यूपी में 2017 के पहले ही इन चुनाव में सियासी संग्राम
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विधान परिषद की स्थानीय प्राधिकारी कोटे की 36 सीटों के चुनाव नतीजे सियासी दलों की साख के लिए सवाल बन गए हैं। वैसे तो आमतौर पर इनके नतीजे सत्तारूढ़ दल के अनुकूल रहते हैं।
बावजूद इसके इस चुनाव के दौरान जिलों में बनने व बिगड़ने वाले समीकरणों से सियासी दलों की पकड़ का संकेत जरूर मिल जाता है। फिर इस बार स्थिति भी बदली हुई है। इसलिए सभी की कोशिश होगी कि इन चुनाव के सहारे वे सूबे में अपनी मजबूती का संदेश देने में पीछे न रहें।
पिछली बार जनवरी 2010 में जब इन सीटों के चुनाव हुए थे तब प्रदेश विधानसभा चुनाव में लगभग दो साल का वक्त बचा था। इस बार इन सीटों के चुनाव और विधानसभा चुनाव के बीच एक साल का ही वक्त बचा है।
राजनीतिक समीक्षकों का मानना है कि मतदाताओं की संख्या कम होने के कारण भले ही सत्तापक्ष की तरफ से जोर-जबरदस्ती से मतदान को प्रभावित करने की कोशिश की जाए। बावजूद इसके इस चुनाव के दौरान उभरने वाले सियासी समीकरणों के संकेतों पर आसानी से परदा नहीं डाला जा सकेगा।
इसलिए भी जोर लगाना चाहते हैं सभी दल
ये चुनाव केंद्रीय चुनाव आयोग की देखरेख में होते हैं। केंद्र में इस बार भाजपा नेतृत्व वाली सरकार है। लगभग एक दशक बाद पहली बार सूबे में पक्ष व विपक्ष के दो प्रमुख दल सपा और बसपा के साथ केंद्र सरकार का नेतृत्व करने वाली भाजपा से कोई गठबंधन नहीं है।
माना जाता है कि इसका असर भी इन चुनाव पर कहीं न कहीं जरूर दिखेगा। कारण, भाजपा कभी नहीं चाहेगी कि इन चुनाव के नतीजों से कहीं उसकी पकड़ कमजोर होने का संदेश जाए।
हवा का पता चलेगा
लोकसभा चुनाव के बाद यह पहला ऐसा चुनाव है जिसमें चुनाव चिह्न न होते हुए भी राजनीतिक दलों के आधार पर नतीजे घोषित होते हैं। इसलिए भाजपा, सपा और बसपा सभी कोशिश करेंगे कि चुनाव में उनके पस्त होने का संदेश न जाए।
इसलिए भी सभी दल इस चुनाव में अपने उम्मीदवारों को पूरी ताकत से जिताने की कोशिश करेंगे। समीक्षकों के मुताबिक, नतीजों का पलड़ा सत्तारूढ़ दल के पक्ष में ही झुका हो सकता है, लेकिन इनके परिणाम 2017 की हवा का कुछ न कुछ हवाला जरूर दे जाएंगे।