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Lucknow News: किडनी की गंभीर बीमारी के इलाज में मिली बड़ी सफलता

Wed, 03 Jun 2026 02:09 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Wed, 03 Jun 2026 02:09 AM IST
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Major breakthrough in the treatment of serious kidney disease
लखनऊ। ल्यूपस नेफ्राइटिस जैसी किडनी की गंभीर बीमारी के इलाज की दिशा में बाबा साहब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू) के वैज्ञानिकों को बड़ी सफलता मिली है। विवि के जैव प्रौद्योगिकी विभाग के डॉ. युसूफ अख्तर, डॉ. रतिका श्रीवास्तव और रसायन विज्ञान विभाग के डॉ. जवाहरलाल जाट को नए दवा यौगिक एफआरपी-024 के लिए भारतीय पेटेंट दिया गया है। यह यौगिक ल्यूपस नेफ्राइटिस के इलाज में प्रभावी साबित हो सकता है।
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शोधकर्ताओं ने अत्याधुनिक कंप्यूटेशनल तकनीक का इस्तेमाल कर 1.55 लाख से अधिक दवा जैसे गुण वाले यौगिकों की जांच की। कई चरणों की स्क्रीनिंग के बाद एफआरपी-024 को सबसे सुरक्षित और प्रभावी चुना गया। वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में इसका सफल संश्लेषण किया और जैविक परीक्षणों से इसकी प्रभावशीलता की पुष्टि की।
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डॉ. युसूफ के अनुसार, यह यौगिक बीएसटी-2 नामक प्रोटीन को लक्षित करता है, जो ल्यूपस नेफ्राइटिस के दौरान किडनी में सूजन कम करने में अहम भूमिका निभाता है। प्रयोगशाला अध्ययनों में एफआरपी-024 ने सूजन से जुड़े संकेतकों को 85 प्रतिशत तक कम किया और कोई विषाक्त प्रभाव भी नहीं दिखाया। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह दवा स्टेरॉयड की जरूरत को भी कम कर सकती है। इस दवा को मरीजों तक पहुंचने से पहले पशु और मानव नैदानिक परीक्षणों से गुजरना होगा। विवि के कुलपति प्रो. राजकुमार मित्तल ने शोध टीम को बधाई दी है।
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ऑटोइम्यून बीमारी होती है ल्यूपस

ल्यूपस ऑटोइम्यून बीमारी होती है। इसमें शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बाहरी कीटाणुओं के बजाय अपने ही स्वस्थ ऊतकों और अंगों पर हमला करने लगती है। यह मुख्य रूप से जोड़ों, त्वचा, गुर्दे, फेफड़ों और मस्तिष्क को प्रभावित करती है। इस बीमारी के लक्षणों में पर्याप्त नींद के बाद भी अत्यधिक कमजोरी महसूस होना, गालों व नाक पर तितली के आकार के लाल चकत्ते पड़ना, जोड़ों में दर्द के साथ सूजन व सुबह के समय अकड़न महसूस होती है। बिना स्पष्ट कारण के बार-बार बुखार आना, बाल झड़ना, मुंह व नाक में छाले होना, अंगुलियों का नीला पड़ना और सांस लेते समय सीने में दर्द जैसे लक्षण नजर आते हैं। यह बीमारी किसी भी उम्र में हो सकती है लेकिन 15 से 45 वर्ष की महिलाओं में सबसे ज्यादा आम है।
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