यूपी: भाजपा को रोकने के लिए यू टर्न ले सकते हैं मुलायम, महागठबंधन संभव
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विधानसभा चुनाव में किसी भी दल से गठबंधन करने से इन्कार कर चुके सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव इस मुद्दे पर यू टर्न ले सकते हैं। गैर भाजपा वोटों का बिखराव रोकने के लिए वह कांग्रेस से गठबंधन की पहल कर सकते हैं।
मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जिस तरह गठबंधन की पैरवी की है, उससे सपा और कांग्रेस में दोस्ती के कयास लगाए जाने लगे हैं। सपा की स्थापना के रजत जयंती समारोह में मुलायम की पहल पर कई दलों के नेता जुटे थे। सपा मुखिया की इन नेताओं के साथ लखनऊ और दिल्ली में बातचीत भी हुई।
उन्होंने सपा के प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव को समान सोच वाले दलों के नेताओं से बातचीत के लिए आगे किया था। कयास लगाए जाने लगे थे कि चौधरी चरण सिंह और डॉ. लोहिया के अनुयायी भाजपा को हराने के लिए बिहार की तर्ज पर महागठबंधन बना सकते हैं। इसमें कांग्रेस भी शामिल हो सकती है, लेकिन रजत जयंती समारोह के चार दिन बाद ही मुलायम ने गठबंधन की मुहिम की हवा निकाल दी।
10 नवंबर को मीडियाकर्मियों से बातचीत में उन्होंने कहा कि 2017 के विधानसभा चुनाव के लिए सपा किसी दल से गठबंधन नहीं करेगी। कोई दल सपा में विलय करना चाहे तो उस पर विचार किया जाएगा। सपा मुखिया के इस रुख पर उनके दल के नेता भी हैरान हुए थे। उनके रुख में एकाएक आए बदलाव की वजह कोई नहीं जान सका।
2012 व 2014 का रिकॉर्ड देखते हुए हैं जरूरी
राजनीति के जानकार मानते हैं कि यदि सपा 2017 में दोबारा सत्ता में वापसी चाहती है तो उसे सेकुलर मतों का बंटवारा रोकना होगा। इसके लिए सेकुलर दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ना होगा।
बिहार का उदाहरण उसके लिए नजीर हो सकता है जहां भाजपा को हराने के लिए तमाम मतभेद भुलाकर लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार एक साथ आए। लोकसभा चुनाव में जिस तरह भाजपा ने चुनावी बढ़त बनाई और सपा-बसपा की दुर्गति हुई, उससे भी ये दल चौकन्ने हैं।
2014 के लोकसभा चुनाव में सपा को 22.6 प्रतिशत, बसपा को 19.95 प्रतिशत और भाजपा को 42.3 प्रतिशत मत मिले थे। यानी सपा और बसपा को अलग-अलग जितने वोट मिले, भाजपा को अकेले ही उतने वोट मिले। भाजपा उसी प्रदर्शन को दोहराना चाहती है।
हालांकि 2012 के विधानसभा चुनाव में स्थिति अलग थी। तब सपा को 29.10 फीसदी, बसपा को 25.91, भाजपा को 15.17 और कांग्रेस को 11.65 प्रतिशत वोट मिले थे। यदि सपा के वोटों में कांग्रेस के मत जोड़ दिए जाएं तो तस्वीर काफी बदल जाती है। शायद इसी को ध्यान में रखकर मुलायम भाजपा विरोधी दलों का बिखराव रोकने की कोशिश करेंगे।
अखिलेश और शिवपाल हैं पक्ष में
हालांकि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपने दम पर अकेले चुनाव लड़कर जीतने का दावा कर रहे हैं लेकिन उन्होंने कांग्रेस से गठबंधन का विकल्प खुला रखा है।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस से गठबंधन हुआ तो विधानसभा की 300 से ज्यादा सीटें जीतेंगे। शिवपाल पहले से ही गठबंधन के पक्ष में हैं। बिहार चुनाव से पहले महागठबंधन बनाने में भी उनकी भूमिका थी। हालांकि सपा इससे अलग हो गई थी।
रामगोपाल यादव गठबंधन की राजनीति के पक्षधर नहीं हैं। उनके कारण ही बिहार में महागठबंधन टूटा था। लगता है यूपी की सत्ता में वापसी के लिए वह भी अपने रुख से पीछे हटेंगे।
यूपी में सत्ता से बाहर होने पर राष्ट्रीय राजनीति में सीमित होगी सपा
मुलायम सियासत के मंझे हुए खिलाड़ी हैं। उनका लंबा अनुभव है। वह चुनावी माहौल को भांपने के महारथी हैं। पार्टी दफ्तर में कार्यकर्ताओं की मीटिंग में वह भाजपा की चुनावी तैयारियों का जिक्र कर चुके हैं।
यह भी कह चुके हैं कि भाजपा सत्ता में आई तो हटाना आसान नहीं होगा। यूं भी सपा, यूपी में सत्ता से बाहर होगी तो राष्ट्रीय राजनीति में उसकी भूमिका सीमित हो जाएगी।
मुलायम कांग्रेस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर, रालोद अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह, जद यू नेता शरद यादव आदि से गठबंधन के संबंध में बातचीत कर चुके हैं। उनकी चिंता भाजपा को रोकने की है।