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रामपाल मामला: सत्ता के साथ खून भी माफ, आंखे दिखाई तो गिरी गाज

Fri, 29 Apr 2016 11:11 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Fri, 29 Apr 2016 11:11 PM IST
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 Message behind Rampal Yadav case.
विधायक रामपाल यादव - फोटो : amar ujala

सत्ता के साथ रहो तो सात खून भी माफ और आंख तरेरते ही गाज। बिसवां (सीतापुर) के विधायक रामपाल यादव के मामले में ऐसा ही हुआ। उनके खिलाफ कार्रवाई के सियासी मायने निकाले जा रहे हैं। सपा के प्रदेश अध्यक्ष व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पहली बार सख्ती के मूड में हैं।

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राजधानी में रामपाल के कॉम्प्लेक्स और सीतापुर में उनके बेटे के साझेदारी वाले होटल पर बुलडोजर चलवाकर सीएम ने दूसरे विधायकों व नेताओं को भी संदेश दे दिया है।
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रामपाल वर्ष 2012 में सपा के टिकट पर बिसवां से दूसरी बार विधायक चुने गए थे। इससे पहले वे 2002 में जीते थे। पंचायत चुनाव के दौरान वे तब समय चर्चा में आए, जब उन्होंने पार्टी से बगावत करके अपने बेटे जितेंद्र यादव को जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव लड़ाया। इस पर उन्हें इसी साल 4 जनवरी को सपा से निलंबित कर दिया गया था। उनके बेटे के खिलाफ निष्कासन की कार्रवाई हुई थी।
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बागी तेवरों के चलते उनके प्रतिष्ठानों पर उस समय भी शासन की नजर तिरछी हुई थी। सपा के अधिकृत प्रत्याशी के खिलाफ बगावत के बावजूद जितेंद्र जिला पंचायत अध्यक्ष निर्वाचित हुए और बेटी भी अधिकृत प्रत्याशी के खिलाफ चुनाव लड़कर ब्लॉक प्रमुख चुन ली गई।

निलंबन हुआ समाप्त पर नहीं दूर हुई सीएम की नाराजगी

 Message behind Rampal Yadav case.

हालांकि स्थानीय प्राधिकारी क्षेत्र से विधान परिषद के चुनाव को देखते हुए उनका निलंबन समाप्त कर दिया गया था। इस सीट से मुख्यमंत्री के करीबी समझे जाने वाले आनंद भदौरिया प्रत्याशी बनाए गए थे। पार्टी में वापसी के बावजूद रामपाल की कारगुजारियों के चलते अखिलेश यादव की नाराजगी उनसे दूर नहीं हुई थी।

बसपा-भाजपा से नजदीकियों की चर्चा पड़ी भारी
पंचायत चुनाव में सपा से बगावत के बाद से रामपाल की बसपा और भाजपा नेताओं से नजदीकियों की चर्चा उन पर भारी पड़ीं। जब तक सपा में उनकी निष्ठा पर सवाल नहीं उठे, उनकी दबंगई और अवैध निर्माण की तरफ सरकार ने झांका तक नहीं। सीतापुर के प्रशासनिक अधिकारियों में उनकी हनक रहती थी।

उनकी दबंगई  के आगे पुलिस के हाथ बंधे रहते थे। सपा सरकार में उनके अवैध निर्माण खूब फले-फूले। कॉम्प्लेक्स खड़ा हो गया, होटल चलने लगा।

जैसे ही यह संकेत मिले कि 2017 के चुनाव से पहले रामपाल पाला बदल सकते हैं, उन पर शिकंजा कस दिया गया। उनका कॉम्प्लेक्स व होटल जमींदोज कर दिए गए। गंभीर धाराओं में केस दर्ज हो गए और रामपाल समेत नौ लोग जेल पहुंचा दिए गए।

शक्ति संतुलन के खेल पर भी लग रहे हैं कयास

 Message behind Rampal Yadav case.

रामपाल के कॉम्प्लेक्स व होटल को जमींदोज करना, उन्हें पार्टी से बाहर करना कहीं सपा के शक्ति संतुलन का खेल तो नहीं है ? सपा के कुछ नेताओं में इसे लेकर चर्चा गर्म रही। इस कार्रवाई के जरिये यह संदेश भी हो सकता है कि निष्ठा इधर-उधर हुई तो हाल रामपाल जैसा हो सकता है।

दरअसल सपा में कई देहरी हो गई हैं। कुछ नेता यह नहीं तय कर पा रहे हैं कि वे कहां मत्था टेकें। शक्ति संतुलन के केंद्र में बैठे लोगों के प्रति खुलकर निष्ठा जताना भी जोखिम भरा लगने लगा है।

पहली बार सख्त मूड में अखिलेश
रामपाल और उनके प्रतिष्ठानों पर जिस तरह कार्रवाई की गई है उससे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पहली बार सख्त मूड में दिख रहे हैं। मुख्यमंत्री को आमतौर पर उदार नेता के रूप में देखा जाता है। वे पार्टी नेताओं, विधायकों और मंत्रियों की कमियों को नजरअंदाज करते हैं।

उन्हें लोगों के बारे में फीडबैक मिलता है, लेकिन वे सख्त कार्रवाई से बचते रहे हैं। अफसरों तक के प्रति उनका नरम रुख रहा है। रामपाल पहले विधायक हैं, जिनके खिलाफ प्रशासनिक और पार्टी स्तर पर इतनी सख्त कार्रवाई हुई है।

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