Lucknow News: कूड़ा प्रबंधन में नाकाम चीनी कंपनी की छह महीने में होनी थी छुट्टी, दो साल बाद भी जमी
शहर साफ न होने पर चीनी कंपनी को छह महीने में हटाना था पर दो साल बाद भी कार्रवाई नहीं हुई। हाल ये है कि अल्टीमेटम देने के बाद भी न तो शिवरी प्लांट चला और न ही डोर-टू-डोर कूड़ा कलेक्शन सुधरा।
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कचरा प्रबंधन में लगी चीनी कंपनी ईकोग्रीन को बार-बार नोटिस...। बार-बार अल्टीमेटम...। पर, न तो कंपनी सुधरी और न ही शहर की साफ-सफाई की व्यवस्था। फिर भी कंपनी पर कोई कार्रवाई नहीं। कागजी हंटर से सुधार होगा भी कैसे? आमजन की सेहत से सीधे तौर पर जुड़ी दवाइयों को लेकर भी यही हाल है। निजी अस्पतालों में मेडिकल स्टोर चल रहे हैं। चलते ही जा रहे हैं...। ये वैध हैं या अवैध, सिस्टम को कोई फर्क नहीं पड़ता। तल्ख अल्फाजों से चौंकिए नहीं! ये हकीकत है। सहायक मंडल ड्रग आयुक्त कहते हैं- इनका रिकॉर्ड स्वास्थ्य विभाग के पास होगा। सीएमओ दलील देते हैं-अस्पताल के पंजीकरण के समय फार्मेसी के दस्तावेज नहीं लगाए जाते। ये हाल है सिस्टम का। ये मेहरबानियां हैं सिस्टम की। मेहरबानियां हैं तभी तो ये सब मनमानियां चल रही हैं।
ईकोग्रीन एनर्जी की लापरवाही के चलते इन दिनों शहर में कूड़ा प्रबंधन बेपटरी है। इसे लेकर चेतावनी देेने के अलावा निजी कंपनी पर कोई कार्रवाई नहीं की गई है। हालांकि, यह पहली बार नहीं है। मार्च 2020 में भी कंपनी को शासन ने छह माह इस शर्त के साथ दिए थे कि इस दौरान कचरा प्रबंधन में सुधार नहीं हुआ तो छह महीने बाद उसका अनुबंध अपने आप खत्म हो जाएगा। हालांकि, इसके बाद भी न तो कंपनी का काम सुधरा और न ही शासन ने कोई कार्रवाई की। अनुबंध भी अब तक चल रहा है। वहीं, चार साल में नगर निगम सदन दो बार ईकोग्रीन का अनुबंध खत्म कर उसे हटाने का प्रस्ताव पास कर शासन को भेज चुका है, लेकिन फिर भी शासन चुप्पी साधे है।
कचरा प्रबंधन में सुधार को लेकर तीन साल पहले तत्कालीन मुख्य सचिव की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय बैठक हुई थी। इसमें ईकोग्रीन ने कहा था कि उसे टिपिंग फीस का भुगतान नहीं हो रहा, जबकि नगर निगम ने कहा था कि कंपनी का काम सही नहीं है। इसके बाद कमेटी बनाने के साथ यूजर चार्ज की वसूली के लिए थर्ड पार्टी लगाने और टिपिंग फीस का भुगतान नगर निगम से ले लिया गया था। वहीं, शासनादेश के तहत नए सिरे से हुए अनुबंध में तय हुआ कि छह महीने तक कंपनी को पूरी टिपिंग फीस मिलेगी और उसका करीब 34 करोड़ का बकाया बिल भी अदा किया जाएगा। इसके बाद कंपनी को छह महीने में डोर-टू-डोर कूड़ा कलेक्शन का काम शत प्रतिशत करना होगा। यदि कंपनी इसमें सफल नहीं हुई तो उसका अनुबंध स्वत: समाप्त हो जाएगा। अनुबंध के तहत कंपनी को टिपिंग फीस का भुगतान हुआ और बकाया भी दिया गया, लेकिन उसके काम में सुधार नहीं हुआ।
प्लांट खाली करने में लगेगा एक साल
शिवरी प्लांट पर शहर से रोजाना करीब 1200 मीट्रिक टन कूड़ा आता है। एक साल से सही से कूड़ा निस्तारण न होने से यहां दस लाख मीट्रिक टन से अधिक कूड़े का पहाड़ बन गया है और अब कचरा डालने की जगह भी कम पड़ गई है। आ रहे कूड़े को जेसीबी के सहारे किसी तरह डंप किया जा रहा है। कंपनी के निदेशक राजेश कुरुप मानते हैं कि प्लांट पर डंप कूड़े के निस्तारण में कम से कम एक साल लग जाएगा।
50 प्रतिशत घरों से भी नहीं उठ रहा कूड़ा
नगर निगम के रिकॉर्ड के अनुसार शहर में करीब छह लाख घर हैं, लेकिन अभी इनमें से 50 प्रतिशत से भी कूड़ा नहीं उठ रहा है। इससे खुले में कचरा डाला जा रहा है। नगर निगम कूड़ा कलेक्शन और उसका वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण करने के लिए ईकोग्रीन को हर साल 50 करोड़ रुपये टिपिंग चार्ज देता है, जबकि यूजर चार्ज के रूप में उसे सालाना आठ करोड़ रुपये ही मिल रहे हैं। वहीं, जिन इलाकों में डोर-टू-डोर कूड़ा कलेक्शन की व्यवस्था है, वहां निगम के कर्मचारी भी काम कर रहे हैं। इसका कारण है कि कंपनी के कर्मचारी झाड़ू लगाने और नालियों की सफाई का काम नहीं करते। ऐसे में निगम प्रशासन को अब भी सफाई से लेकर कूड़ा उठान तक का काम कराना पड़ रहा है। इस पर सालाना 50 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार आ रहा है।
सफाई के नाम पर सालाना खर्च
ठेका सफाई : 140 करोड़
डीजल पेट्रोल : 40 करोड़
ईकोग्रीन की टिपिंग फीस : 50 करोड़ करीब
कंपनी के काम में नगर आयुक्त को मिलीं खामियां
- डोर-टू-डोर कूड़ा कलेक्शन करने वाली 49 गाड़ियां खराब।
- शहर में लगे 63 पोर्टेबल काम्पैक्टर में से 24 खराब मिले।
- घरों से कूड़ा न उठाने की शहरवासियों की शिकायतें आ रही हैं।
- पड़ावघर से शिवरी प्लांट तक कूड़ा ले जाने वाले ज्यादातर वाहन खराब।
- अगस्त की शुरुआत में शिवरी प्लांट को पूरी क्षमता से चलाया जाना था, पर अब तक ऐसा नहीं हुआ।
- गाड़ियों का वीटीएस (व्हीकल ट्रैकिंग सिस्टम) दो महीने से बंद है।
- कूड़ा कलेक्शन सिस्टम सही न होने से यूजर चार्ज की वसूली कम हो रही है।
- जोन एक में घरों से वसूला गया 35 लाख रुपये यूजर चार्ज नगर निगम के खाते में जमा नहीं किया गया।
छापे से दूर निजी अस्पतालों के मेडिकल स्टोर
राजधानी में ड्रग विभाग मेडिकल स्टोरों पर तो छापा मार रहा है, लेकिन निजी अस्पतालों के मेडिकल स्टोरों पर कार्रवाई से कतरा रहा है। कमीशन के दम पर चल रहे ये मेडिकल स्टोर चल रहे हैं। अहम बात यह है कि प्राइवेट अस्पतालों में कितने मेडिकल स्टोर का लाइसेंस लिया गया, इसका तक रिकॉर्ड नहीं है। ड्रग-स्वास्थ्य विभाग एक-दूसरे के पास इसका आंकड़ा होने की बात कहकर पल्ला झाड़ रहे हैं। उधर, ये मेडिकल स्टोर राजस्व को हर महीने लाखों की चपत लगा रहे हैं।
ड्रग विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार जिले में करीब 4200 निजी मेडिकल स्टोर चल रहे हैं। वहीं, सीएमओ के अधीन 1200 से अधिक निजी अस्पताल पंजीकृत हैं। हालांकि, प्राइवेट अस्पतालों में चल रहे मेडिकल स्टोर का रिकॉर्ड किसी के पास नहीं है। रजिस्ट्रेशन के समय अस्पताल संचालक डॉक्टर, पैरा मेडिकल स्टाफ समेत अन्य संसाधन के दस्तावेज तो लगाते हैं, लेकिन फार्मेसी का रिकॉर्ड नहीं दिया जाता। वहीं, एफ एसडीए का दावा है कि बड़े व मध्यम श्रेणी के अस्पतालों ने फार्मेसी का लाइसेंस ले रखा है। छोटे अस्पतालों की फार्मेसी का रिकॉर्ड नहीं है। करीब 800 नर्सिंग होम ने अभी तक फार्मेसी का लाइसेंस नहीं लिया है। बावजूद इसके जिम्मेदारों की शह पर यहां सालों से अवैध तरीके से फार्मेसी चल रही है।
चार साल से पहले पड़ा था छापा
चार साल पहले डीएम के निर्देश पर उन्नाव, सीतापुर समेत अन्य जनपदों से ड्रग इंस्पेक्टर बुलाकर निजी अस्पतालों की फार्मेसी पर छापा मारा गया था। अकेले दुबग्गा इलाके में दस निजी अस्पतालों पर कार्रवाई में अवैध तरीके से फार्मेसी चलती मिली थी। उस दौरान टीम ने करीब 15 लाख रुपये की दवाएं जब्त की थीं।