लोकसभा चुनाव के नतीजों ने बढ़ाई सीएम योगी की ताकत पर गठबंधन सहित सामने हैं ये छह चुनौतियां
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सपा-बसपा-रालोद गठबंधन के बावजूद भाजपा की प्रचंड जीत से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का आत्मविश्वास जरूर बढ़ेगा। केंद्र में मोदी सरकार की वापसी से योगी सरकार और मजबूती से आगे बढ़ेगी। लेकिन इस नतीजे के साथ ही योगी की चुनौती भी बढ़ गई है।
विश्लेषकों का मानना है कि लोकसभा चुनाव पूरी तरह से पीएम मोदी के नाम और केंद्र सरकार के काम पर लड़ा गया। मोदी ने पूरे चुनाव में बिना किसी प्रत्याशी का नाम लिए अपने नाम पर वोट मांगा। प्रत्याशी और स्थानीय मुद्दे गौड़ रहे।
योगी ने केंद्र की योजनाओं को अच्छी तरह से प्रदेश में लागू कर एनडीए गठबंधन को 64 सीटों की जीत में अहम भूमिका निभाई। एक स्टार प्रचारक के तौर पर भी उनका उल्लेखनीय योगदान रहा। सत्ता में रहते हुए तीन-तीन लोकसभा के उपचुनाव हारने के बाद आम चुनाव में यह जीत उनके आत्मविश्वास में वृद्धि करेगी। पर जीत की लय बरकरार रखना और 2022 के विधानसभा चुनाव में ऐसी ही उपलब्धि हासिल करना किसी चुनौती से कम नहीं होगा।
गठबंधन जारी रहने के आसार, कांग्रेस भी हो सकती है शामिल
भाजपा 2014, 2017 और 2019 में लगातार प्रचंड जीत की हैट्रिक लगा चुकी है। वजह, अपेक्षित सफलता न मिलने के बावजूद सपा-बसपा-रालोद गठबंधन आगे जारी रहने के आसार जताए जा रहे हैं।
ऐसा हुआ तो गठबंधन के पास जमीन पर काम करने के लिए लोस चुनाव की अपेक्षा काफी समय होगा। तब सरकार की चुनौती और बढ़ सकती है। वहीं, भाजपा की चुनौती से निपटने के लिए गठबंधन में कांग्रेस भी शामिल हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। तब भाजपा की चुनौती और भी कठिन हो सकती है। 2022 के विधानसभा चुनाव में योगी को केंद्र व राज्य सरकार के नाम पर वोट मांगना होगा और समय रहते ज्वलंत समस्याओं का समाधान भी करना होगा।
राज्य सरकार की मुख्य चुनौतियां
1. आवारा पशुओं की समस्या
प्रदेश में आवारा पशुओं की समस्या सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। जगह-जगह किसानों को फसल बचाने के लिए घेराबंदी में हजारों रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं और पूरी रात जगकर उसकी रखवाली करनी पड़ रही है। चुनाव में जगह-जगह लोगों ने यह कहकर वोट दिया कि यह चुनाव मोदी का है, इसलिए वोट दे रहे हैं। विधानसभा चुनाव से पहले आवारा पशुओं की समस्या का समाधान नहीं हुआ तो सत्तादल के विधायकों को गांवों में घुसने नहीं दिया जाएगा।
2. स्थानीय समस्याओं का निपटारा
आम तौर एक शिकायत आम रही कि ब्लॉक और तहसील में समस्याओं की सुनवाई नहीं होती है। समस्या के समाधान के लिए बार-बार दौड़ लगानी पड़ती है। अक्सर बिना समाधान किए ही प्रकरण निस्तारित दिखा दिया जाता है। इसके अलावा जिन योजनाओं के लाभ का निर्णय स्थानीय स्तर पर पंचायत सेक्रेटरी या प्रधान करते हैं, उनमें भेदभाव होता है। यही नहीं पात्रता सूची में नाम होने के बावजूद लाभ नहीं दिया जाता।
पुलिस उत्पीड़न पर लगाम
3. पुलिस उत्पीड़न पर लगाम
चुनाव के दौरान लोगों ने बताया कि कानून-व्यवस्था को लेकर वे सड़क पर पहले से कम भय महसूस करते हैं। बेटियों को स्कूल भेजने नहीं जाना पड़ता है। बेटियों का पीछा करने व छेड़छाड़ के मामलों में कमी आई है। लेकिन थाने में पुलिस का बर्ताव पहले की ही तरह उत्पीड़न वाला है। डायल-100 व ट्रैफिक पुलिस निर्द्वंद होकर लोगों का शोषण कर रही है। इसे खत्म करना होगा।
4. अवैध खनन की रोकथाम
सरकार ने अवैध खनन पर रोक की तमाम बातें की। जगह-जगह लोगों ने बताया कि स्थानीय नेता अवैध खनन में लिप्त हैं। उन्हें कोई टोकने नहीं जाता। इसी तरह कई जगह लोगों ने बताया कि एंटी भू-माफिया टास्क फोर्स के जरिए सरकारी संपत्ति पर अवैध कब्जे खाली करने के दावे सिर्फ कागजी हैं। बड़े भूमाफिया और दबंगों के कब्जे पहले की ही तरह हैं। जब सरकार कार्रवाई के दावे करती है तो जनता को कब्जे न हटने से उसमें झूठ नजर आता है।
प्रभावशाली लोगों पर कार्रवाई
5. प्रभावशाली लोगों पर कार्रवाई
लोगों का कहना है कि सरकार चुनाव आता है तभी बड़े लोगों के खिलाफ कार्रवाई करती है। दो साल बीत गए स्मारक से लेकर चीनी मिल बिक्री तक के मामले लंबित हैं, कोई कार्रवाई नहीं हुई। चुनाव आया तो चीनी मिल मामले में सीबीआई जांच की याद आ गई। इसी तरह प्रभावशाली नेताओं के तमाम मामले वर्षों से दबे हैं। उन पर कोई निर्णय नहीं होता। अब देखा जाएगा कि सरकार बड़े लोगों के लंबित मामलों को सियासी सौदे तक ही सीमित रखती है या फिर चुनाव आने पर ही याद करेगी।
6. नौकरी मिलने में लेटलतीफी
युवाओं ने पूरी ताकत से मोदी को वोट किया है। लेकिन बेसिक शिक्षा से लेकर पुलिस व लोकसेवा आयोग की भर्तियों में लेटलतीफी व कोर्ट-कचहरी के चक्कर से उनमें जबरदस्त नाराजगी है। जगह-जगह युवा शिक्षक भर्ती में कट ऑफ के लिए राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। उच्चतर शिक्षा आयोग व माध्यमिक शिक्षा आयोग में कई भर्तियां वर्षों से लंबित हैं। इससे भी युवाओं में नाराजगी है।