भाजपा के जहरीली सीडी कांड में नया ‘खुलासा’
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जान-बूझकर लंबा खींचा गया। मामला राजनीतिक होने की वजह से आरोपियों को फायदा पहुंचाने के लिए ऐसा किया गया, जिससे प्रकरण खत्म हो जाए और पुलिस पर अंगुली भी न उठे।
सीडी प्रकरण की धाराओं में तीन साल तक की सजा का प्रावधान है, लेकिन चार्जशीट दाखिल करने में ही सात साल लग गए। कानून के जानकारों का कहना है कि अब अदालत विवेचक से जांच में हुए विलंब की वजह पूछ सकती है। अगर विवेचक सही तर्क नहीं दे सका तो अदालत चार्जशीट को संज्ञान में लेने से मना कर सकती है।
उस स्थिति में सात साल पुराना यह प्रकरण खत्म हो जाएगा। सीडी प्रकरण की एफआईआर 6 अप्रैल 2007 को हजरतगंज कोतवाली में दर्ज की गई थी।
विवेचना के बाद बीती 15 नवंबर को आईपीसी की धारा 153 ए, 153 बी, 295, 505 तथा 123 (3) (3-ए)/125 लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम में चार्जशीट दाखिल की गई थी।
देरी के लिए विवेचक को लेनी चाहिए थी मंजूरी
वरिष्ठ अधिवक्ता आईबी सिंह का कहना है कि किसी भी अपराध की विवेचना उस प्रकरण में निर्धारित सजा की अवधि तक ही की जा सकती है।
सीडी प्रकरण में जिन धाराओं में चार्जशीट दाखिल की गई है, उनमें छह माह से तीन साल तक की सजा का प्रावधान है, जबकि विवेचना सात साल में पूरी हुई। सिंह कहते हैं कि अगर तय अवधि में तफ्तीश पूरी नहीं हो पा रही थी, तो विवेचक को संबंधित कोर्ट से मंजूरी लेनी चाहिए थी।
अब अगर कोर्ट विवेचक के तर्क से संतुष्ट होती है तभी चार्जशीट को संज्ञान में लेगी। ऐसा न होने पर कोर्ट चार्जशीट को संज्ञान में लेने से मना कर देगी और मामला खत्म हो जाएगा।
वहीं, बार काउंसिल उत्तर प्रदेश के सदस्य अनिल प्रताप सिंह कहते हैं कि देरी से चार्जशीट दाखिल करना अभियोजन की दृष्टि से कमजोर और मुल्जिम के लिए फायदेमंद है। राजनीतिक प्रकरण होने की वजह से ही विवेचक ने इसे जान-बूझकर रोके रखा होगा।