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UP: गरजने वाले नेताओं के गर्दिश में रहे सितारे... कई को मिल चुका है सबक तो कई कद्दावर कर रहे जद्दोजहद

Thu, 11 Apr 2024 01:06 PM IST
ishwar ashish संजय तिवारी, अमर उजाला, बलरामपुर
संजय तिवारी, अमर उजाला, बलरामपुर Published by: ishwar ashish Updated Thu, 11 Apr 2024 01:06 PM IST
सार

देवीपाटन मंडल की सीटों पर कई नेताओं को सबक मिल चुका है। हाल ये है कि कई तो सियासत की मुख्यधारा से दूर हो गए हैं जबकि कई अब भी ठिकाना खोज रहे हैं।

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Loksabha Election 2024: Know about the seats and its candidates of Devipatan Mandal.
साबित्री बाई फुले व भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह। - फोटो : amar ujala

विस्तार

राजनीति में कब कौन अर्श से फर्श पर आ जाए और कब बुलंदियों को छूने लगे, कुछ कहा नहीं जा सकता। देवीपाटन मंडल की संसदीय सीटों पर ही नजर दौड़ाएं तो कई उदाहरण ऐसे हैं जिनकी सियासत में कभी तूती बोलती रही हैं वो अब गायब हैं या फिर अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए सारी जुगत लगा रहे हैं। इस समय कैसरगंज संसदीय सीट की खासी चर्चा हैं। असल में जिस तरह भाजपा की दसवीं सूची से भी कैसरगंज का नाम लापता है, उससे एक बड़ा संदेश भी सामने आ रहा है।

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कैसरगंज एक ऐसी सीट है जो पूरे मंडल ही नहीं, सूबे की चर्चित सीटों में शामिल हो गई है। हालात कुछ भी हों, लेकिन कद्दावर के टिकट में देरी समझ से परे मानी जा रही है। ऐसे में मंडल की कई सीटें और दावेदार हैं जो सियासत की ऊंचाइयों तक तो पहुंचे, लेकिन अब वह सियासी मैदान से दूर हैं। श्रावस्ती संसदीय सीट से वर्तमान और दो पूर्व सांसद की दशा किसी से छिपी नहीं हैं। बहराइच के भी एक पूर्व सांसद राजनीति में हाशिये पर हैं। गोंडा में एक पूर्व सांसद तो राजनीति के मैदान को छोड़ चुके हैं। वहीं, साल 2009 में संसदीय चुनाव में दम दिखाने वाले ने पाला तो बदला, लेकिन गठबंधन के खेल में पेंच फंस गया है।
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कैसरगंज में बेनी की सपा मुखिया से हुई थी रार

कैसरगंज सीट पहले भी चर्चाओं में रही है। सपा के कद्दावर नेता बेनी प्रसाद वर्मा 1996 से 2004 तक लगातार चार बार सांसद चुने गए। केंद्रीय दूरसंचार मंत्री तक बने। सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के सबसे करीबी होने के बाद भी उनसे ठन गई थी। इस कारण 2009 से पहले ही बेनी प्रसाद वर्मा को पार्टी छोड़कर कांग्रेस का दामन थामना पड़ा। 2009 में कांग्रेस से गोंडा के सांसद चुने गए और केंद्रीय मंत्री बने, लेकिन 2014 में जनता ने उन्हें भी नकार दिया।

बहराइच में विवादों से चर्चा में आईं थीं सावित्री
भाजपा से साल 2014 में सांसद बनीं साबित्री बाई फुले भी ज्यादा दिन पार्टी में टिक नहीं सकीं। बयानों के कारण अक्सर भाजपा हाई कमान के निशाने पर रहीं। 2019 में उन्हें आभास हो गया कि पार्टी से टिकट नहीं मिलेगा। ऐन वक्त पर उन्होंने कांग्रेस का दामन तो थामा लेकिन सियासत में सफल नहीं हो सकीं। अब वह कांग्रेस में तो हैं लेकिन सियासी मैदान से करीब-करीब बाहर हो चुकी हैं।


सबसे चर्चित रही गोंडा संसदीय सीट
देवीपाटन मंडल में गोंडा संसदीय सीट सबसे चर्चित रही है। साल 1971 में चाचा-भतीजे के बीच सियासी मुकाबले से आनंद सिंह चर्चा में आए। 1996 में भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह के केस की खासी चर्चा हुई। उनकी पत्नी केतकी सिंह ने मोर्चा संभाला और जीत कर सदन पहुंचीं। 1998 के चुनाव में फिर भाजपा से बृजभूषण शरण सिंह मैदान में आए अति आत्मविश्वास के भाषणों से चर्चित हुए और चुनाव हार गए। 1999 में वह फिर लड़े और जीते, लेकिन 2004 में पार्टी हाईकमान ने उनका टिकट बदलकर बलरामपुर भेज दिया।

श्रावस्ती की सियासत से बाहर हुए कई पूर्व सांसद
श्रावस्ती संसदीय सीट से कद्दावर नेताओं को पार्टियों के हाईकमान ने निशाने पर लिया। पूर्व सांसद रिजवान जहीर साल 2004 में सपा हाईकमान के निशाने पर आए। इसके बाद मुख्यधारा में वापस नहीं आ सके। 2004 में सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने उनके सामने मोहम्मद उमर को उतार कर झटका दिया। 2009 में बसपा से मैदान में आए और चुनाव नहीं जीत सके। कारण बहराइच की रूवाब सईदा को सपा ने प्रत्याशी बना दिया था।

इस साल कांग्रेस से विनय पांडेय जीते, लेकिन उनकी क्षेत्र में उपलब्धता कम होने से 2014 में हार मिली। इसके बाद यह भी हाशिये पर आ गए और अब सपा में तो हैं लेकिन कोई चर्चा नहीं है। 2019 में बसपा से राम शिरोमणि वर्मा भी पार्टी के निशाने पर आए। 2014 में सांसद बने दद्दन मिश्र भी इस बार पार्टी के विश्वास पर खरे नहीं उतर सके।

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