17वां विजय दिवस: बीमार पत्नी को छोड़ पहुंचे थे युद्धभूमि, सरकार नहीं मानती शहीद
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गाहे-बगाहे पाकिस्तान की यात्रा पर चले जाते हैं। दोस्ती का हाथ बढ़ाते हैं। पर, जैसे ही हिन्दुस्तान की ओर पीठ करते हैं, पाकिस्तान का षड्यंत्र शुरू हो जाता है। एक ओर हमारे बेटे सरहदों की रक्षा के लिए अपने खून का कतरा-कतरा बहा रहे हैं तो दूसरी ओर इन मसलों पर राजनीतिक रोटियां सेंकी जाती हैं। अब और नहीं बर्दाश्त होगा।
यह सही वक्त है कि सरकार को इच्छाशक्ति दिखाते हुए देश के अंदर व बाहर छिपे दुश्मनों को खत्म कर देना चाहिए। पाकिस्तान से जबरदस्ती की दोस्ती छोड़ आरपार की लड़ाई का वक्त आ गया है। यह आक्रोश कैप्टन मनोज पांडेय के पिता गोपीचंद पांडेय का है। जिनकी आंखें कारगिल युद्घ के बारे में सोचकर नम हो जाती हैं, जिसमें उनका बेटा शहीद हो गया था।
मंगलवार को कारगिल विजय दिवस की 17वीं वर्षगांठ है। पूर्व संध्या पर विशालखंड निवासी गोपीचंद पांडेय ने नाराजगी जताते हुए कहा कि जिन मांओं की गोदें सूनी हुई हैं, जिनके माथे का सिंदूर मिटा और जिन बहनों की राखियां रखी गई हैं, उनसे जाकर पूछिए दर्द।
पाकिस्तान, जब 60 सालों में नहीं सुधरा तो अब क्या सुधरेगा, इसलिए जरूरत है राजनीतिक इच्छाशक्ति की। ताकि पाकिस्तान के साथ चल रही जबरदस्ती की दोस्ती खत्म की जा सके। वहीं दूसरी ओर तोपखाना बाजार निवासी राइफलमैन सुनील जंग की मां बीना महत भी सरकारी तंत्र से नाराज हैं।
सरकारी उपेक्षा बर्दाश्त, पर देशद्रोह नहीं
लांसनायक केवलानंद की पत्नी कमला द्विवेदी विजय दिवस पर मायूस हैं। वह बीमार थीं, जब केवलानंद उन्हें बिस्तर पर छोड़कर कारगिल युद्घ में शामिल होने केलिए चले गए थे। कमला कहती हैं कि यह उपेक्षा ही है कि उन्हें शहीद माना ही नहीं गया।
खैर, मैं और मेरे बच्चे इसे बर्दाश्त कर रहे हैं। पर, देश के खिलाफ जहर उगलने वालों पर रहम बर्दाश्त नहीं। फिर वह चाहे जेएनयू में दिखाया गया हो या फिर कश्मीर में। केंद्र व राज्य सरकारों दोनों से इल्तिजा है कि गर शहादत को सही सम्मान देना है तो देशद्रोहियों पर कार्रवाई करें।
...दुश्मनी दिल से निभाने की जरूरत
मेजर रितेश शर्मा के पिता लेफ्टिनेंट जनरल जीएस मिश्र मानते हैं कि पाकिस्तान से दोस्ती सपने में भी सफल नहीं होगी। यह सब जानते हैं कि कश्मीर की अस्थिरता केपीछे पाकिस्तान का हाथ है, फिर भी दो टूक एक्शन लेने से सरकारें कतराती हैं।
हां, शहीदों की शहादत पर बड़ी-बड़ी बातें करना इन्हें खूब आता है। जरूरत है कि दुश्मनी दिल से निभाई जाय। पाकिस्तान को ऐसा सबक सिखाया जाए, जिससे वह हमारी ओर आंख उठाने की हिम्मत न कर सके।
'खुकरी के बूते दुश्मनों को चटाई धूल'
कैप्टन मनोज पांडेय को कारगिल युद्ध का मुख्य नायक कहना गलत नहीं होगा। 4 मई, 1999 को उन्हें कारगिल में भारतीय चौकियों को खाली करवाने की जिम्मेदारी सौंपी गई। वह पांच नंबर प्लाटून का नेतृत्व कर रहे थे।
कैप्टन पांडेय बटालिक सेक्टर में दुश्मनों पर जीत हासिल करते हुए आगे बढ़ रहे थे। उन्हें खालूबार तक हर पोस्ट को जीतने के ऑर्डर थे। उन्होंने दुश्मनों के चार बंकरों को नेस्तनाबूद कर दिया। दुश्मनों से घिरने के बाद वे खुकरी से उनका मुकाबला करते रहे और उन्हें धूल चटाई लेकिन अन्त में दुश्मन की गोली का शिकार हो गए।
कैप्टन मनोज पांडेय लखनऊ के इकलौते सैन्याधिकारी रहे, जिन्हें परमवीर चक्र से नवाजा गया। उत्तर प्रदेश सैनिक स्कूल से पढ़ाई पूरी करने के बाद कैप्टन मनोज राष्ट्रीय रक्षा अकादमी गए, जहां से 1997 में गोरखा राइफल्स में कमीशंड हुए।
कैप्टन मनोज पांडेय के पिता गोपीचंद पांडेय बताते हैं कि बेटे की शहादत पर कैप्टन मनोज पांडेय चौराहा बनाया गया है, जहां कार्यक्रम कराने पर जाम लग जाता है, इसलिए सरकार ऐसी व्यवस्था कर दे, जहां आसानी से प्रोग्राम कराए जा सकें।
‘मंच पर कहे शब्दों का अंतिम सांस तक किया पालन’
-राइफलमैन सुनील जंग
रेजीमेंट: 11 गोरखा राइफल्स
शहादत: 15 मई, 1999
...1995 में महज 16 साल की उम्र में गोरखा राइफल्स में भर्ती होने वाले राइफलमैन सुनील जंग लखनऊ के पहले शहीद थे, जिन्होंने कारगिल में दुश्मनों की ईंट से ईंट बजाई थी। कारगिल युद्ध छिड़ने पर 10 मई, 1999 को उन्हें कारगिल पहुंचने के आदेश मिले। वह एक टुकड़ी के साथ आगे बढ़ रहे थे।
उन्हें केवल यह पता था कि चार से पांच सौ घुसपैठिए देश की सीमा में घुस आए हैं। तीन दिन तक भीषण गोलाबारी के बीच 15 मई को दुश्मन की एक नापाक गोली उनके सिर को चीरती हुई निकल गई। देशभक्ति उन्हें विरासत में मिली थी। उनके दादा मेजर नकुल जंग व पिता नर नारायण जंग भी सेना को सेवाएं दे चुके थे।
जब वह आठ साल के थे और स्कूल के एक फैंसी ड्रेस प्रोग्राम में पार्टीसिपेट कर रहे थे, तब उन्होंने मंच से एलान किया कि देश की रक्षा के लिए वह अपने लहू का एक-एक कतरा बहा देंगे और मौका पड़ने पर उन्होंने अपने शब्दों का अक्षरश: पालन भी किया।
राइफलमैन सुनील जंग की मां बीना इस बात से व्यथित हैं कि बेटे को मरणोपरांत शौर्य चक्र नहीं मिला। वह लगातार केंद्र सरकार से गुहार भी लगा रही हैं। मां चाहती है कि सुनील की बहन सुनीता को सरकारी नौकरी मिल जाए।
शहीद की पत्नी को आज भी है कोफ्त...
लांसनायक केवलानंद द्विवेदी
रेजीमेंट: कुमाऊं
शहादत: 6 जून, 1999 कारगिल सेक्टर
इसे दुर्भाग्य नहीं तो और क्या कहेंगे। शहीद लांसनायक केवलानंद द्विवेदी बीमार पत्नी कमला को छोड़कर कारगिल में युद्ध के लिए कूच कर गए थे। दुश्मनों के छक्के छुड़ाते समय वीरगति को प्राप्त हुए। बावजूद इसके सेना उन्हें शहीद नहीं मानती। राज्य सरकार की ओर से भी सुविधाएं उनकी पत्नी को नहीं मिलतीं।
दरअसल, लांसनायक पत्नी की बीमारी पर दो साल बाद घर लौट थे। वह जी-जान से उनकी सेवा में लगे थे कि इसी दौरान युद्ध के लिए बुलावा आ गया। पत्नी से जल्द विजय हासिल कर लौटने की बात कहकर वे चले गए। जब कारगिल में वह दुश्मनों के दांत खट्टे कर रहे थे कि तभी ऊंचाई पर बैठे दुश्मनों की एक गोली उनके सीने में धंस गई। अंतिम सांस तक उन्होंने दुश्मनों का सामना किया और शहीद हो गए।
शहीद की पत्नी कमला बताती हैं कि पति ने देश पर जान न्यौछावर कर दी। लेकिन सरकारों ने हमारे साथ नाइंसाफी की। न तो उन्हें शहीद का दर्जा दिया गया और न ही सरकारी सुख-सुविधाएं। सरकारी नौकरी, पेट्रोल पम्प व पेंशन का वादा किया गया था। जैसे-तैसे परिवार का खर्च चलाया और बेटों तीरथराज व हेमचंद को पढ़ाया। सरकार ने भले ही हमारी उपेक्षा की हो, पर मेरा ख्वाब अपने बच्चों को सेना में ही भेजने का है।
‘रेजीमेंट के बुलाने से पहले ही पहुंच गए कारगिल’
-मेजर रीतेश शर्मा
रेजीमेंट: 17 जाट रेजीमेंट
शहादत: 6 अक्टूबर, 1999
मेजर रीतेश शर्मा उन जांबाज सिपाहियों में शमिल हैं, जिन्होंने कारगिल में विजय के बाद साथी जवानों की वीरता की कहानियां लोगों को सुनाईं। लामार्टीनियर कॉलेज के छात्र रहे मेजर रीतेश शर्मा 9 दिसम्बर, 1995 को सेना में भर्ती हुए।
ड्यूटी के दौरान वह मई, 1999 में 15 दिनों की छुट्टी लेकर लखनऊ अपने घर आए थे। इसी दौरान कारगिल युद्ध की सूचना मिली। इससे पहले कि रेजीमेंट उन्हें बुलाती, वह बगैर बुलाए ही ड्यूटी पर पहुंच गए।
चूंकि, जाट रेजीमेंट पहले ही कारगिल की ओर कूच कर चुकी थी, इसलिए मेजर रीतेश ने यूनिट के साथ दुश्मनों से मोर्चा लेते हुए चोटी पर तिरंगा फहरा दिया था। दो और चोटियों पर भी फतह हासिल की। पर, मश्कोह घाटी जीतते हुए वह घायल हो गए। उन्हें बेस कैम्प में लाया गया और कमान कैप्टन अनुज नैयर को सौंप दी गई, जो कारगिल में शहीद हो गए।
मश्कोह घाटी में तिरंगा फहराने के कारण ही 17 जाट रेजीमेंट को मश्कोह सेवियर का खिताब भी दिया गया। हालांकि कारगिल के बाद 25 सितम्बर, 1999 को कुपवाड़ा में आतंकी ऑपरेशन के दौरान मेजर शर्मा खाई में गिर गए थे, जिसके बाद अस्पताल में इलाज के दौरान उनका निधन हो गया था।
‘लहूलुहान होते हुए भी बिछाते रहे सिग्नलिंग के तार’
-कैप्टन आदित्य मिश्र
रेजीमेंट: सिग्नल कोर
शहादत: जून, 1999
कैप्टन आदित्य मिश्र 8 जून, 1996 को सेना के सिग्नल कोर में सेकंड लेफ्टिनेंट के रूप में भर्ती हुए। सितंबर, 1999 में उन्हें लद्दाख स्काउट में तैनाती मिली। कारगिल युद्ध छिड़ने के बाद वह बटालिक पहुंचे, जहां 17 हजार फीट ऊंची चोटी पर भारतीय पोस्ट को छुड़ाने के लिए उन्होंने दुश्मनों पर हमला कर दिया।
काफी मशक्कत के बाद उन्होंने दुश्मनों का खात्मा कर चोटी पर फतह हासिल कर ली। चूंकि, पोस्ट पर संचार के लिए तार बिछाने बहुत जरूरी थे, इसलिए वह पोस्ट से नीचे उतर आए। पर, जब वह दोबारा पोस्ट पर गए तो वहां दुश्मन काबिज हो चुके थे।
दुश्मनों की गोलीबारी में वह घायल हो गए। पर, उन्होंने हिम्मत दिखाते हुए पोस्ट को दुश्मनों से खाली करवाया और वहां सिग्नलिंग के तार बिछाने के बाद वीरगति को प्राप्त हुए। कैप्टन आदित्य मिश्र के पिता जीएस मिश्र सीनियर आर्मी ऑफीसर हैं।
रुंधे हुए गले से बेटे की शहादत को याद करते हुए कहते हैं कि कैथेड्रल व चिल्ड्रेन अकादमी में पढ़ाई के दौरान से ही उनमें सेना में भर्ती होने का जज्बा पैदा हो गया था। बेटे के खोने का गम नहीं है पर यदि चोटी पाकिस्तानियों के हाथ चली जाती तो उसका मलाल जिंदगी भर रहता।
ये भी हैं जीत के नायक
राष्ट्रीय राइफल रेजीमेंट मेजर विवेक गुप्ता ने भी कारगिल के युद्ध में अपनी वीरता का परिचय दिया था और रणभूमि में वीरगति को प्राप्त हुए थे। उन्होंने 11 जून, 1999 को तोलोलिंग चोटी पर हमलों के दौरान दुश्मनों के कई ठिकानों पर कब्जा कर लिया था।
उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्त्रस् से नवाजा गया था। ऐसे ही कारगिल युद्ध के नायक थे ब्रिगेडियर देवेंद्र सिंह।
उन्होंने कारगिल में सैन्य टुकड़ियों का नेतृत्व किया पर रक्षा मंत्रालय ने उनकी उपलब्धियों को हाशिए पर ही रखा और इसी बीच वह रिटायर भी हो गए।