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लखनऊ: करीब डेढ़ साल के बाद खुलेगा रूमीगेट, मुख्य दरारें भरने का काम पूरा, दिसंबर 2022 से था बंद
Wed, 19 Jul 2023 04:57 PM IST
रोहित मिश्र
अमर उजाला सिटी रिपोर्टर, लखनऊ
अमर उजाला सिटी रिपोर्टर, लखनऊ
Published by: रोहित मिश्र
Updated Wed, 19 Jul 2023 04:57 PM IST
सार
लखनऊ का प्रसिद्ध रूमी गेट मोहर्रम के जुलूस के मौके पर खोला जाएगा। मुख्य इमारत में दरार आ जाने की वजह से इसे पूरी तरह से बंद कर दिया गया था।
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रूमी गेट
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने रूमीगेट की दशकों पुरानी मुख्य दरारों को भरने का काम पूरा कर लिया है, जिसके बाद इसे मोहर्रम के जुलूस के लिए खोला जाएगा। रूमीगेट में आई दरारों की वजह से इसके लिए खतरा पैदा हो गया था। इसके अलंकरण भी टूट कर गिरने लगे थे, जिसके बाद गेट के जीर्णोद्धार का काम शुरू किया गया था।
अधीक्षक पुरातत्वविद आफताब हुसैन ने बताया कि लगभग तीन से चार माह में रूमीगेट की मुख्य दरारें भर दी गई हैं। इसकी जर्जर हालत को देखते हुए ही जीर्णोद्धार का फैसला लिया गया था। सात महीने पहले इस प्रोजेक्ट पर काम शुरू हुआ था। अधीक्षक ने बताया कि जीर्णोद्धार से पहले ही हर छोटी-बड़ी दरार को देखा और उसका जिक्र भी किया गया था ताकि मरम्मत का काम ठीक तरीके से हो सके।
मोहर्रम के जुलूस को देखते हुए शासन के आदेश पर मार्ग खोला जा रहा है, लेकिन मुख्य द्वार को छोड़ कर बाकी का कार्य चालू रहेगा। बाकी के अलंकरण का कार्य आगामी चार से पांच महीने में पूरा होने की उम्मीद है। अभी लगभग 50 फीसदी काम पूरा हुआ है। उन्होंने बताया कि इसकी मरम्मत में चूना सुरखी, उड़द की दाल, बेल गिरी का जूस आदि के विशेष मिश्रण का इस्तेमाल किया जा रहा है। प्लास्टर का यह मिश्रण बेहद टिकाऊ होता है।
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मालूम हो कि दिसंबर 2022 में रूमी गेट के नीचे से निकलने का रास्ता बंद कर दिया गया था। दरारें आने की वजह से ऐसा किया गया था। उधर से निकलने वाले लोगों के लिए बगल से एक रास्ता बना दिया गया था।
बनाने में उस दौर में खर्च हुए थे एक करोड़
रूमी दरवाजा लखनऊ का हस्ताक्षर भवन माना जाता है। जो अपनी खूबसूरत बनावट के लिए हिंदुस्तान में ही नहीं, सारी दुनिया में मशहूर है। नवाब आसफुद्दौला ने सन 1784 में रूमी दरवाजा और इमामबाड़ा बनवाना शुरू कर दिया था। इनका निर्माण कार्य सन 1786 में पूरा हुआ। एक अनुमान है कि इसके निर्माण में उस जमाने में एक करोड़ की लागत आई थी।
गौर करने वाली बात यह है कि रूमी दरवाजा जब बन रहा था उस वक्त अवध में अकाल पड़ा हुआ था। इसलिए भूखों को रोटी देने की उदेश्य से आसफुद्दौला ने इन इमारतों की विस्तृत योजना बनाई थी। ताकि निर्माण के मेहनताना के एवज में उन्हें कुछ पैसे दिए जा सकें।
इमामबाड़े और रूमी दरवाजे का वास्तुशिल्प किफायतउल्ला नाम के एक नक्शा नवीस ने बनाया था। यह वही कारीगर था, जिसने रूमी दरवाजे के चंद्राकार अर्धगुंबद का और इमामबाड़े की लदावतार छत की डाट को बखूबी संभाला था।
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अधीक्षक पुरातत्वविद आफताब हुसैन ने बताया कि लगभग तीन से चार माह में रूमीगेट की मुख्य दरारें भर दी गई हैं। इसकी जर्जर हालत को देखते हुए ही जीर्णोद्धार का फैसला लिया गया था। सात महीने पहले इस प्रोजेक्ट पर काम शुरू हुआ था। अधीक्षक ने बताया कि जीर्णोद्धार से पहले ही हर छोटी-बड़ी दरार को देखा और उसका जिक्र भी किया गया था ताकि मरम्मत का काम ठीक तरीके से हो सके।
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मोहर्रम के जुलूस को देखते हुए शासन के आदेश पर मार्ग खोला जा रहा है, लेकिन मुख्य द्वार को छोड़ कर बाकी का कार्य चालू रहेगा। बाकी के अलंकरण का कार्य आगामी चार से पांच महीने में पूरा होने की उम्मीद है। अभी लगभग 50 फीसदी काम पूरा हुआ है। उन्होंने बताया कि इसकी मरम्मत में चूना सुरखी, उड़द की दाल, बेल गिरी का जूस आदि के विशेष मिश्रण का इस्तेमाल किया जा रहा है। प्लास्टर का यह मिश्रण बेहद टिकाऊ होता है।
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मालूम हो कि दिसंबर 2022 में रूमी गेट के नीचे से निकलने का रास्ता बंद कर दिया गया था। दरारें आने की वजह से ऐसा किया गया था। उधर से निकलने वाले लोगों के लिए बगल से एक रास्ता बना दिया गया था।
बनाने में उस दौर में खर्च हुए थे एक करोड़
रूमी दरवाजा लखनऊ का हस्ताक्षर भवन माना जाता है। जो अपनी खूबसूरत बनावट के लिए हिंदुस्तान में ही नहीं, सारी दुनिया में मशहूर है। नवाब आसफुद्दौला ने सन 1784 में रूमी दरवाजा और इमामबाड़ा बनवाना शुरू कर दिया था। इनका निर्माण कार्य सन 1786 में पूरा हुआ। एक अनुमान है कि इसके निर्माण में उस जमाने में एक करोड़ की लागत आई थी।
गौर करने वाली बात यह है कि रूमी दरवाजा जब बन रहा था उस वक्त अवध में अकाल पड़ा हुआ था। इसलिए भूखों को रोटी देने की उदेश्य से आसफुद्दौला ने इन इमारतों की विस्तृत योजना बनाई थी। ताकि निर्माण के मेहनताना के एवज में उन्हें कुछ पैसे दिए जा सकें।
इमामबाड़े और रूमी दरवाजे का वास्तुशिल्प किफायतउल्ला नाम के एक नक्शा नवीस ने बनाया था। यह वही कारीगर था, जिसने रूमी दरवाजे के चंद्राकार अर्धगुंबद का और इमामबाड़े की लदावतार छत की डाट को बखूबी संभाला था।
कई फिल्मों की हुई शूटिंग
कई हिंदी फिल्मों की शूटिंग यहां पर हुई है।
- फोटो : सोशल मीडिया
बड़ा इमामबाड़ा और रूमी गेट लखनऊ के वह स्थान हैं जहां पर कई फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है। लखनऊ को दिखाने के लिए एक बार इस इमारत को दिखाने का रिवाज रहा है। अमिताभ बच्चन की मुख्य भूमिका वाली फिल्म गुलाबो-सिताबो के बहुत सारे हिस्से इस इमारत के आसपास शूट किए गए हैं।