यूपी हाथ में फिर भी भाजपा के लिए चुनौती बने निकाय चुनाव, जानें- वजह
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पहले लोकसभा और अब विधानसभा चुनाव में जबरदस्त सफलता के बावजूद निकाय चुनाव भाजपा के लिए चुनौती से कम नहीं हैं। खासतौर से छोटे शहरों व कस्बों के सामाजिक और राजनीतिक समीकरण तथा स्थानीय मुद्दों के प्रभावी होने के कारण भाजपा के लिए लोकसभा और विधानसभा चुनाव जैसे नतीजों की पुनरावृत्ति आसान नहीं दिखती।
सपा और बसपा की तरफ से पार्टी चुनाव चिह्न पर लड़ने की घोषणा ने भी इस चुनौती को बढ़ाया है। यही नहीं, फिरोजाबाद और सहारनपुर दो नए नगर निगमों में पार्टी के लिए कब्जा करना भी भाजपा के रणनीतिकारों के लिए बड़ी परीक्षा बन गया है।
भाजपा में उम्मीदवारों की चयन प्रक्रिया अगले सप्ताह शुरू होने की उम्मीद है। जिलों में पदाधिकारी बैठक कर टिकट के दावेदारों से अर्जियां लेने लगे हैं। इसे जांच-परख के बाद प्रदेश नेतृत्व को भेजा जाएगा।
अभी प्रदेश के 12 नगर निगमों में 11 पर भाजपा के महापौर हैं। वैसे उसके पास 10 महापौर ही थे लेकिन विधानसभा चुनाव से पहले इलाहाबाद की मेयर अभिलाषा गुप्ता नंदी के भाजपा में शामिल हो जाने से यह संख्या 11 हो गई है। पर, नगर पालिका परिषद और नगर पंचायतों की स्थिति भिन्न है। इनमें निर्दलीयों का कब्जा है और ज्यादातर सपा और कुछ बसपा से संबंधित हैं। पार्षदों व सदस्यों के मामले में भी भाजपा पीछे है।
इसलिए कठिन है भाजपा की राह
भाजपा के लिए इन चुनावों की राह कठिन होने की कुछ ठोस वजहें हैं। पिछली बार भाजपा भले ही 12 नगर निगमों में से 10 में अपने महापौर जितवाने में कामयाब रही हो लेकिन दिलचस्प तथ्य यह है कि कहीं भी सदन में भाजपा को बहुमत नहीं मिल पाया था।
सभी नगर निगमों में भाजपा पार्षदों की संख्या सदन के कुल सदस्यों की संख्या के आधे से कम ही थी। मसलन, लखनऊ नगर निगम में पार्षदों की कुल 110 सीटों में भाजपा के हिस्से 44 सीटें आई थीं। यही स्थिति कानपुर सहित अन्य सभी नगर निगमों की थी।
विधानसभा चुनाव के नतीजों के आधार पर नगर निगमों वाले महानगरों में भाजपा की स्थिति का विश्लेषण करें तो मुरादाबाद को छोड़ सभी जगह उसने दूसरे दलों पर जबरदस्त बढ़त बनाई है। सिर्फ मुरादाबाद में ही सात सीटों में भाजपा दो जीत पाई।
इसके अलावा मेरठ की सात में छह, गाजियाबाद में सभी पांच, अलीगढ़ की सभी सात, आगरा व बरेली की सभी नौ, लखनऊ की नौ में आठ, कानपुर नगर की 10 में सात, वाराणसी की सभी आठ, इलाहाबाद की सभी नौ, गोरखपुर की नौ में आठ और झांसी की सभी चार सीटों पर भाजपा की जीत बताती है कि इन स्थानों पर भाजपा दूसरे दलों पर भारी है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि इन महानगरों में भाजपा क्या इसी बढ़त को कायम रखते हुए महापौर की कुर्सी पर कब्जा बनाए रखते हुए पार्षदों की संख्या को भी बहुमत में बदल पाती है या नहीं।
क्या करवट लेंगे नए नगर निगम
सहारनपुर और फिरोजाबाद के रूप में जिन दो नए नगर निगमों का इस बार चुनाव होना है उनकी भी स्थिति अलग नहीं है। दिलचस्प यह है कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव में अलग-अलग रंग दिखाने वाले इन शहरों के मतदाता निकाय चुनाव में कोई और रंग दिखाते हैं या विधानसभा चुनाव के रंग को ही बरकरार रखते हुए आगे बढ़ते हैं।
दरअसल, लोकसभा चुनाव में भाजपा सहारनपुर तो जीतने में कामयाब रही पर, फिरोजाबाद सीट को वह मोदी लहर के बावजूद जीत नहीं पाई। यहां सपा का कब्जा बरकरार रहा और मुलायम परिवार के अक्षय यादव जीते थे। अक्षय सपा महासचिव रामगोपाल यादव के पुत्र हैं। लेकिन विधानसभा चुनाव में रंग बदला हुआ दिखा।
यहां विधानसभा की पांच सीटों में सपा सिर्फ एक पर ही जीत पाई। बाकी चार भाजपा के पक्ष में चली गईं। हालांकि, जिस सहारनपुर में भाजपा ने लोकसभा चुनाव में जीत हासिल की थी वहां विधानसभा की सात सीटों में भाजपा के हिस्से में सिर्फ चार ही आई। दो कांग्रेस और एक सपा के पक्ष में गई।
अब देखना है कि इन शहरों के मतदाता प्रदेश और केंद्र में भाजपा की सरकारों से समन्वय और सामंजस्य की दिशा में आगे बढ़कर नगर निगमों में भाजपा को ही बैठाना पसंद करते हैं या इससे इतर कोई फैसला करते हैं।
यह भी है वजह
भाजपा के सामने चुनौती इस नाते भी है कि पहली बार सपा और बसपा ने पार्टी के चुनाव चिन्ह पर निकाय चुनाव लड़ने की घोषणा की है। इससे भी स्थानीय स्तर पर समीकरणों में उलटफेर होगा। सपा और बसपा के लिए इसके अपने नफा-नुकसान हो सकते हैं पर, भाजपा के लिए स्थिति थोड़ी भिन्न जरूर होगी।
कारण, बसपा के चुनाव निशान पर मैदान में होने से नगरीय इलाकों की दलित बस्तियों के समीकरण भाजपा के लिए कुछ कठिनाई खड़ी कर सकते हैं। सपा के चुनाव निशान के साथ मैदान में होने से मुस्लिम वोटों की लामबंदी भाजपा के लिए चुनौती बन सकती है।
विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद मुस्लिम समाज की तरफ से यह बात कई बार सार्वजनिक हो चुकी है कि वोटों के बंटवारे ने भी भाजपा को बढ़त दी।
यही नहीं, तीन तलाक पर जिस तरह मुस्लिम आबादी खासतौर से इस समुदाय के पुरुष भाजपा के विरोध में खड़े दिख रहे हैं, उसके चलते भी मुस्लिम वोटों की लामबंदी और मजबूत हो सकती है। हालांकि इसका कुछ लाभ भाजपा को हो सकता है क्योंकि कुछ मुस्लिम महिलाएं उसके पक्ष में आवाज उठा रही हैं।
एक नजर में यूपी के नगर निगम
भाजपा--11
सपा समर्थित--01
नए निगमों को छोड़कर पार्षदों की संख्या--980
भाजपा--304
कांग्रेस--100
निर्दल--558 (सपा और बसपा समर्थित )
अन्य--18
कुल नगर पालिका परिषद--202
जहां पिछली बार अध्यक्ष का चुनाव हुआ--194
भाजपा--42
कांग्रेस--15
निर्दल--130 (सपा और बसपा समर्थित)
अन्य--07
कुल नगर पंचायतें--438
जहां पिछली बार अध्यक्ष का चुनाव हुआ--423
भाजपा--36
कांग्रेस--21
निर्दल--352 (सपा और बसपा समर्थित)
अन्य--14
ये बोले पदाधिकारी
सपा ने चुनाव चिन्ह पर निकाय चुनाव लड़ने का फैसला किया है। जिलों में आवेदन लिए जा रहे हैं। आवेदनों की छंटनी और पूरी पड़ताल करके नामों का पैनल बनेगा और पार्टी मुख्यालय को भेजा जाएगा। फिर पार्टी उम्मीदवारों के नामों का फैसला करेगी।
- राजेन्द्र चौधरी, मुख्य प्रवक्ता सपा
भाजपा भी तैयारियों में जुटी
भाजपा वैसे भी निकाय चुनाव को पूरी गंभीरता से और पार्टी के आधार पर लड़ती रही है। इस बार भी हम पूरी शिद्दत से तैयारियों में जुटे हैं। प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में भी निकाय चुनाव को लेकर चर्चा होगी। साथ ही इस सिलसिले में रणनीति को अंतिम रूप दिया जाएगा।
-विजय बहादुर पाठक, प्रदेश महामंत्री भाजपा