फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lucknow News ›   KGMU doctors give a new face to a patient.

आंख निकल आई बाहर, सिलिकॉन की आंख लगाकर दिया नया चेहरा

Mon, 04 Jul 2016 11:47 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Mon, 04 Jul 2016 11:47 AM IST
विज्ञापन
KGMU doctors give a new face to a patient.
सिलिकॉन से बनी आंख - फोटो : amar ujala

केजीएमयू के प्रॉस्थोडॉन्टिक्स विभाग के डॉक्टरों ने बायीं आंख के कैंसर से पीड़ित बाराबंकी निवासी एक बुजुर्ग (60) को नया चेहरा दिया है। मरीज की पहले कैंसर से रोशनी छिन गई। इसके बाद ट्यूमर बढ़ता गया और आंख बंद होने के साथ बाहर आ गई।

विज्ञापन


बुजुर्ग इलाज के लिए पहुंचा तो आंख में कैंसर भीतर तक फैल चुका था। ओरल कैंसर सर्जरी विभाग में उसकी आंख को निकाल दिया गया। आंख निकालने के बाद गड्ढा बन गया और आंख के आसपास के हिस्से में विकृति आ गई।
विज्ञापन


बुजुर्ग को इससे राहत दिलाने के लिए डॉक्टरों ने दो महीने की जटिल प्रक्रिया में सिलिकॉन प्रॉस्थोसिस से नकली आंख लगाकर जगह को भरा और चेहरे की विकृति दूर की। अब मरीज स्वस्थ है और घर पर सामान्य जीवन जी रहा है।
विज्ञापन
विज्ञापन


30 हजार रुपये का इलाज निशुल्क
डॉ. कौशल किशोर अग्रवाल बताते हैं कि सिलिकॉन मैटेरियल से बनी कृत्रिम आंख पर महज एक से डेढ़ हजार रुपये का खर्च आता है। मरीज को असाध्य रोग के तहत उसको सहायता राशि मिली हुई है तो इलाज पूरी तरह मुफ्त होता है।

लखनऊ में इस तरह के इलाज की सुविधा किसी निजी या सरकारी संस्थान में नहीं है। कुछ चुनिंदा निजी सेंटरों में पत्थर की आंख लगाई जाती है जिसके लिए 35 से 40 हजार रुपये चुकाने पड़ते हैं।

ऐसे बनाई गई नकली आंख

KGMU doctors give a new face to a patient.
डॉ. कौशल किशोर अग्रवाल - फोटो : amar ujala

विभाग के डॉ. कौशल किशोर अग्रवाल ने बताया कि आंख निकालने के बाद जो भीतरी हिस्सा बचता है उसे ‘ऑरबिट’ कहते हैं। इस गड्ढे को भरने के लिए सबसे पहले ऑरबिटल डिफेक्ट का नाप लेकर डुप्लीकेट मॉडल बनाया गया और वैक्स से नकली आंख का पैटर्न बनाया गया। वैक्स पैटर्न को खाली ऑरबिट में फिक्स किया गया।

वैक्स पैटर्न को फिक्स करते वक्त ये सावधानी बरती गई कि वैक्स में बनी रेटिना (पुतली) ठीक आंख की पुतली के बराबर हो। इसके लिए दायीं आंख का नाप लिया गया और नाप सही आने के बाद सिलिकॉन मैटेरियल से कृत्रिम आंख बनाई गई और ऑरबिट में फिक्स कर दिया गया।

डॉ. कौशल बताते हैं कि इस पूरी प्रक्रिया में पीड़ित को सात से आठ बार विभाग आना पड़ा। सिलिकॉन मैटेरियल से बनी आंख को फिक्स किया गया तो उसके चेहरे के आसपास के हिस्से में विकृति साफ नजर आ रही थी। इसे देखते हुए सिलिकॉन मैटेरियल से ही विकृति को भी दूर किया गया। अब बुजुर्ग का चेहरा बिल्कुल सामान्य दिख रहा है।

पत्थर की तरह भारी नहीं होती सिलिकॉन की आंख

KGMU doctors give a new face to a patient.
सिलिकॉन की आंख - फोटो : amar ujala

सिलिकॉन मैटेरियल से बनी आंख में लचीलापन होता है और वो पत्थर की तरह भारी और कष्टदायक नहीं होती है। सिलिकॉन मैटेरियल से बनी आंख सामान्य आंख की पुतली जैसी दिखती है।

डॉ. कौशल के मुताबिक, सिलिकॉन मैटेरियल से बनी आंख को सामान्य आंख की तरह ढालना और फिक्स करना सबसे चुनौतीपूर्ण काम होता है और इसमें बहुत समय लगता है।

कान व अंगुली भी बन सकता है
डॉ. कौशल बताते हैं कि किसी हादसे में आंख, कान या अंगुली अलग हो जाए तो प्रॉस्थोडॉन्टिक्स विभाग में प्रोस्थोसिस की मदद से नया लगाया जा सकता है।

सिलिकॉन मैटेरियल से कृत्रिम कान और अंगुली आसानी से बनाए जा सकते हैं। कान के लिए सिलिकॉन के साथ मैग्नेटिक इंप्लांट इस्तेमाल होता है जिससे जरूरत के हिसाब से निकाला और लगाया जा सकता है। ये अंग बहुत फ्लेक्सिबल होते हैं।

अपनी मर्जी से दवा डालने पर कैंसर का खतरा

KGMU doctors give a new face to a patient.
डॉ. एसके जरेल - फोटो : amar ujala

केजीएमयू, डेंटल विभाग के डिप्टी एमएस डॉ. एसके जरेल बताते हैं कि आंख में बिना डॉक्टरी सलाह के दवा डालना खतरनाक है। देखा गया है कि लोग आंख में दर्द, जलन और लालपन आने पर खुद से या केमिस्ट से दवा खरीदकर इलाज करते हैं। दवा डालते ही आंख से धुंधला दिखाई देने लगता है। धीरे-धीरे रोशनी कम होने लगती है।

दवा का असर आंख की रेटिना, ऑप्टिक नर्व और दूसरे हिस्सों को इतना बुरी तरह प्रभावित कर देता है कि आंख के भीतर ट्यूमर बनने के साथ वो बाहर आ जाती है जिसे मेडिकल की भाषा में रेटिना ब्लास्टोमा कहा जाता है।

डॉ. एसके जरेल बताते हैं कि आंख के कैंसर से पीड़ित बच्चों की संख्या सबसे अधिक है। हर महीने पांच से छह बच्चे विभाग में प्रॉस्थोसिस लगाने के लिए आते हैं। बच्चों में ये बीमारी जन्मजात है।

बड़ों में इस तरह के मामले दवा के संक्रमण या अन्य कारणों से होते हैं। 30 वर्ष से अधिक उम्र के मरीज भी प्रॉस्थोसिस के लिए हर महीने सात से आठ की संख्या में पहुंचते हैं। आंख में जरा सी दिक्कत महसूस होने पर तुरंत नेत्र चिकित्सक से सलाह लेनी चाहिए।

ये लक्षण दिखते ही हो जाएं सतर्क
- आंखों तेज दर्द शुरू होना
- लाल होने के साथ चुभन
- रोशनी तेजी से कम होना
- अचानक धुंधला दिखना
- लगातार आंसू आना

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed