण नेता मिल रहे हैं और अलग-अलग इलाकों में उनको काम करने के लिए भेजा जा रहा है। यही नहीं ‘किसान यात्रा’ में कुछ जगह कांग्रेस की ओर से लगवाए गए पोस्टरों में ‘पंडित राहुल गांधी’ लिखवाकर पार्टी ने नया दांव चला है।

इससे विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को कितना फायदा होगा यह तो नतीजे बताएंगे, लेकिन इतना जरूर है कि कांग्रेस के इस दांव ने भाजपा जैसी पार्टी को भी चौकन्ना कर दिया है जो सवर्णों के वोटबैंक पर अपना एकाधिकार मानती है।

भाजपा भी पीछे नहीं, अपना रही है ये हथकंडे

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भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह - फोटो : amar ujala

कांग्रेस की सक्रियता देखते हुए भाजपा भी हरकत में आ गई है। भाजपा ने अचानक गैर यादव पिछड़ा वर्ग के साथ-साथ ब्राह्मण राग भी अलापना शुरू कर दिया है।

भाजपा ने राज्यसभा के चुनाव में लंबे समय से हाशिये पर चल रहे शिव प्रताप शुक्ल को सांसद बनाया तो मंत्रिमंडल विस्तार में महेंद्र नाथ पांडेय को केंद्र में मंत्री बनाया।

यही नहीं 75 साल से अधिक का होने के बावजूद कलराज मिश्र को मोदी कैबिनेट में मंत्री बनाए रखा है। ब्राह्मण वोटों को लेकर भाजपा की छटपटाहट का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि बसपा में साधारण सी हैसियत रखने वाले ब्रजेश पाठक जैसे नेता को उसने बड़ा नेता बताते हुए आयात कर लिया।

साफ है कि भाजपा खुद को ब्राह्मणपरस्त साबित करने में कांग्रेस से पीछे नहीं रहना चाहती।

2014 के चुनाव में काम नहीं आया बसपा का फॉर्मूला

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2007 के विधानसभा चुनाव में जिस दलित-ब्राह्मण समीकरण के बूते मायावती ने सत्ता हासिल की थी, वह 2012 के विधानसभा व 2014 के लोकसभा चुनाव में छिन्न-भिन्न हो गया। ब्रजेश पाठक के भाजपा में चले जाने के बाद बसपा के पास अब अब ले-देकर एकमात्र ब्राह्मण चेहरा सतीश चंद्र मिश्र ही बचे हैं।

बसपा सत्ता में वापसी के लिए पूरा दम लगाए हुए है। मायावती अब 2017 के चुनाव के पहले प्रदेश की सुरक्षित सीटों पर बसपा के दलित प्रत्याशियों को ब्राह्मणों का वोट दिलाने की रणनीति बनाने में जुटी हैं।

राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्र सहित कई नेताओं को मंडलवार सुरक्षित सीटों पर ब्राह्मणों को जोड़ने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। लोकसभा चुनाव में बसपा एक भी सीट नहीं जीत पाई थी।

पर, सुरक्षित सीटों पर भी सूपड़ा साफ हो जाना दलितों के बीच मायावती के प्रभाव में कमी के तौर पर देखा जा रहा है। मायावती सुरक्षित सीटों पर अपने प्रत्याशियों की जीत पहले तय करना चाहती हैं। ब्राह्मणों का इस लिहाज से खास उपयोग किया जा रहा है।

सिर्फ मुसलमान ही नहीं ब्राह्मण सपा के एजेंडे में

 Political parties fighting for brahman vote bank in Uttar Pradesh.
मुलायम ‌सिंह यादव - फोटो : amar ujala

यूं तो प्रदेश सपा का मुख्य फोकस पिछड़ों और मुसलमानों पर ही रहता है, लेकिन ब्राह्मण वोटों की अहमियत को समझते हुए उसने भी ब्राह्मणों को अपने एजेंडे में रखा है।

सपा ब्राह्मणों को जोड़ने मे पीछे नहीं रहना चाहती है, इसीलिए उसने कई ब्राह्मण चेहरों को मोर्चे पर लगा रखा है। सपा प्रबुद्ध सम्मेलनों के जरिये ब्राह्मणों को पार्टी से जोड़ने में लगी है।

माता प्रसाद पांडेय व अशोक वाजपेयी जैसे नेताओं को तो अहमियत दी ही गई है, ब्राह्मणों के बीच संदेश देने के लिए पिछले दिनों शारदा प्रताप शुक्ल को उच्च शिक्षा मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बनाया गया है।

पूर्व मंत्री अशोक वाजपेयी को हाल ही में प्रवक्ता पद की जिम्मेदारी दी गई है। अलबत्ता इस बार ब्राह्मण सपा से बहुत खुश नहीं दिखते।

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