सांप्रदायिकता नहीं आरक्षण की आग से झुलस सकता है वेस्ट यूपी
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हरियाणा के जाट आंदोलन की तपिश पश्चिमी यूपी तक पहुंच गई है। उधर, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी में जाटों का आरक्षण खत्म करने संबंधी याचिका पर सुनवाई किए बगैर पूरा प्रकरण राज्य सरकार को विधि सम्मत फैसला लेने के लिए भेज रखा है।
राज्य सरकार ने अभी कोई फैसला नहीं लिया है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आलोक में प्रदेश में जाट आरक्षण से छेड़छाड़ की तो पश्चिमी यूपी के झुलसने के आसार बन सकते हैं।
हरियाणा में चंडीगढ़ हाईकोर्ट के फैसले के बाद जाटों को आरक्षण के लाभ से वंचित कर दिया गया है। इसी के विरोध में पूरे हरियाणा में आंदोलन भड़का हुआ है।
मार्च 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय सेवाओं में जाटों को आरक्षण देने के यूपीए सरकार के फैसले को अवैध ठहरा दिया है। इसके बाद केंद्रीय सेवाओं में जाटों को आरक्षण देने वाली अधिसूचना रद्द कर दी गई।
अदालत ने अपने फैसले में आरक्षण को ठहराया सही
जाट आरक्षण मामले की पैरवी करने वाले सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी डीएस वर्मा कहते हैं कि यूपी में जाटों के आरक्षण को खत्म करने की मांग वाली बागपत निवासी राजबीर सिंह व अन्य की याचिका को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुना ही नहीं है। एक दिसंबर 2015 को इसका निस्तारण करते हुए सिर्फ इसे राज्य सरकार को संदर्भित किया है।
अदालत ने आरक्षण को माना है सही
वर्मा ने बताया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट अपने पूर्व के फैसलों में प्रदेश में जाट आरक्षण को सही ठहरा चुका है। जाटों को अन्य पिछड़ी जातियों में शामिल कर आरक्षण का लाभ देने के खिलाफ सबसे पहले रश्मि पाल ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। इसी तरह की याचिका बलदेव सिंह ने दायर की थी।
हाईकोर्ट ने दोनों ही मामलों में जाटों को आरक्षण देने को वैध ठहराया था। रश्मि पाल हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गई थी।
शीर्ष अदालत वर्ष 2009 में उनकी याचिका खारिज कर चुकी है। ऐसे में यूपी में जाट आरक्षण से छेड़छाड़ जैसी कोई संभावना नजर नहीं आती है।