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हराने वाला अगर खास हो तो हार ही दुनिया की सबसे बड़ी हो जाती है जीत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Updated Sat, 11 Aug 2018 04:43 PM IST
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डॉ बैधनाथ सिंह
- फोटो : amarujala
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हारना तो बुरा होता है, लेकिन हराने वाला अगर खास हो तो हार भी बड़ी जीत हो जाती है। गांधीजी के साथ अपने बीते पल को याद करते हुए 99 वर्षीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी डॉ. बैजनाथ सिंह की आंखें चमक जाती हैं।
सामने पड़ी अपनी पहली पुस्तक बंदी युग को हाथों में थाम लेते हैं। कहते हैं- मैं विद्यार्थी जीवन में ही स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े क्रांतिकारियों के संपर्क में आ चुका था। वो बताते हैं कि 13 नवंबर 1942 को मुझे जनपद से गिरफ्तार कर लिया गया।
जज ने दो वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई। मुझे जौनपुर जेल भेजा गया, थोड़े दिन बाद फैजाबाद जेल शिफ्ट कर दिया गया। वहां से 11 जुलाई 1943 को लखनऊ कैंप कार्यालय लाया गया था। 20 सितंबर 1943 को अपील करने पर एक साल की सजा माफ होने के बाद रिहा किया गया।
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पीएचडी पूरी करने के आद वो स्वेदश लौट आए। उन्होंने क्रांतिकारियों की योजना के तहत 1944 से 1946 तक आगरा के बलवंत राजपूत कॉलेज के अध्यापन कार्य किया। इस दौरान गोपनीय तरीके से आगरा में वो काम करते रहे। शिक्षक के रूप में वो अक्सर विद्यार्थियों के घर तक चले जाते और प्रशासन के लोग उन पर शक नहीं करते थे
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सामने पड़ी अपनी पहली पुस्तक बंदी युग को हाथों में थाम लेते हैं। कहते हैं- मैं विद्यार्थी जीवन में ही स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े क्रांतिकारियों के संपर्क में आ चुका था। वो बताते हैं कि 13 नवंबर 1942 को मुझे जनपद से गिरफ्तार कर लिया गया।
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जज ने दो वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई। मुझे जौनपुर जेल भेजा गया, थोड़े दिन बाद फैजाबाद जेल शिफ्ट कर दिया गया। वहां से 11 जुलाई 1943 को लखनऊ कैंप कार्यालय लाया गया था। 20 सितंबर 1943 को अपील करने पर एक साल की सजा माफ होने के बाद रिहा किया गया।
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पीएचडी पूरी करने के आद वो स्वेदश लौट आए। उन्होंने क्रांतिकारियों की योजना के तहत 1944 से 1946 तक आगरा के बलवंत राजपूत कॉलेज के अध्यापन कार्य किया। इस दौरान गोपनीय तरीके से आगरा में वो काम करते रहे। शिक्षक के रूप में वो अक्सर विद्यार्थियों के घर तक चले जाते और प्रशासन के लोग उन पर शक नहीं करते थे
सेवाग्राम आश्रम में गांधीजी से मिली दीक्षा :
डॉ बैधनाथ सिंह
- फोटो : amarujala
डॉ. बैजनाथ सिंह ने 1947-48 में उत्तर प्रदेश सरकार के फील्ड पब्लिसिटी इनफॉरमेशन ऑफिसर रहे। 1948-53 तक इटावा पायल प्रोजेक्ट में काम किया। 1953-56 तक प्रदेश के सहायक विकास आयुक्त सामुदायिक विकास और 1956-58 रॉलफेलर फाउंडेशन के फेलो, 1958-59 सहायक विकास आयुक्त (प्रशिक्षण), 1959-62 उपनिदेशक समाज समाज कल्याण योजना आयोग नई दिल्ली रहे। 1962-68 पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और 1968-83 तक यूनेस्को विशेषज्ञ के तौर पर विभिन्न देशों में कार्यरत रहे।
1943 में जेल से छूटने के बाद डॉ. विद्यार्थी वर्धा स्थित गांधीजी के आश्रम सेवाग्राम चले गए। वहां उनको गांधीजी के साथ 12 दिन रहकर रचनात्मक कार्यों की दीक्षा मिली थी। यहां गांधीजी के साथ बिताए पल अक्सर याद आते हैं।
वो भोजन के समय जल्दी खाकर उठ जाते और सेवा कार्यों को अतिरिक्त समय निकाल लेते थे। एक दिन कुष्ठ रोगियों की सेवा करने सबसे पहले पहुंच गए, हम लोग पहुंचे तो उन्होंने हंसते हुए कहा- देखो मैंने आप सबको हरा दिया है। जब मैंने गांधीजी से झंडा वितरण करने की बाम बताई तो उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखकर तारीफ की थी।
1943 में जेल से छूटने के बाद डॉ. विद्यार्थी वर्धा स्थित गांधीजी के आश्रम सेवाग्राम चले गए। वहां उनको गांधीजी के साथ 12 दिन रहकर रचनात्मक कार्यों की दीक्षा मिली थी। यहां गांधीजी के साथ बिताए पल अक्सर याद आते हैं।
वो भोजन के समय जल्दी खाकर उठ जाते और सेवा कार्यों को अतिरिक्त समय निकाल लेते थे। एक दिन कुष्ठ रोगियों की सेवा करने सबसे पहले पहुंच गए, हम लोग पहुंचे तो उन्होंने हंसते हुए कहा- देखो मैंने आप सबको हरा दिया है। जब मैंने गांधीजी से झंडा वितरण करने की बाम बताई तो उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखकर तारीफ की थी।
पढ़ाई में हमेशा रहे अव्वल
डॉ बैधनाथ सिंह
- फोटो : amarujala
जौनपर में शाहगंज के पास मदरहा में जन्मे डॉ. बैजनाथ सिंह विद्यार्थी समाज कार्यों के साथ ही हमेशा पढ़ाई में भी अव्वल रहते थे। दसवीं और बारहवीं में उन्होंने कॉलेज को टॉप किया था। काशी हिंदू विश्वविद्यालय से स्नातक और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से परास्नातक करने के दौरान वो हमेशा प्रवीण्य सूची में आते रहे।
इसके बाद अमेरिका के कार्नेल विश्वविद्यालय से रॉकफलर फाउंडेशन की फैलोशिप पर मास्टर ऑफ सोशल सांइस और पीएचडी कर वापस लौटे। अमेरका में रहने के दौरान वे भारतीय छात्रों के बीच स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियां संचालित करते रहते थे।
डॉ. बैजनाथ ने दो दर्जन पुस्तकों का सृजन किया है। उनकी पहली पुस्तक बंदी युग जेल में लिखी गई थी, जिसे 1947 में प्रकाशित किया गया है। इसके अलावा उनकी चर्चित पुस्तकों में प्रौढ़ साक्षरता, ग्राम सेवा की बुनियादी बातें, मानस के मनोहर प्रसंग, सामुदायिक ग्रामीण विकास, गीत जीवन के, माटी के मोल, पर्यावरण रक्षा, भारतीय ग्रामीण विकास का इतिहास, हमारा स्वतंत्रता आंदोलन जैसी शामिल हैं। उनकी पुस्तक बंदी युग के जेल यातना के दौर की लाइव कवरेज करती है।
इसके बाद अमेरिका के कार्नेल विश्वविद्यालय से रॉकफलर फाउंडेशन की फैलोशिप पर मास्टर ऑफ सोशल सांइस और पीएचडी कर वापस लौटे। अमेरका में रहने के दौरान वे भारतीय छात्रों के बीच स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियां संचालित करते रहते थे।
डॉ. बैजनाथ ने दो दर्जन पुस्तकों का सृजन किया है। उनकी पहली पुस्तक बंदी युग जेल में लिखी गई थी, जिसे 1947 में प्रकाशित किया गया है। इसके अलावा उनकी चर्चित पुस्तकों में प्रौढ़ साक्षरता, ग्राम सेवा की बुनियादी बातें, मानस के मनोहर प्रसंग, सामुदायिक ग्रामीण विकास, गीत जीवन के, माटी के मोल, पर्यावरण रक्षा, भारतीय ग्रामीण विकास का इतिहास, हमारा स्वतंत्रता आंदोलन जैसी शामिल हैं। उनकी पुस्तक बंदी युग के जेल यातना के दौर की लाइव कवरेज करती है।