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Lucknow News: लखनऊ की बड़ी कामयाबी, 99.5 फीसदी लोगों को मिला टीपीटी
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प्रतीकात्मक।
लखनऊ। प्रदेश को टीबी मुक्त बनाने की दिशा में लखनऊ ने बड़ी नजीर पेश की है। टीबी प्रिवेंटिव ट्रीटमेंट (टीपीटी) के तहत संक्रमित मरीजों के संपर्क में आए रिकॉर्ड 99.5 फीसदी लोगों को ढूंढकर उन्हें सुरक्षात्मक दवाएं उपलब्ध कराई गई हैं, ताकि नए मामलों को फैलने से रोका जा सके।
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, पल्मोनरी टीबी के मरीजों के संपर्क में आए 15,423 लोगों की पहचान की गई थी। इनमें से 15,367 पात्र व्यक्तियों को टीपीटी उपलब्ध कराई जा चुकी है। इस सफलता के पीछे विभाग की नियमित मॉनीटरिंग, घर-घर जाकर की गई काउंसिलिंग और आशा व टीबी एचवी कार्यकर्ताओं का अथक प्रयास माना जा रहा है।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. एनबी सिंह ने बताया कि टीबी उन्मूलन का मतलब केवल मरीजों का इलाज नहीं है। संक्रमण की चेन तोड़ने के लिए जोखिम वाले लोगों को समय पर बचाव की दवा देना भी जरूरी है। टीपीटी इसी दिशा में एक कारगर कदम है। यदि पात्र व्यक्ति समय पर जांच कराकर दवा का पूरा कोर्स पूरा करें तो जिले में टीबी के नए मामलों में भारी कमी लाई जा सकती है।
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जिला क्षय रोग अधिकारी डॉ. एके सिंघल ने बताया कि दवा शुरू करने से पहले यह सुनिश्चित किया जाता है कि व्यक्ति को सक्रिय टीबी न हो। इसके बाद पांच वर्ष या उससे अधिक आयु के पात्रों को तीन महीने तक हर सप्ताह एक बार दवा दी जाती है। इससे भविष्य में टीबी होने का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है।
डॉ. सिंघल के अनुसार, टीपीटी अभियान की सबसे बड़ी चुनौती उन लोगों को प्रेरित करना था, जिनमें कोई लक्षण नहीं थे। स्वास्थ्य विभाग की टीम ने परिवार और निकट संपर्क वालों की जांच कर उन्हें काउंसिलिंग के जरिये उपचार के लिए तैयार किया। उन्होंने बताया कि टीपीटी के दुष्प्रभाव बहुत कम होते हैं। यदि किसी को कोई समस्या हो तो वह नजदीकी टीबी यूनिट से संपर्क कर सकता है।
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स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, पल्मोनरी टीबी के मरीजों के संपर्क में आए 15,423 लोगों की पहचान की गई थी। इनमें से 15,367 पात्र व्यक्तियों को टीपीटी उपलब्ध कराई जा चुकी है। इस सफलता के पीछे विभाग की नियमित मॉनीटरिंग, घर-घर जाकर की गई काउंसिलिंग और आशा व टीबी एचवी कार्यकर्ताओं का अथक प्रयास माना जा रहा है।
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मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. एनबी सिंह ने बताया कि टीबी उन्मूलन का मतलब केवल मरीजों का इलाज नहीं है। संक्रमण की चेन तोड़ने के लिए जोखिम वाले लोगों को समय पर बचाव की दवा देना भी जरूरी है। टीपीटी इसी दिशा में एक कारगर कदम है। यदि पात्र व्यक्ति समय पर जांच कराकर दवा का पूरा कोर्स पूरा करें तो जिले में टीबी के नए मामलों में भारी कमी लाई जा सकती है।
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जिला क्षय रोग अधिकारी डॉ. एके सिंघल ने बताया कि दवा शुरू करने से पहले यह सुनिश्चित किया जाता है कि व्यक्ति को सक्रिय टीबी न हो। इसके बाद पांच वर्ष या उससे अधिक आयु के पात्रों को तीन महीने तक हर सप्ताह एक बार दवा दी जाती है। इससे भविष्य में टीबी होने का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है।
डॉ. सिंघल के अनुसार, टीपीटी अभियान की सबसे बड़ी चुनौती उन लोगों को प्रेरित करना था, जिनमें कोई लक्षण नहीं थे। स्वास्थ्य विभाग की टीम ने परिवार और निकट संपर्क वालों की जांच कर उन्हें काउंसिलिंग के जरिये उपचार के लिए तैयार किया। उन्होंने बताया कि टीपीटी के दुष्प्रभाव बहुत कम होते हैं। यदि किसी को कोई समस्या हो तो वह नजदीकी टीबी यूनिट से संपर्क कर सकता है।