ये बदलाव हुए तो मचेगी 'मेक इन यूपी' की धूम
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जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मेक इन इंडिया’ की बात की तो जेहन में विजय सुपर स्कूटर, अपट्रॉन टीवी, प्रताप ट्रैक्टर, लाल इमली, सिन्नी पंखा समेत कई ब्रांड उमड़ने लगे। इन ब्रांड्स की तूती उस समय बोलती थी जब नफासत और सियासत की राजधानी विकास के सपने बुन रही थी। इन ब्रांड्स के साथ विश्वसनीयता जुड़ी होती थी। यूपी के ये ब्रांड देशभर में छाए हुए थे। यूं कहें कि ‘मेक इन यूपी’ के साथ देश चल रहा था।
पर उदारीकरण के दौर में कुप्रबंधन और कॉम्पटीशन की मार, सरकारी सिस्टम में बढ़ती लालफीताशाही और सरकारों की उद्योगों के प्रति उदासीनता समेत अन्य वजहों ने इन्हें पटरी से उतार दिया। कई अपना वजूद खो बैठे तो कई अंतिम सांसें गिन रहे हैं। सवाल ये है कि मोदी के ‘मेक इन इंडिया’ की मुहिम में क्या एक बार फिर ‘मेक इन यूपी’ के दौर की उम्मीद तलाशी जा सकती है?
उद्योग विभाग के अफसरों की मानें तो यूपी में निवेश के लिए उचित माहौल बनाया जाए तो वो दौर फिर लौट सकता है। सरकार नीयत साफ रखे तो लौट सकता है वह दौर उद्योग विभाग, एसोचैम लखनऊ चैप्टर के अफसरों की मानें तों यूपी सरकार की नई औद्योगिक निवेश नीति, आईटी नीति, खाद्य प्रसंस्करण नीति के बाद हाल में घोषित मैन्युफैक्चरिंग नीति से मेक इन यूपी की संभावनाएं बढ़ाती हैं।
पर सरकार को नीति से ज्यादा नीयत साफ दिखानी होगी। उद्योगों की समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं। उन्हें व्यावहारिकता की कसौटी पर कसकर निर्णय करना होगा।
इसलिए है सरकार से उम्मीद
सूबे में अधिक से अधिक निवेश के लिए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव हाल में नीदरलैंड के दौरे पर गए। लौटे तो निवेशकों की मदद के लिए ‘नीदरलैंड डेस्क’ बना दिया। यही नहीं, पीएम जापान से लौटे तो यूपी ने ‘जापान सेल’ भी बना दिया ताकि संभावनाएं बनें तो निवेशकों को दिक्कत न हो।
यही नहीं दो साल में उद्योग बंधु की बैठक के लिए समय न निकाल पाने वाले मुख्यमंत्री अब हर महीने उद्यमियों से मिलेंगे। बिजली संकट के बावजूद उद्यमियों को अधिक से अधिक बिजली का बंदोबस्त करना सरकार की बदलती सोच को बताता है।
कभी पहचान थे यूपी के ये ब्रांड
विजय सुपर स्कूटर: मंत्रियों तक से करवानी पड़ती थी सिफारिश
- लखनऊ के स्कूटर इंडिया लिमिटेड के विजय सुपर स्कूटर की लोकप्रियता इसी से समझी जा सकती थी कि बुकिंग के सालभर बाद इसकी डिलीवरी होती थी। कई बार मंत्रियों तक से सिफारिश करवाई जाती थी। इसी कंपनी केएक अन्य स्कूटर लैंब्रेटा का रुआब भी कई देशों तक था।
अपट्रान टीवी: प्रतिष्ठा का सवाल
ब्लैक एंड व्हाइट टीवी के जमाने में घर-घर में जगह बनाने वाला अपट्रान का शटर केस वाला टीवी होना ही प्रतिष्ठा माना जाता था।
इनसे भी थी यूपी की पहचान
प्रताप ट्रैक्टर: कम कीमत से अलग पहचान
प्रतापगढ़ में बनने वाले प्रताप ट्रैक्टर ने कम कीमत में किसानों को खेती के लिए आदर्श ट्रैक्टर मुहैया कराया। सरकारी मनमानी से यह ब्रांड अंधेरे में गुम हो गया।
आईटीआई: भारी भरकम सेट का था जलवा
बेसिक फोन के दौर में गोंडा व रायबरेली में बनने वाले काले रंग के भारी भरकम फोन सेट सूबे की अलग लेकिन खास पहचान थी।
लाल इमली: ये ठंड क्या बला है
कानपुर की लाल इमली ब्रांड के गर्म कपड़े का रसूख इतना था कि पहनने वाला कहता था, ‘ये ठंड कौन सी बला है।’ पर बदलते समय में खुद को न बदल पाने से वह अंधेरे में गुम हो गया।
सिन्नी फैन: वाराणसी में बनने वाला सिन्नी पंखे का रुतबा किसी एयर कंडीशन से कम नहीं होता था।
निवेशकों को देना होगा बेहतर माहौल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘मेक इन इंडिया’ की मुहिम के बीच उद्योग विभाग, उद्योगपति ‘मेक इन यूपी’ का दौर लौटने की संभावनाओं से इन्कार नहीं करते। बशर्ते उद्योगों की समस्याएं हल करनी होंगी। नीतियां ऐसी बनानी होंगी जिससे उनकी उम्मीद लालफीताशाही के चक्करों में पड़कर टूट न जाए।
उद्योग विभाग के एक वरिष्ठ अफसर कहते हैं कि ‘मेक इन इंडिया’ के बिगुल ने माहौल बना दिया है। प्रधानमंत्री की जापान और चीन के राष्ट्रपति की दिल्ली यात्रा ने देश में निवेश को लेकर उम्मीदें बढ़ा दी हैं। अगर यूपी इसका लाभ उठाने से चूका तो माहौल उसके खिलाफ जा सकता है।
संभवत: प्रदेश सरकार को भी इस बात का अनुमान है इसलिए वह कई कदम उठा रही है। जापानी निवेश को प्रदेश में आकर्षित करने के लिए मुख्यमंत्री ने पीएम के जापान से लौटते ही एक ‘जापान सेल’ बना दिया।
फिर लोकसभा चुनाव से फुर्सत मिली तो मुख्यमंत्री खुद नीदरलैंड गए। उनकेलौटते ही नीदरलैंड के निवेशकों ने सूबे में दस्तक देना शुरू किया तो उनकी सहायता के लिए तत्काल ‘नीदरलैंड डेस्क’ बना दिया। जवाब में नीदरलैंड सरकार ने ट्रेड डेस्क बना दिया।
छा सकते हैं मार्केट में पर
- एसोचैम लखनऊ चैप्टर के उपाध्यक्ष संदीप सक्सेना कहते हैं कि प्रदेश में औद्योगिक विकास व ब्रांड की तरह मार्केट में छाने की असीमित संभावनाएं हैं। प्रधानमंत्री ने ‘मेक इन इंडिया’ का नारा दिया है। प्रदेश सरकार इसे अवसर में बदल सकती है। प्रदेश में उद्योगों को बढ़ाकर रोजगार सृजन के अपार अवसर हैं। पर, प्रदेश सरकार के पास कोई ठीक प्लान नजर नहीं आता।
- प्रदेश में पश्चिमी यूपी व कुछ जिलों के ही विकास की बात होती है। पूर्वी यूपी, अवध व बुंदेलखंड जैसे इलाकों पर फोकस नहीं होता। ये पोटेंशियल वाले क्षेत्र हैं।
- 1540 औद्योगिक इकाइयां लोन न चुका पाने के चलते बैठ गईं। उनके रिवाइवल पर सरकार चुप है। उद्योग बंधु की सीएम ने एक भी बैठक नहीं की। ऐसे में ‘मेक इन यूपी’ का माहौल कैसे बनेगा?
- औद्योगिक विकास में अड़चन डालने वाली नीतियां बदलने में सालों लग जाते हैं। उद्यमी हारकर पलायन कर जाता है। ऐसे माहौल को बदलना होगा।
बेहतर नीतियां बनें तो बदले सूरत
वहीं, सीआईआई के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष किरॉन चोपड़ा कहते हैं कि दो दशक से प्रदेश में उद्योग किसी भी सरकार की प्राथमिकता में नहीं रहे। इससे सूबे में औद्योगीकरण धीमा हो गया। हालांकि पुराने ब्रांड के खत्म होने में अकेले सरकार की नीति ही जिम्मेदार नहीं होती। कुप्रबंधन, श्रम समस्या व अनेक दूसरे कारण भी हो सकते हैं। लेकिन बेसिक दिक्कत ये है कि प्रदेश में दूसरे राज्यों से प्रतिस्पर्धा करने वाली नीति पर ध्यान नहीं है।
- उत्तरांचल 10 वर्ष तक टैक्स में छूट देगा और यूपी नहीं देगा तो उद्योगपतियों के पास उत्तराखंड जाने का विकल्प बना रहेगा। ‘मेक इन इंडिया’ की मुहिम से बनने वाले माहौल का अधिक से अधिक लाभ उठाना चाहिए। लेकिन जो राज्य बिजली, ट्रांसपोर्ट, अवस्थापना जैसी सुविधाएं बेहतर देगा, उद्यमी वहीं जाएंगे। सरकार को इस ओर ठोस पहल करनी चाहिए।
- ‘मेड इन यूपी के लिए प्रदेश में सारे तत्व मौजूद हैं। बस इसके लिए ईमानदार पहल की जरूरत भर है। सिंगल विंडो व उद्योग बंधु को सिर्फ कागज में नहीं जमीन पर काम करना होगा।’
हमने माहौल बदला, जल्द दिखेगा असर
- इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के अधिशासी निदेशक डीएस वर्मा कहते हैं कि कोई भी बुलाने से निवेश करने नहीं आता। अच्छा माहौल होगा तो संदेश अपने आप पहुंच जाता है। निवेशक खुद निवेश करने आने लगते हैं।
- केंद्र के साथ प्रदेश सरकार ने भी अच्छे कदम उठाए हैं। पिछले दो सालों में जो नीतियां घोषित हुईं उन पर अमल होना शुरू हो गया है। सरकार ट्रांसपेरेंसी की पहल कर रही है। ह्यूमन इंटरफेस कम कर रही है। मुख्यमंत्री खुद एक दिन महीने में उद्यमियों के साथ बैठेंगे।
- 80 के दशक तक प्रदेश केइंडस्ट्री की ग्रोथ रेट नेशनल स्तर से आगे रहती थी। ऐसा फिर हो सकता है बशर्ते विकास के मुददे पर केंद्र व प्रदेश के बीच राजनीति न हो।
- ‘मेक इन इंडिया’ के बीच हमें ‘मेक इन यूपी’ के लिए आशा की किरण नजर आ रही है। नौकरशाही इधर पॉजीटिव हुई है और इंडस्ट्री में काम का फोकस बढ़ा है।
मुख्य सचिव आलोक रंजन कहते हैं कि ‘मेक इन यूपी’ के लिए प्रदेश में उत्तम वातावरण है। इसके लिए सरकार ने इंडस्ट्रियल पॉलिसी, फूड प्रोसेसिंग पॉलिसी, मैन्युफैक्चरिंग पॉलिसी, आईटी पॉलिसी घोषित की है। नीतियों को काफी प्रतिस्पर्धात्मक बनाया गया है। इंटरेस्ट फ्री सब्सिडी, स्टांप ड्यूटी के साथ तमाम तरह की सहूलियतें दी गई हैं। निवेशकों को किसी तरह की असुविधा न हो इसके लिए सारे क्लीयरेंस ऑनलाइन कर दिए गए हैं।
इन्सेंटिव मिलने में दिक्कत न हो इसलिए सिंगल विंडो सिस्टम को लागू कर दिया गया है। उद्योग बंधु की जिले से लेकर राज्य स्तर तक की नियमित बैठकों की व्यवस्था की है। मकसद यही है कि निवेशक आकर यूपी में निवेश करें। तमाम निवेशकों ने निवेश के अपने प्रपोजल दिए हैं। आने वाले दिनों में इसका असर दिखेगा।’
माहौल बनाने के लिए सरकार की कोशिश
- विदेशी निवेशकों के लिए माहौल बनाने के लिए अलग-अलग देशों के लिए हेल्प डेस्क बनाना शुरू किया। जापान सेल, नीदरलैंड डेस्क की स्थापना कर दी है।
- नीदरलैंड व जापान के साथ कई दौर की अच्छी बात हुई है जिसके नतीजों का इंतजार है।
- मुख्यमंत्री ने उद्यमियों से मिलने के लिए महीने में एक दिन तय कर दिया है।
- मुख्यमंत्री व मुख्य सचिव उद्यमियों को पूरा महत्व देते हुए स्वयं मिलने का वक्त दे रहे हैं।
- लखनऊ मेट्रो व आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे के रूप में इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में अच्छी पहल।
- लखनऊ में आईटी सिटी व प्रदेश में कई दूध डेयरियों की स्थापना हो रही है।
- डीएमआईसी के अंतर्गत ग्रेटर नोएडा में एकीकृत औद्योगिक टाउनशिप का काम जल्द शुरू होगा।
और यह करना होगा
- नए निवेश में अवध, पूर्वी यूपी व बुंदेलखंड को फोकस बनाया जाए। औद्योगिक विकास में क्षेत्रीय असंतुलन दूर हो।
- एनआरआई विभाग का एक कार्यालय दिल्ली में खोला जाए जिसमें वरिष्ठ अधिकारी की तैनाती हो। वह विदेशी निवेशकों से नियमित संपर्क रखे।
- निवेश विभाग की भूमिका स्पष्ट की जाए और जिम्मेदारी तय हो।
- निवेश मित्र में आवेदन, संशोधन और क्लीयरेंस का ऑनलाइन सिस्टम ठीक से लागू किया जाए।
- मुख्यमंत्री व मुख्य सचिव के स्तर पर उद्योग बंधु की बैठकें हों। ताकि तय अवधि में लंबित नीतिगत समस्याओं का निस्तारण होता रहे।
- सिंगल विंडो सिस्टम में ह्यूमन इन्वॉल्वमेंट खत्म किया जाए।
- जिला उद्योग केंद्रों की भूमिका नए सिरे से तय हो। इन्हें प्रोफेशनल बनाकर रिजल्ट ओरिएंटेड जिम्मेदारी तय की जाए।
- लाल फीताशाही खत्म करने के लिए इंडस्ट्रियल सर्विसेज गारंटी एक्ट को फौरन लागू किया जाए।
- ईडीएफसी व डीएमआईसी जैसे प्रोजेक्ट प्रदेश में मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर में बूम ला सकते हैं। तय टाइमलाइन के साथ इनके काम होने चाहिए।