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लोकायुक्त मामले पर अपने ही जाल में फंस गई यूपी सरकार

Tue, 15 Dec 2015 02:27 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Tue, 15 Dec 2015 02:27 AM IST
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Lokayukta appointment issues creates trouble for UP govt.

प्रदेश के नए लोकायुक्त की नियुक्ति को लेकर राज्य सरकार अपने ही बुने जाल में उलझ गई है। मनमाफिक लोकायुक्त की नियुक्ति के लिए सरकार ने अब तक जो भी दांव चले, वे सभी  उल्टे पड़ गए। अपना लोकायुक्त नियुक्त करने के लिए सरकार ने कानून तक बदल डाला, लेकिन मामला राज्यपाल के यहां अटक गया।

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इसके बाद फिर पुराने कानून के सहारे नियुक्ति की कोशिश की, लेकिन विधानमंडल से पास कराया गया नया कानून आड़े आ गया। हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक फजीहत हो रही है। एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए लोकायुक्त की नियुक्ति के लिए महज दो दिन का वक्त दिया है।
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सुप्रीम कोर्ट के चाबुक से बचने के लिए सरकार की ओर से लोकायुक्त की नियुक्ति के लिए अब तक की गई कार्यवाही का पूरा ब्यौरा तैयार कराया जा रहा है। बुधवार को महाधिवक्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर थोड़ा और वक्त मांगने की तैयारी की जा रही है।
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सपा सरकार ने बढ़ा दिया कार्यकाल
मौजूदा लोकायुक्त जस्टिस एनके मेहरोत्रा का छह वर्ष का कार्यकाल मार्च 2012 में पूरा हो रहा था। सपा की सरकार बनते ही आनन-फानन में लोकायुक्त अधिनियम में संशोधन करके राज्य सरकार ने लोकायुक्त का कार्यकाल छह साल से बढ़ाकर आठ वर्ष कर दिया। साथ ही अधिनियम में यह प्रावधान कर दिया था कि नए लोकायुक्त की नियुक्ति होने तक मौजूदा लोकायुक्त पद पर बने रहेंगे।

जस्टिस मेहरोत्रा का दो वर्ष का अतिरिक्त कार्यकाल भी मार्च 2014 में पूरा हो गया, लेकिन नए लोकायुक्त की नियुक्ति न हो पाने की वजह से वे अभी पद पर बने हुए हैं। हालांकि लोकायुक्त का कार्यकाल बढ़ाने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी गई थी, लेकिन शीर्ष अदालत ने सरकार के फैसले को सही ठहराया।

यूपी सरकार व राज्यपाल के बीच ठन गई

Lokayukta appointment issues creates trouble for UP govt.

इस बीच नए लोकायुक्त की नियुक्ति न होने का मामला फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो शीर्ष अदालत ने सरकार को तत्काल लोकायुक्त की नियुक्ति करने के आदेश दिए। इस साल फरवरी में लोकायुक्त के चयन की प्रक्रिया शुरू जरूर हुई लेकिन कोई नतीजा न निकलने के बाद 23 जुलाई 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को फिर तत्काल लोकायुक्त की नियुक्ति के आदेश दिए।

मामला राजभवन भी पहुंचा और राज्यपाल राम नाईक ने कई बार मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को राजभवन बुलाकर अदालत के आदेशानुसार कार्यवाही करने की सलाह भी दी।

इस बीच सरकार ने हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस रविंद्र सिंह का नाम तय किया लेकिन हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस द्वारा उनके नाम पर आपत्ति जता दिए जाने के बाद मामला फंस गया। राजभवन पर दबाव बनाने के लिए रविंद्र सिंह के नाम पर कैबिनेट से मुहर लगवाई गई।

सरकार और राजभवन के बीच भी टकराव के हालात बन गए। राज्यपाल ने तीन बार रविंद्र सिंह की नियुक्ति की फाइल सरकार को लौटाई और चौथी बार चीफ जस्टिस की आपत्तियों के मद्देनजर राज्यपाल ने भी जस्टिस रविंद्र सिंह के नाम को खारिज करते हुए सरकार को नया नाम तय करके भेजने को कह दिया।

इसी बीच मनमाफिक लोकायुक्त की नियुक्ति का रास्ता साफ करने के लिए सरकार ने अगस्त में विधानमंडल से लोकायुक्त अधिनियम में संशोधन करने संबंधी विधेयक  पास कराकर लोकायुक्त के चयन में चीफ जस्टिस की भूमिका ही समाप्त कर दी। इस विधेयक को राज्यपाल ने अभी मंजूरी नहीं दी है।

पुराने और नए कानून के चक्कर में फंसा पेंच

Lokayukta appointment issues creates trouble for UP govt.

राजभवन से लोकायुक्त संशोधन विधेयक को मंजूरी न मिलने के बाद सरकार ने सितंबर में पुराने कानून के जरिये ही नए लोकायुक्त के चयन की कवायद शुरू की। पहले 17 सितंबर को बैठक रखी गई लेकिन व्यस्तता के चलते चीफ जस्टिस इसमें शामिल नहीं हो सके। बाद में मुख्यमंत्री, नेता प्रतिपक्ष व चीफ जस्टिस की मौजूदगी में 27 सितंबर को चयन समिति की बैठक हुई।

इसमें चीफ जस्टिस ने विधानमंडल से पास कराए गए लोकायुक्त संशोधन विधेयक के लंबित रहते पुराने कानून के जरिये लोकायुक्त के चयन की प्रक्रिया पर सवाल खड़ा कर दिया। इसके  बाद से लोकायुक्त के चयन की प्रक्रिया ठप पड़ी है।

हाल ही राज्यपाल ने फिर दिया था जल्द नियुक्ति का सुझाव

बीते सप्ताह राज्यपाल ने मुख्यमंत्री को राजभवन बुलाकर लोकायुक्त की नियुक्ति के लिए जल्द से जल्द चयन समिति की बैठक बुलाने की सलाह दी थी। राज्यपाल का कहना था कि राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना से बचना चाहिए और उसकी मंशा के अनुसार जल्द से जल्द इस मामले पर फैसला करना चाहिए।

नामों का पैनल तैयार

राज्य सरकार ने नए लोकायुक्त के चयन के लिए नामों का पैनल तो तैयार कर लिया है, पर कानूनी पेंच फंस जाने के कारण चयन प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही है। चीफ जस्टिस व राज्यपाल द्वारा लोकायुक्त के लिए जस्टिस रविंद्र सिंह का नाम खारिज कर दिए जाने के बाद अब लोकायुक्त के लिए जस्टिस वीरेंद्र सिंह यादव, जस्टिस इम्तियाज मुर्तजा, जस्टिस अब्दुल मतीन, जस्टिस जकी उल्ला, जस्टिस संजय मिश्रा व जस्टिस विष्णु सहाय, जस्टिस हेत सिंह यादव के  नामों की चर्चा है। इन सभी के नाम पैनल में शामिल बताए जा रहे हैं।

पहले थी विवाद की वजह

Lokayukta appointment issues creates trouble for UP govt.

-राज्य सरकार ने लोकायुक्त की नियुक्ति के लिए जस्टिस रविंद्र सिंह के नाम का एकमात्र प्रस्ताव भेजा था।

-हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने उनके नाम पर आपत्ति जताई है। चीफ जस्टिस को उनकी नियुक्ति पर इसलिए आपत्ति थी क्योंकि उनके सियासी लोगों के साथ संबंध हैं। वे उनके साथ मंच शेयर करते हैं।

- मुख्यमंत्री ने नेता प्रतिपक्ष और मुख्य न्यायाधीश से समुचित विचार-विमर्श नहीं किया था।

अब फंसा यह पेंच

- चीफ जस्टिस ने पुराने कानून के जरिये चयन प्रक्रिया के औचित्य पर यह कहते हुए सवाल उठाया है कि विधानमंडल से पारित विधेयक राजभवन में विचाराधीन है। ऐसे में क्या पुराने कानून से चयन किया जाना उचित व विधिसम्मत होगा?

मामले पर मुख्य सचिव आलोक रंजन का कहना है कि लोकायुक्त की नियुक्ति के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 16 दिसंबर को सुनवाई की तारीख तय की है। इस मामले में अब तक जो भी कार्यवाही की गई है, उसके सबंध में महाधिवक्ता की ओर से हलफनामा दाखिल करके जानकारी दी जाएगी।

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