मायावती ने राष्ट्रीय राजनीति में वापसी के लिए बिछाई बिसात, सियासी छलांग लगाने को बुना ताना-बाना
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पैंतीस वर्षों की राजनीतिक यात्रा में सबसे बुरे दौर से गुजर रही बसपा सुप्रीमो मायावती लंबी सियासी छलांग लगाने का ताना-बाना बुनने में जुटीं हैं। उनके बयान, फैसले और गतिविधियां यह बताने के लिए काफी हैं कि उन्होंने मोदी विरोध के नाम पर एक-दूसरे से हाथ मिलाने को विवश विपक्ष की मजबूरी का पूरा सियासी लाभ उठाने की तैयारी कर ली है।
गोरखपुर और फूलपुर के बाद कर्नाटक और कैराना के नतीजों से रणनीति कामयाब रहने का संदेश जाने से उत्साहित मायावती जानती हैं कि विपक्ष अब उनकी बात सुनने को ही नहीं, बल्कि मानने को भी मजबूर है। इसीलिए उन्होंने बहुत ही सधे अंदाज मे ‘सम्मानजनक सीटें मिलने पर ही गठबंधन में शामिल होऊंगी’ बयान दिया है।
वैसे यह सवाल दीगर है कि वे इसमें कितना कामयाब होंगी और विपक्षी गठबंधन का भविष्य क्या होगा? लेकिन इस समय जैसा दिख रहा है उससे यह साफ है कि मोदी विरोध के सहारे मायावती ने न सिर्फ यूपी में मुख्यधारा में वापसी की, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में पैर फैलाने का खाका भी खींच डाला।
राजनीतिक समीक्षकों के मुताबिक मायावती वक्त की नजाकत खूब समझती हैं और उसके हिसाब से वे अपनी भूमिका तय करने में माहिर हैं। उन्हें यह अंदाज हो गया है कि इस वक्त विपक्षी दल उनके दबाव में हैं। वे यह संदेश देने में कामयाब रही हैं कि दलितों के वोट के ज्यादातर हिस्से को वह किसी के पक्ष या विपक्ष में मोड़ने की ताकत रखती हैं। कम से कम उत्तरी राज्यों में एक वह ही हैं जो भाजपा की दलित वोटों में लामबंदी रोक सकती हैं और भाजपा के समीकरणों को गड़बड़ा सकती हैं।
वह यह भी समझ चुकी हैं कि यही समय है कि वह भाजपा के विरोध में लामबंद विपक्षी दलों को भी दबाव में लें। इसका उदाहरण कर्नाटक में मिला। जहां भले ही उनका एक विधायक जीता, लेकिन उन्होंने यह कहते हुए ‘कांग्रेस अगर साथ लड़ी होती तो और बेहतर परिणाम आते’ एक तरह से विपक्ष को यह समझाने की कोशिश की कि उनके (बसपा) बिना कोई भी अकेले भाजपा से मुकाबला नहीं कर सकता।
सपा-कांग्रेस ही नहीं रालोद तक बसपा से हाथ मिलाने को तैयार
सही वक्त पर सही चोट करने में माहिर मायावती के कर्नाटक के बयान का ही असर है कि सपा और कांग्रेस ही नहीं रालोद तक यूपी में बसपा से हाथ मिलाकर चुनाव लड़ने की तैयारी में जुटे हैं। कांग्रेस ने तो मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में होने वाले विधानसभा चुनाव में बसपा से गठबंधन की संभावनाओं का खाका खींचने के लिए प्रभारियों को भी नियुक्ति कर दिया है।
राजनीति शास्त्री डॉ. एसके द्विवेदी कहते हैं कि मायावती सौदेबाजी की सियासत में माहिर हैं। इसीलिए उन्होंने सम्मानजनक सीटों की बात कही है। उन्हें पता है कि भाजपा विरोधी दल यह मान चुके हैं कि उनमें से कोई भी अकेले मोदी का मुकाबला नहीं कर सकता। मुकाबले के लिए दलितों का समर्थन जरूरी होगा। इसीलिए मायावती गरम लोहे पर हथौड़ा की कहावत को सही साबित करते हुए सम्माजनक सीटों की बात कर रही हैं।
इस बहाने वे न सिर्फ यूपी में गठबंधन में बड़ा हिस्सा अपने पास रखना चाहती हैं, बल्कि अन्य राज्यों में भी बड़ी हिस्सेदारी हासिल करना चाहती हैं। मायावती की शायद यही कोशिश है कि दूसरे दलों को सियासी फायदा हो न हो, लेकिन उन्हें अलग-अलग राज्यों में दलित वोट मिलने के साथ कुछ वोट और मिल गए तो लोकसभा चुनाव में उनका कद इतना बढ़ जाएगा कि समीकरण दुरुस्त होने पर वे प्रधानमंत्री पद की सशक्त दावेदार भी हो जाएं।
जरूरत पूरी करने की जुगत
राष्ट्रीय राजनीतिक दल होने के बावजूद बसपा का अभी तक मुख्य आधार यूपी ही है। लेकिन लोकसभा और विधानसभा चुनावों में उसे यूपी में भी बड़ा झटका लगा है। वर्ष 1993 के बाद पहली बार प्रदेश में बसपा के 20 से भी कम विधायक हैं। दो दशक में पहली बार ऐसा है कि लोकसभा में पार्टी का एक भी सांसद नहीं है। इसलिए माया भी 2019 में 2014 जैसी स्थिति यूपी में नहीं बनने देना चाहती हैं। गठबंधन की जरूरत उन्हें भी है। लेकिन वे इसके लिए मजबूर भी नहीं दिखना चाहती। संयोग से समीकरण भी उनके पक्ष में बन गए हैं।
कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी अपने वजूद के लिए संघर्ष कर रही है। सपा भी स्वीकार रही है कि वह भी अकेले कुछ नहीं कर सकती। बसपा के लिए अपने पुनरुत्थान और विस्तार के लिए इससे अच्छा मौका नहीं हो सकता था। मायावती उसी दिशा में आगे बढ़ रही हैं।
उनका प्रयास कितना सफल होगा, यह तो आगे पता चलेगा, लेकिन मौजूदा समय जिस तरह कांग्रेस और अन्य दल अलग-अलग राज्यों में बसपा को तवज्जो देने के मूड में दिख रहे हैं, उससे माया की रणनीति सफल भी होती दिख रही है।