लोकायुक्त चयन में चीफ जस्टिस की भूमिका खत्म
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मनमाफिक नियुक्ति का रास्ता साफ करने के लिए राज्य सरकार ने लोकायुक्त के चयन में हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की भूमिका पूरी तरह से समाप्त करने का फैसला किया है। लोकायुक्त का चयन अब मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में गठित चार सदस्यीय समिति करेगी।
इसमें विधानसभा अध्यक्ष, विधानसभा में नेता विपक्ष तथा मुख्यमंत्री द्वारा विधानसभा के परामर्श से नामित सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश बतौर सदस्य शामिल होंगे। चयन समिति के सदस्यों में से कोई पद खाली होने पर भी लोकायुक्त की नियुक्ति को अवैध नहीं माना जाएगा।
राज्यपाल द्वारा लोकायुक्त के लिए जस्टिस रविंद्र सिंह का नाम खारिज कर दिए जाने के बाद सरकार ने विधानमंडल सत्र के अंतिम दिन बृहस्पतिवार को विपक्ष के जबर्दस्त विरोध व समूचे विपक्ष के बहिर्गमन के बीच इन प्रावधानों के साथ आनन-फानन में दोनों सदनों में उ.प्र. लोकायुक्त तथा उप लोकायुक्त (संशोधन) विधेयक 2015 पास करा लिया।
विधानसभा में विधेयक को प्रवर समिति के सुपुर्द करने संबंधी विपक्ष का प्रस्ताव ध्वनिमत से नामंजूर हो गया। विपक्ष ने सरकार पर लोकतंत्र का गला घोंटने का आरोप लगाते हुए विधेयक का विरोध किया। सरकार ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए करते हुए कहा कि लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए विधेयक लाया गया है।
आसान नही है लोकायुक्त चयन पर राज्यपाल की मंजूरी
शून्य प्रहर में एकाएक अनुपूरक एजेंडे के जरिये सरकार ने संशोधन विधेयक सदन के पटल पर रखा और चर्चा के बाद उसे ध्वनिमत से पास भी करा लिया। इसके तत्काल बाद इसे मंजूरी के लिए विधान परिषद में भेज दिया गया। वहां भी इसे ध्वनिमत से पास कर लिया गया। अब यह विधेयक मंजूरी के लिए राज्यपाल के पास भेजा जाएगा।
सरकार के इस कदम से लोकायुक्त का मामला एक बार फिर राजभवन के पाले में पहुंच गया है। नए लोकायुक्त की नियुक्ति को लेकर सरकार और राजभवन के बीच जिस तरह टकराव की स्थिति पैदा हुई, उसे देखते हुए फिलहाल इस विधेयक को आसानी से मंजूरी मिलने के आसार नहीं हैं।
लोकायुक्त चयन की मौजूदा व्यवस्था
उ.प्र. लोकायुक्त तथा उप लोकायुक्त अधिनियम 1975 की धारा 3 (क) के अनुसार लोकायुक्त को उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और विधानसभा में विरोधी दल के नेता से और यदि ऐसा नेता न हो तो उस व्यक्ति से, जिसे उस सदन में विरोध पक्ष के सदस्यगण ऐसी रीति से जैसा अध्यक्ष निर्देश दें, परामर्श करने के पश्चात नियुक्त किया जाएगा।
अधिनियम में संशोधन के बाद व्यवस्था
संशोधन के बाद अब यह प्रावधान किया है कि लोकायुक्त को निम्नानुसार गठित चयन समिति की सिफारिश पर राज्यपाल द्वारा नियुक्त किया जाएगा। 1. मुख्यमंत्री- अध्यक्ष, 2. विधानसभा अध्यक्ष- सदस्य, 3. विधानसभा में नेता विरोधी दल- सदस्य और 4. उच्चतम न्यायालय या किसी उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जिन्हें इस समिति के अध्यक्ष द्वारा विधानसभा अध्यक्ष के परामर्श से नामित किया जाएगा -सदस्य।
झूठी शिकायत पर एक लाख रुपये तक हर्जाना
सरकार ने उ.प्र. लोकायुक्त तथा उप लोकायुक्त अधिनियम 1975 की धारा 13 (5-क) में भी संशोधन करते हुए प्रावधान कर दिया कि अगर कोई व्यक्ति झूठी, तंग करने वाली या किसी लोकसेवक को अपमानित करने की मंशा से शिकायत करता है तो लोकायुक्त व उपलोकायुक्त शिकायतकर्ता को कारण बताने का अवसर देने के बाद ऐसी शिकायत की जांच अपने विवेक से बंद कर सकते हैं। साथ ही शिकायतकर्ता पर एक लाख रुपये तक का हर्जाना लगा सकते हैं, जो राज्य के संचित निधि में जमा होगी।
अगर शिकायतकर्ता आदेश के दो महीने के भीतर हर्जाने की राशि का भुगतान नहीं करता है तो यह उसकी संपत्ति से भू-राजस्व के रूप में कलेक्टर के माध्यम से वसूल की जाएगी। अभी झूठी शिकायत करने पर छह माह की कैद या अधिकतम पांच हजार रुपये जुर्माने अथवा दोनों से दंडित करने का प्रावधान है।