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दांत के स्टेम सेल से जल्द जुड़ेगी टूटी हड्डी, केजीएमयू के ओरल मैक्सिलोफेसियल विभाग में हुआ नया शोध
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शरीर के किसी भी हिस्से की बुरी तरह क्षतिग्रस्त हड्डी को जोड़ना अब आसान होगा। ऐसे मामलों में दांतों के स्टेम सेल का उपयोग कर टूटी हड्डी को दुरुस्त करने की प्रक्रिया आधे समय में ही पूरी की जा सकेगी। केजीएमयू में इसके लिए नई तकनीक खोजी गई है। इसके अनुसार वयस्क के दांतों से स्टेम निकालकर उसका उपयोग इस काम के लिए किया जा सकता है। इस प्रक्रिया से हड्डी जुड़ने के साथ ही निकाला गया क्षतिग्रस्त भाग दोबारा बन सकेगा।
इस शोध के अनुसार व्यक्ति के वयस्क दांत विशेषकर पिछले दांतों से स्टेम सेल निकालकर उसे छह सप्ताह तक कल्चर करके उगने के लिए रखा गया। इसके बाद उसे व्यक्ति की हड्डी के उस भाग में रखा जाएगा जिसे बुरी तरह क्षतिग्रस्त होने की वजह से निकालना पड़ा हो। शोध में इसकी तुलना साधारण मामले से की गई, जिसमें सामान्य प्रक्रिया के तहत मरीज की हड्डी जोड़ी गई। दोनों ही मामलों की 21 दिन के बाद तुलना की गई। इसमें पता चला कि स्टेम सेल वाले मामले में दोबारा हड्डी बनने की प्रक्रिया करीब ढाई गुना ज्यादा तेज थी। इस शोध को ओडोंटोलॉजी ऑफ निप्पन डेंटल यूनिवर्सिटी जापान के जर्नल में भी प्रकाशित किया गया है।
केजीएमयू की सर्वश्रेष्ठ पीएचडी का अवार्ड
केजीएमयू के ओरल मैक्सिलोफेसियल विभाग में हुए शोध पर शोधार्थी डॉ. शिल्पा त्रिवेदी को पीएचडी प्रदान की गई है। इसे केजीएमयू में हुए सर्वश्रेष्ठ शोध का पुरस्कार भी दिया गया है। इस शोध की पीएचडी गाइड डॉ. दिव्या मल्होत्रा के अनुसार यह उत्साहजनक शोध है। फिलहाल इसे लैब में आजमाया गया है। इसके बाद पहले जानवरों ओर फिर मनुष्यों में इसका ट्रायल किया जाएगा। इसमें कुछ समय लग सकता है, लेकिन इस तरह के उत्साहजनक परिणाम से उम्मीद बंधती है कि भविष्य में ग्राफ्ट बोन के मामलों में यह शोध वरदान साबित होगा।
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इस शोध के अनुसार व्यक्ति के वयस्क दांत विशेषकर पिछले दांतों से स्टेम सेल निकालकर उसे छह सप्ताह तक कल्चर करके उगने के लिए रखा गया। इसके बाद उसे व्यक्ति की हड्डी के उस भाग में रखा जाएगा जिसे बुरी तरह क्षतिग्रस्त होने की वजह से निकालना पड़ा हो। शोध में इसकी तुलना साधारण मामले से की गई, जिसमें सामान्य प्रक्रिया के तहत मरीज की हड्डी जोड़ी गई। दोनों ही मामलों की 21 दिन के बाद तुलना की गई। इसमें पता चला कि स्टेम सेल वाले मामले में दोबारा हड्डी बनने की प्रक्रिया करीब ढाई गुना ज्यादा तेज थी। इस शोध को ओडोंटोलॉजी ऑफ निप्पन डेंटल यूनिवर्सिटी जापान के जर्नल में भी प्रकाशित किया गया है।
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केजीएमयू की सर्वश्रेष्ठ पीएचडी का अवार्ड
केजीएमयू के ओरल मैक्सिलोफेसियल विभाग में हुए शोध पर शोधार्थी डॉ. शिल्पा त्रिवेदी को पीएचडी प्रदान की गई है। इसे केजीएमयू में हुए सर्वश्रेष्ठ शोध का पुरस्कार भी दिया गया है। इस शोध की पीएचडी गाइड डॉ. दिव्या मल्होत्रा के अनुसार यह उत्साहजनक शोध है। फिलहाल इसे लैब में आजमाया गया है। इसके बाद पहले जानवरों ओर फिर मनुष्यों में इसका ट्रायल किया जाएगा। इसमें कुछ समय लग सकता है, लेकिन इस तरह के उत्साहजनक परिणाम से उम्मीद बंधती है कि भविष्य में ग्राफ्ट बोन के मामलों में यह शोध वरदान साबित होगा।
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